अविनाश मिश्र

हिंदी की नई पीढ़ी से संबद्ध कवि-लेखक। तीन पुस्तकें प्रकाशित।

कभी-कभी लगता है कि गोविंदा भी कवि है

गोविंदा ऐसा नहीं था, क्योंकि उसका दौर ऐसा नहीं था। आप अपने दौर के असर से बच नहीं सकते। उसकी अच्छाइयाँ आपको गढ़ती हैं और बुराइयाँ भी। यह इस प्रकार होता है कि बहुत सजगताएँ भी इसे बेहद देर से जान पाती हैं।

कल कुछ कल से अलग होगा

आलोकधन्वा के कविता-संसार की कल्पना स्त्रियों के बग़ैर नहीं की जा सकती। वह हिंदी में स्त्री-विमर्श के एक प्रतिनिधि और सशक्त कवि हैं। माँ पर कविता लिखते हुए आलोकधन्वा को एक पूरा ज़माना याद आता है।

वायरल से कविता का तापमान नापने वालों के लिए

यह पुस्तक विधिवत् लिखी गई पुस्तक नहीं है। यह पिछले छह दशकों से अशोक वाजपेयी के द्वारा कविता के बारे में समय-समय पर जो सोचा-गुना-लिखा गया, उसका पीयूष दईया द्वारा सुरुचि और सावधानी से किया गया संचयन है।

हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें?

‘हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें?’ यह प्रश्न कोई भी कर सकता है, बशर्ते वह हिंदी भाषा और उसके साहित्य में दिलचस्पी रखता हो; लेकिन प्राय: यह प्रश्न किशोरों और नवयुवकों की तरफ़ से ही आता है। यहाँ इस प्रश्न का उत्तर कुछ क़दर देने की कोशिश की गई है कि जब भी कोई पूछे : ‘हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें?’ आप कह सकें : ‘हिंदी साहित्य यहाँ से शुरू करें’ :

‘अलग रहो, अलग रहो, अलग रहो, अलग रहो’

शंख घोष ने अपने नाम के बिल्कुल उलट जाकर अपने कविता-संसार में मौन को प्रमुखता दी है। वह शोर के प्रति निर्विकार और उससे निश्चिंत रहे आए। यह कृत्य उनके लिए एक बेहतर मनुष्य बनने की प्रक्रिया-सा रहा।

आओ पहल करें

‘पहल’ नहीं रही। हिंदीसाहित्यसंसार में शोक की लहर है। मन मानने को राज़ी नहीं हो रहे हैं कि ‘पहल’ अब नहीं है, क्योंकि वह पहले भी एक बार अपनी राख से पुनर्जीवित हो चुकी है।

एक मूर्ख मेरी ओर

विवेक अपने उदय के बाद जैसे-जैसे परिवर्तित, परिष्कृत और विकसित हुआ; वैसे-वैसे ही अविवेक भी परिवर्तित, परिष्कृत और विकसित हुआ। एक दौर में अज्ञान पर विजय हासिल करते हुए अर्जित की गईं संसार की सबसे बड़ी उपलब्धियों को ध्यान से जाँचने पर ज्ञात होता है कि संसार की सबसे बड़ी मूर्खताएँ भी इन्हीं उपलब्धियों के आस-पास घटी हैं।

मलयज की स्त्री-दृष्टि

संसार का बहुत सारा गद्य इस प्रकार प्रारंभ होता रहा है कि उसके पहले वाक्य में ही मौसम और समय प्रकट हो जाएँ। यह गद्य से गुज़र रहे व्यक्तित्व को एक तय प्रभाव में बाँधने का एक बहुत रूढ़ नुस्ख़ा है।

हिंदी की पहली आदिवासी कवयित्री

हिंदी में उपस्थित स्त्री-कविता आजकल साहित्य-विमर्श के केंद्र में है। मेरे समीप इस करुणा कलित विमर्श में सुशीला सामद का नाम एक विकल रागिनी की भाँति बज रहा है। यह हाहाकार इस मायने में स्वाभाविक भी है कि सुशीला सामद एक छायावादी कवयित्री हैं, जिन्हें भारत की पहली हिंदी आदिवासी कवयित्री होने का गौरव प्राप्त है।

इक्कीसवीं सदी की स्त्री-कविता

हिंदी में उपस्थित स्त्री-कविता का यह स्वर्णकाल है। इस संभव-साक्ष्य को पाने के लिए हमारी भाषा बेहद संघर्ष करती रही है। स्त्री कवियों की संख्या का विस्तार अब इस क़दर है कि उन्होंने पूरे काव्य-दृश्य को ही अपनी आभा से आच्छादित किया हुआ है।

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