अविनाश मिश्र

हिंदी की नई पीढ़ी से संबद्ध कवि-लेखक। तीन पुस्तकें प्रकाशित।

‘अलग रहो, अलग रहो, अलग रहो, अलग रहो’

शंख घोष ने अपने नाम के बिल्कुल उलट जाकर अपने कविता-संसार में मौन को प्रमुखता दी है। वह शोर के प्रति निर्विकार और उससे निश्चिंत रहे आए। यह कृत्य उनके लिए एक बेहतर मनुष्य बनने की प्रक्रिया-सा रहा।

आओ पहल करें

‘पहल’ नहीं रही। हिंदीसाहित्यसंसार में शोक की लहर है। मन मानने को राज़ी नहीं हो रहे हैं कि ‘पहल’ अब नहीं है, क्योंकि वह पहले भी एक बार अपनी राख से पुनर्जीवित हो चुकी है।

एक मूर्ख मेरी ओर

विवेक अपने उदय के बाद जैसे-जैसे परिवर्तित, परिष्कृत और विकसित हुआ; वैसे-वैसे ही अविवेक भी परिवर्तित, परिष्कृत और विकसित हुआ। एक दौर में अज्ञान पर विजय हासिल करते हुए अर्जित की गईं संसार की सबसे बड़ी उपलब्धियों को ध्यान से जाँचने पर ज्ञात होता है कि संसार की सबसे बड़ी मूर्खताएँ भी इन्हीं उपलब्धियों के आस-पास घटी हैं।

मलयज की स्त्री-दृष्टि

संसार का बहुत सारा गद्य इस प्रकार प्रारंभ होता रहा है कि उसके पहले वाक्य में ही मौसम और समय प्रकट हो जाएँ। यह गद्य से गुज़र रहे व्यक्तित्व को एक तय प्रभाव में बाँधने का एक बहुत रूढ़ नुस्ख़ा है।

हिंदी की पहली आदिवासी कवयित्री

हिंदी में उपस्थित स्त्री-कविता आजकल साहित्य-विमर्श के केंद्र में है। मेरे समीप इस करुणा कलित विमर्श में सुशीला सामद का नाम एक विकल रागिनी की भाँति बज रहा है। यह हाहाकार इस मायने में स्वाभाविक भी है कि सुशीला सामद एक छायावादी कवयित्री हैं, जिन्हें भारत की पहली हिंदी आदिवासी कवयित्री होने का गौरव प्राप्त है।

इक्कीसवीं सदी की स्त्री-कविता

हिंदी में उपस्थित स्त्री-कविता का यह स्वर्णकाल है। इस संभव-साक्ष्य को पाने के लिए हमारी भाषा बेहद संघर्ष करती रही है। स्त्री कवियों की संख्या का विस्तार अब इस क़दर है कि उन्होंने पूरे काव्य-दृश्य को ही अपनी आभा से आच्छादित किया हुआ है।

कोरोना समय में हिंदी कविता

साल 2019 के आख़िरी महीने में दृश्य में आई कोरोना महामारी ने गत वर्ष सारे संसार को प्रभावित और विचलित किया। साहित्य का संसार भी इस आपदा से अछूता नहीं रहा। संसार की कई भाषाओं में इस दरमियान कोरोना-केंद्रित साहित्य रचा गया।

बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाए-2

टी. एस. एलिएट की एक कविता-पंक्ति है : ‘बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाए?’ इस पंक्ति को शीर्षक बनाकर समादृत कवि-आलोचक और कला-प्रशासक अशोक वाजपेयी साल 1967 में एक आलेख लिख चुके हैं। इस आलेख के केंद्र में अज्ञेय और सुमित्रानंदन पंत का तत्कालीन काव्य-व्यवहार था।

उनकी नज़र और उनकी कहन इस मंज़र में लासानी थी

इस मनहूस साल के आख़िरी सप्ताह में एक और मनहूस ख़बर—शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी (1935–2020) नहीं रहे। उनके भतीजे, दास्तानगो और फ़िल्म निर्देशक महमूद फ़ारूक़ी ने यह सूचना ट्विटर पर दी।

हिंदी का लाइव काल

भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की मासिक पत्रिका ‘आजकल’ ने अपने दिसम्बर-2020 अंक को ‘डिजिटल मंच पर हिंदी साहित्य’ विषय पर केंद्रित किया है। इस प्रसंग में एक प्रश्नावली मुझे भी इस आग्रह के साथ ई-मेल की गई कि मैं इस अवसर के लिए आयोजित परिचर्चा का हिस्सा बनूँ।

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