‘मैं ऊँचा होता चलता हूँ’

यह लेख उनके लिए नहीं है जो मुक्तिबोध को जानते हैं, यह लेख उनके लिए है जो मुक्तिबोध को जानना चाहते हैं…

गजानन माधव मुक्तिबोध │ स्रोत : रमेश मुक्तिबोध

…तो एक थे/हैं मुक्तिबोध—गजानन माधव मुक्तिबोध। 13 नवंबर 1917 को श्योपुर, ग्वालियर में वह जन्मे और उज्जैन में शुरुआती तालीम पाई। पिता की इच्छा थी कि पुत्र वकालत करे और धन और यश में वृद्धि करे, लेकिन गजानन माधव को ज्ञान खींच रहा था। ज्ञान को अर्जित करने की कामना भी धन और यश को अर्जित करने की कामना की तरह ही अतृप्ति से संबद्ध है। पर मुक्तिबोध के लिए अतृप्ति के मायने बहुत फ़र्क़ थे :

बेचैन चील!!
उस जैसा मैं पर्यटनशील
प्यासा-प्यासा,
देखता रहूँगा एक दमकती हुई झील
या पानी का कोरा झाँसा
जिसकी सफ़ेद चिलचिलाहटों में है अजीब
इनकार एक सूना!!

मुक्तिबोध ज्ञान के सारे संभव-असंभव स्रोतों तक रसाई चाहते थे। यह सब कुछ को अपने ग़ौर-ओ-फ़िक्र में ले लेने की प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया मानसिक तनाव को बढ़ाती जाती है।

मुक्तिबोध बाग़ी थे। यह बग़ावत उनके समूचे व्यक्तित्व और कृतित्व में देखी जा सकती है। महज़ 23 वर्ष की उम्र में वह रवींद्रनाथ टैगोर को मूल में पढ़कर अभिभूत हुए थे। उनकी शामें लंबी-लंबी तार्किक बहसों में बीत रही थीं। ये बहसें राजनीतिक और साहित्यिक थीं। ये वे दिन थे जब वह मनोविज्ञान, तर्कशास्त्र और दर्शन के अध्ययन और समस्याओं के बीच पड़ चुके थे। यूरोप के महान उपन्यासों को वह पढ़-पढ़कर किनारे करते जा रहे थे।

वर्ष 1943 में प्रकाशित और अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार-सप्तक’ के पहले कवि मुक्तिबोध हैं। ‘तार-सप्तक’ में शामिल उनकी कविताओं से पहले उनका दिलचस्प परिचय है :

‘‘पिता के पुलिस सब-इंस्पेक्टर होने के कारण मुक्तिबोध की पढ़ाई का सिलसिला टूटता-जुड़ता रहा; फलतः 1930 में मिडिल परीक्षा में असफलता मिली जिसे कवि अपने जीवन की ‘पहली महत्त्वपूर्ण घटना’ मानता है। उसके बाद पढ़ाई का सिलसिला ठीक चला, और साथ ही जीवन के प्रति नई संवेदना और जागरूकता बढ़ने लगी। सन् 1935 (माधव कॉलेज, उज्जैन) में साहित्य-लेखन आरंभ हुआ। सन् 1938 में बी.ए. किया; 1939 में विवाह, उसके बाद ‘निम्न-मध्यवर्गीय निष्क्रिय मास्टरी, जो अब तक है’।

मालवे के औद्योगिक केंद्र में जिसमें बड़े शहरों के गुणों को छोड़कर उसकी सब विशेषताएँ हैं, यह बंदा रोज़ ज़िंदा रहता है। नियमानुकूल बारह बजे दुपहर स्कूल जाता है, लौटती बार अपने पैरों से अपनी सिगरेट पर ज़्यादा भरोसा रखता हुआ घर की ओर चल पड़ता है।’’

कई भारतीय शहरों और क़स्बों में बसते-भटकते हुए, मामूली वेतन वाली मास्टरी और नामी-गुमनामी पत्रकारिता करते हुए मुक्तिबोध अपनी ज़िंदगी के 47 मुश्किल साल गुज़ारकर गुज़र गए। यह ध्यान से पढ़ने वाली बात है कि अपने देहांत के बाद उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य का नया युग रचा—मुक्तिबोध युग। यह युग उनके देहांत (11 सितंबर 1964) के बाद से अब तक जारी है। हिंदी कविता का संसार अब ‘मुक्तिबोध से पहले’ और ‘मुक्तिबोध के बाद’ इस प्रकार की शब्दावली में साँस लेता है। यह भी ध्यान से पढ़ने वाली बात है कि मुक्तिबोध के पास जब तक साँसें थीं, उनकी कविताओं की एक भी किताब उनके पास नहीं थी। उनके कविता-संग्रह उनके देहांत के बाद प्रकाशित हुए। उनकी कविताओं की पहली किताब ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ की भूमिका लिखते हुए शमशेर बहादुर सिंह कहते हैं :

‘‘एकाएक क्यों सन् 64 के मध्य में गजानन माधव मुक्तिबोध विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो उठे? क्यों ‘धर्मयुग’, ‘ज्ञानोदय’, ‘लहर’, ‘नवभारत टाइम्स’—प्राय: सभी साप्ताहिक, मासिक और दैनिक उनका परिचय पाठकों को देने लगे और दिल्ली की साहित्यिक, हिंदी दुनिया में एक नई हलचल-सी आ गई?

इसलिए कि गजानन माधव मुक्तिबोध हिंदी संसार की एक घटना बन गए। कुछ ऐसी घटना जिसकी ओर से आँख मूँद लेना असंभव था। उनकी एकनिष्ठ तपस्या और संघर्ष, उनकी अटूट सचाई, उनका पूरा जीवन, सभी एक साथ हमारी भावना के केंद्रीय मंच पर सामने आ गए।’’

…और इस तरह हिंदी संसार ने मुक्तिबोध के बारे में बहुत कुछ जाना और समझा। उन्हें और उनकी कविताओं को समझने और न समझने पर बहुत बहसें हुईं और होती रहती हैं। उनके बग़ैर हिंदी साहित्य का संसार चलना मुश्किल हो गया। यह स्थिति अब तक बरक़रार है।

मुक्तिबोध मुश्किलों में भी मुश्किल कवि हैं। वह मुश्किलों में याद आते हैं, और काम आते हैं। उनकी कविताएँ पढ़ने वाले के दिमाग़ में तस्वीर पर तस्वीर बनाती जाती हैं। वह बेशक एक बौद्धिक कवि हैं, और उनकी कविताएँ सोचने और विचार करने की क्षमता रखने वालों के लिए हैं। लेकिन उनके संघर्ष, द्वंद्व और तनाव आम जन के बीच से निकलकर आए हैं :

मैं उनका ही होता, जिनसे
मैंने रूप-भाव पाए हैं।
वे मेरे ही हिये बँधे हैं
जो मर्यादाएँ लाए हैं।

मेरे शब्द-भाव उनके हैं,
मेरे पैर और पथ मेरा
मेरा अंत और अथ मेरा,
ऐसे किंतु चाव उनके हैं।

मैं ऊँचा होता चलता हूँ
उनके ओछेपन से गिर-गिर,
उनके छिछलेपन से खुद-खुद,
मैं गहरा होता चलता हूँ।

मुक्तिबोध ने 200 की संख्या के आस-पास कविताएँ लिखीं। इनमें से कुछ बेहद छोटी हैं और कुछ बेहद लंबी। उनकी लंबी कविताओं में भी सबसे लंबी (मानो कहीं भी ख़त्म न होती हुई—आवेग त्वरित कालयात्री) कविता ‘अँधेरे में’ है। आधुनिक हिंदी कविता के सबसे शक्तिशाली कवि की यह सबसे शक्तिशाली कविता है। यह कविता अब कविता होने के साथ-साथ एक प्रतीक भी है—एक अमर प्रतीक।

‘अँधेरे में’ जैसा अँधेरा अब नहीं है, पर उसका असर अब तलक वैसा ही है। नई-नई रंगीनियों में ‘अँधेरे में’ आँखों को चुभता हुआ श्वेत-श्याम है अब। असत्य का परिहार करती हुई और सत्य में आस्थावान वह एक ऐसी महानता है जिसे अब कोई दुहरा नहीं सकता। वह अब एक स्मारक है। वक़्त-वक़्त इस पर से धूल झाड़ी जाती है और इसका कालजयी वैभव चमक उठता है। इस पर माल्यार्पण होते रहते हैं। इसके साए में आयोजन और प्रवचन भी होते रहते हैं।

आज इस कविता में मुक्तिबोध को वैसे ही पाया जा सकता है, जैसे इस कविता के नायक ने इस कविता में महात्मा गांधी को पाया था— अँधेरे की स्याही में डूबा हुआ :

बिजली का झटका
कहता है—
‘‘भाग जा, हट जा
हम हैं गुज़र गए ज़माने के चेहरे
आगे तू बढ़ जा।’’

परिस्थितियों के साथ मेल स्थापित करने के लिए मैं कभी अपने आदर्शों को नहीं छोड़ सकता। यह महात्मा गांधी का वाक्य है। मुक्तिबोध ने जीवन और कविता दोनों में ही परिस्थितियों के साथ मेल स्थापित करने के लिए कभी अपने आदर्शों को नहीं छोड़ा। ‘अँधेरे में’ के स्वप्नचित्रों में मुक्तिबोध के सपनों के आशय खोजे जाएँ तो बाआसानी यह नज़र आएगा कि समय और जनचरित्र ने मुक्तिबोध के सपनों के साथ भी वही किया जो महात्मा गांधी के सपनों के साथ किया।

‘अँधेरे में’ की उम्र 50 वर्ष से मज़ीद हो चुकी है। हिंदी साहित्य से परास्नातकों को अमूमन यह कविता पढ़नी ही पड़ती है और हिंदी विभाग के प्राध्यापकों को इसे पढ़ाना ही पड़ता है। लेकिन इस सबके बावजूद आज भी यह कविता उन सब दिमाग़ों पर हथौड़े की तरह है जो कविता से मनोरंजन (करना) चाहते हैं। यही वह कविता है जो बहुत ताक़त से आधुनिक हिंदी कविता को मनोरंजन के दायरे से बाहर ले आई। नामवर सिंह ने यह यूँ ही नहीं कहा होगा :

‘‘यदि कोई आत्मतुष्ट व्यक्ति केवल इसलिए कविता पढ़ना चाहता है कि उसकी आत्मतुष्ट मनोदशा को कहीं से भी धक्का न लगे, बल्कि आत्मतुष्टि और प्रगाढ़ हो, उसे रीतिकाल के दरबारों में होना चाहिए था, या फिर राजकीय समारोहों में मनोरंजन के लिए आयोजित कवि-सम्मेलनों का सेवन करना चाहिए। मुक्तिबोध की कविताएँ निश्चय ही चित्त की इस समाहिति के लिए घातक हैं, क्योंकि उनमें आज के परिवेश की जो दहशत भरी तस्वीर उभरती है, उससे स्नायु-तंतुओं के टूटने या रक्त-चाप बढ़ने का ख़तरा पैदा हो सकता है।’’

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इस लेख को लिखने में गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताओं की पहली किताब ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ (भारतीय ज्ञानपीठ, तेरहवाँ पेपरबैक संस्करण : 2000), मुक्तिबोध की ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ (राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण : 1984, संपादक : अशोक वाजपेयी), ‘तार-सप्तक’ (भारतीय ज्ञानपीठ, प्रथम संस्करण : 1943, संपादक : अज्ञेय) और नामवर सिंह की पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ (राजकमल प्रकाशन, चौथा संस्करण : 1990) से सहायता और संदर्भ लिए गए हैं। मुक्तिबोध की प्रसिद्ध और प्रतिनिधि कविताएँ यहाँ पढ़ें : गजानन माधव मुक्तिबोध