वह आवाज़ हर रात लौटती है

तवायफ़ मुश्तरीबाई के प्यार में पड़े असग़र हुसैन से उनके दो बेटियाँ हुई—अनवरी और अख़्तरी, जिन्हें प्यार से ज़ोहरा और बिब्बी कहकर बुलाया जाता। बेटियाँ होने के तुरंत बाद ही, असग़र हुसैन ने अपनी दूसरी बीवी, मुश्तरीबाई को छोड़ दिया। उस मुश्किल घड़ी में मुश्तरीबाई को अपनी दोनों बेटियों के साथ ख़ूब संघर्ष करना पड़ा। वे मासूम-जान, जब चार बरस की हुई तो कहीं से ज़हरीली मिठाई खा ली। उनकी तबीयत ख़राब होने लगी। दोनों को अस्पताल ले गए, जहाँ ज़ोहरा ने दम तोड़ दिया। लेकिन बिब्बी जैसे-तैसे बच गई।

बिब्बी बड़ी हो रही थी। माँ के गुण बिब्बी में भी दिखने लगे थे। कंठ में सरस्वती थी, यह बात मुश्तरीबाई जानती थी; लेकिन वे नहीं चाहती थी कि बिब्बी वह रास्ता चुने। शरारती बिब्बी को पढ़ने भेजा तो उसने मास्टरजी की चोटी काट दी। छोटी पौध की बढ़त जल्दी नज़र आती है। बिब्बी सात बरस की हो चुकी थी। मन गीतों में रमने लगा था। एक रोज़ बिब्बी के स्कूल एंजेलिना योवर्ड का दौरा लगा। इत्तिफ़ाक़न, वह बिब्बी की ही कक्षा में पहुँची। बिब्बी पहचान गई और हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘आप गौहर जान हैं न? आप भी ठुमरी गाती हैं न?’’—एंजेलिना योवर्ड उर्फ़ गौहर जान बोलीं, ‘‘क्या तुम भी गाती हो?’’ फ़रमाइश पर बिब्बी ने ख़ुसरो का कलाम गा दिया। कलाम सुनते ही गौहर बोल पड़ी, ‘‘इसे तालीम क्यों नहीं दिलवा रहे? तालीम मिली तो यह एक दिन ज़रूर मल्लिका-ए-ग़ज़ल बनेगी।’’ थक-हारकर मुश्तरीबाई ने छोटी-सी बिब्बी को तालीम के लिए बड़े-बड़े उस्तादों के पास भेजना शुरू कर दिया और उम्र के साथ साथ वह फ़न का ज़ीना चढ़ने लगी। मोहम्मद अता ख़ाँ बिब्बी के गुरु बने। उन्होंने बिब्बी को वह सब कुछ सिखाया जो एक गुरु अपने प्रिय चेले को सिखाता है, लेकिन बिब्बी को शास्त्रीय संगीत पसंद नहीं था। उस्ताद डाँट-डपटकर सिखाने की कोशिश करते थे। इससे परेशान होकर एक दिन बिब्बी उस्ताद को छोड़ आई, लेकिन जल्दी ही गुरु की कमी खलने लगी और दुबारा उनके पास चली गई और अधूरी तालीम पूरी करने में जुट गई।

तेरह की उम्र तक आते आते बिब्बी की शोहरत फूल की ख़ुशबू की मानिंद आस-पास फैलने लगी। बिब्बी, अब अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी के नाम से जानी जाती थी। उसी समय बिहार के एक राजा ने अख़्तरीबाई को गाने के लिए बुलाया। नीयत में खोट लिए वह राजा अख़्तरीबाई पर लकड़बग्गे की तरह झपटा और मासूम-मन पर ज़िन्दगी भर के ज़ख्म दे गया। अख़्तरीबाई ने अबोध उम्र में ही एक बच्ची शमीमा को जन्म दिया। अख़्तरीबाई, सन्नो (शमीमा) को ता-उम्र बहन कहकर पुकारती रही। यह बात बहुत सालों बाद हवा में आई कि शमीमा, अख़्तरीबाई की बहन नहीं, बेटी थी। बहरहाल, घाव भले भर जाए पर निशान कभी नहीं छुपते। लेकिन इतनी कम उम्र में साँप का डंक झेलने वाली अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी की आवाज़ ने उस ज़हर को भी मीठे सुरों में बदल दिया, पर आवाज़ से दर्द नहीं गया। दोनों का मिश्रण ऐसा बना कि सुनने वाले रात-रात भर तक अख़्तरीबाई को सुनते रहते।

बहुत सालों के बाद की घटना है। जब बनारस में गंगा-जमुना तहज़ीब अपने चरम पर थी। बड़े-बड़े उस्तादों का जमावड़ा बनारस में लगा रहता था। एक रात, जब पूरा बनारस सो चुका था। दूर से, रात की ठंडी हवा में एक आवाज़ बहती हुई गंगा किनारे पहुँच रही थी। उस आवाज़ को सुन, दालान में चारपाई डाले सो रहे बिस्मिल्लाह ख़ाँ उठ खड़े हुए। उनके पास सो रही उनकी पत्नी भी, इस घटना से घबराई-सी उठ खड़ी हुई और पूछा, ‘‘क्या हुआ? क्या अहा… अहा… कर रहे हो? सब ठीक तो है?’’ बिस्मिल्लाह ख़ाँ बोले, ‘‘शशश्श… फूहड़ हो… ध्यान से सुनो, बेगम अख़्तर गा रही है।’’ यह सुन उनकी पत्नी माथा पीट कर वापस सो गई, लेकिन बिस्मिल्लाह ख़ाँ, जब तक आवाज़ आती रही, बैठकर सुनते रहे।

अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी शादी के बाद बेगम अख़्तर हो गईं। शौहर ने गाने के लिए मना कर दिया तो गृहस्थी सँभाल ली। सब कुछ होने पर भी, वह बीमार रहने लगी। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए उनका सिगरेट और शराब पीना बढ़ गया। लेकिन मर्ज़ कुछ और थी। डॉक्टर-हकीम को दिखाने पर पता चला कि बीमारी शरीर की नहीं, मन की है। अपनी पहली मोहब्बत से बिछड़ने का ग़म बेगम अख़्तर झेल नहीं पा रही थीं। आख़िरकार, पाँच साल के लंबे अंतराल के बाद उन्होंने दुबारा गायकी को छुआ।

ऐसे कितने ही क़िस्से और भी रहे हैं उस मल्लिका-ए-ग़ज़ल के। क़िस्से तब तक ख़त्म नहीं होते जब तक ज़िंदगी ख़त्म नहीं हो जाती। बेगम अख़्तर के क़िस्से भी 1974 तक चलते रहे। अहमदाबाद में, एक शो के दौरान गाते-गाते बेगम अख़्तर की तबीयत ख़राब हो गई। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनका जिस्म फिर नहीं लौटा। हाँ… उनकी आवाज़ ज़रूर हर रात लौटती है। किसी सुनसान गली में, मोहब्बत में डूबे आशिक़ों, टूटे दिलों तक—किसी नदी के किनारे को खोजती हुई, रिसते आँसुओं के रूप में… किसी अटरिया पर, किसी के इंतिज़ार में, साथ देती हुई।

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