‘भोपाल के रूप में मैंने अपना ही कुछ खो दिया’

मंज़ूर एहतेशाम से प्रियंका दुबे की बातचीत

मंज़ूर एहतेशाम (1948–2021) भोपाल के वह पहले लेखक थे जिनका साक्षात्कार ‘तहलका’ (हिंदी) के लिए मैंने अपने बिल्कुल शुरुआती दिनों में किया था। उसके बाद भी उनसे कई बार मिलना हुआ, लेकिन साल 2011 की सर्दियों की वह पहली मुलाक़ात आज भी कल की तरह ही याद है।

यह 22 की उम्र में किसी लेखक से मेरा पहला इंटरव्यू था। मैं थोड़ा नर्वस भी थी। मैंने मुलाक़ात से पहले उनके दो उपन्यास ख़रीदकर पढ़े और फिर तैयारी के साथ सवाल बनाकर ले गई। मैंने उनके दो उपन्यास पढ़े हैं… सिर्फ़ इस एक बात से मंज़ूर साहब इतना खुश हो गए कि देर तक हैरानी से भरकर हँसते रहे। ‘‘जीती रहो बेटा, जीती रहो, यूँ ही पढ़ना हमेशा, किसी को भी पढ़ो, मगर पढ़ना…’’ यह कहते हुए वह देर तक हँसते ही रहे। मुझे उनकी वह हँसी आज भी याद है—हैरानी में डूबी हुई हँसी। यह सोचती हूँ तो दिल जाने क्यों पीड़ा से भर आता है।

इसके बाद भी भोपाल गैस त्रासदी इत्यादि की स्मृतियाँ डॉक्यूमेंट करते समय उनसे कई मुलाकातें रहीं। कोएट्ज़ी, पामुक और निर्मल वर्मा हमारी पसंद के कॉमन लेखक थे; जिनके काम पर भी ख़ूब गप्प होती रही। यहाँ प्रस्तुत साक्षात्कार सर्वप्रथम ‘तहलका’ (हिंदी) के मध्य प्रदेश संस्करण में 2011 में प्रकाशित हुआ था। इस प्रस्तुति में प्रयुक्त तस्वीरें भी तब की ही हैं, इन्हें राजेंद्र सिंह जादौन ने खींचा था। तब यह साक्षात्कार इस नोट से शुरू हुआ था :

किसी भी शहर के पुराने हिस्सों में अक्सर आपको वह इमारतें और वह लोग मिल जाते हैं जिन्होंने उस शहर के इतिहास को अपनी आँखों के सामने से न सिर्फ़ गुज़रते हुए देखा बल्कि उसे अपने वजूद में घटता हुआ भी महसूस किया है। पुराने भोपाल की एक बेनूर-सी सड़क के किनारे बनी एक इमारत में एक ऐसे ही मशहूर लेखक रहते हैं, जिन्होंने इंसानी ज़िंदगी की उलझन और भटकाव को पन्नों पर दर्ज करते हुए अपनी उम्र की 62 बारिशें गुज़ार दीं। पद्मश्री से सम्मानित इस लेखक ने मुस्लिम समुदाय की मनोदशा पर विभाजन के प्रभाव और आज़ाद हिंदुस्तान में मुसलमानों की ज़िंदगी में हो रहे बदलावों को अपने उपन्यासों में बारीकी से उतारा है। बात हो रही है ‘सूखा बरगद’ और ‘बशारत मंज़िल’ सहित पाँच प्रसिद्ध उपन्यासों, कई कहानी-संग्रहों और नाटकों के लेखक मंज़ूर एहतेशाम की जिन्होंने यहाँ अपनी रचनाओं के साथ-साथ अपनी ज़िंदगी और लेखन को गहरे तक प्रभावित करने वाले सभी आयामों पर बात की है।

— प्रियंका दुबे

मंज़ूर एहतेशाम │ स्रोत : राजेंद्र सिंह जादौन

जिस दौर में भोपाल में आपका जन्म हुआ था, उस वक़्त तक इस छोटे से शहर में उपन्यास लिखने की कोई मज़बूत रिवायत स्थापित नहीं हुई थी। ऐसे में आपका साहित्य से परिचय कैसे हुआ? लेखन की शुरुआत कैसे हुई?

शुरुआत तो घर में आने वाले उर्दू रिसालों को पढ़ने से हुई। फिर स्कूल में चार्ल्स डिकेंस की ‘ओलिवर ट्विस्ट’ और ‘डेविड कॉपरफ़ील्ड’ से परिचय हुआ। तब पढ़ने में रुचि तो थी, पर साहित्य से मेरा असली परिचय मेरे एक दूर के रिश्तेदार नफ़ीस भाई ने कराया। जब मैं छोटा था, तब एक दफ़े वह कराची से भोपाल आए और उन्होंने मुझे दोस्तोयेवस्की की ‘ब्रदर्स कारमाजोव’ तोहफ़े में दी। बस वहीं से पढ़ने-लिखने का सिलसिला शुरू हो गया। मैंने क्लासिकल के साथ साथ पॉपुलर फ़िक्शन भी ख़ूब पढ़ा। तभी इंजीनियरिंग में दाख़िला हो गया, पर मैं कॉलेज में भी एक पत्रिका निकालने लगा। फिर मन नहीं लगा तो अंतिम वर्ष में मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ दी और एक दोस्त की दवाइयों की दुकान में बैठने लगा। मैं वहाँ भी लिखता रहता। फिर मेरे प्रिय दोस्त सत्येन (कुमार) मुझे मिले। उनके ज़रिए और भी कई लेखकों से मेरा परिचय हुआ। तभी मेरी पहली कहानी ‘रमज़ान में मौत’ भी प्रकाशित हुई। इस तरह जो लिखने-पढ़ने का सफ़र शुरू हुआ, वह आज तक जारी है।

आपके सबसे प्रसिद्ध उपन्यास ‘सूखा बरगद’ का नायक सुहेल क्या आपका ही प्रतिबिंब है?

जी हाँ, सुहेल काफ़ी हद तक मेरे ही जैसा है। हालाँकि ‘सूखा बरगद’ को लिखने के दौरान मैंने ख़ुद को अपने दो प्रमुख पात्रों—रशीदा और सुहेल में जैसे बाँट दिया था। ये दोनों ही पात्र मेरे ही जैसे हैं और मेरे दिल के बहुत क़रीब हैं।

आपके ज़्यादातर उपन्यासों और कहानियों के मुख्य पात्रों का जीवन किसी बड़ी सियासी घटना और उसके नतीजों का हिस्सा बनकर रह जाता है। आपके पात्र बड़े राजनीतिक परिवर्तनों के आम ज़िंदगी पर पड़ रहे असर को लगातार सहते हैं। क्या आपको लगता है कि इंसान की निजी ज़िंदगी का लैंडस्केप उसके देश या शहर में हो रहे राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों से पूरी तरह बदल जाता है?

हाँ, वाक़ई चीज़ें बिल्कुल बदल जाती हैं। जिस वक़्त मैं ‘सूखा बरगद’ लिख रहा था, उस वक़्त मुझे लगा कि बदलते राजनीतिक सामाजिक परिवेश में सुहेल का कायांतरण होना ही चाहिए। इसके सिवा कोई विकल्प नहीं था। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि राजनीतिक पतन शायद हमें ऐसा करने पर मजबूर करता है। पर हाँ, सुहेल के चरित्र में आया परिवर्तन अंतिम नहीं था। वह शायद महज़ एक भटकाव था। इसके बाद हो सकता था कि वह सुधर जाता या शायद और भी ज़्यादा कट्टर हो जाता।

‘सूखा बरगद’ की रचना के पीछे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को फाँसी पर चढ़ाए जाना भी एक प्रेरणा रहा है। आख़िर भुट्टो की मौत में ऐसा क्या था जिसने आपको भीतर तक झकझोर दिया?

मेरी नज़र में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो एक सोशलिस्ट थे और उन्हें मैंने हमेशा एक नायक की तरह देखा। पाकिस्तानी तानाशाहों से मैं हमेशा नफ़रत करता रहा, पर भुट्टो की मौत ने तो जैसे सारी सीमाएँ ही तोड़ दीं। पहली बार मैं निजी तौर पर इस व्यावहारिक निर्णय पर पहुँचा कि मज़हब के नाम पर बने एक देश में इंसान की ज़िंदगी का यही दर्दनाक अंत है। मुझे लगा कि पाकिस्तान में इंसानों का भविष्य यही है। इसलिए ‘सूखा बरगद’ की पात्र रशीदा अंत तक पाकिस्तान नहीं जाती, बल्कि अपने लोगों के बीच हिंदुस्तान में रहना चाहती है।

पश्चिमी लेखन-शैली और मूल्यों वाले मुस्लिम एशियाई लेखकों का आप पूर्वी समाजों में क्या स्थान देखते हैं?

यह बहुत दुर्भाग्य की बात है कि आज भी एशिया में मुस्लिम लेखकों को ज़्यादा नोटिस नहीं किया जाता और वह महत्त्व नहीं दिया जाता जो उन्हें मिलना चाहिए। इसकी बड़ी वजह यह है कि मुस्लिम समाज आज तक शिक्षा को ठीक से परिभाषित नहीं कर पाया है। अस्ल में शिक्षा विकास की एक प्रक्रिया है, पर ज़्यादातर लोग इस मामले में भ्रमित ही रहे हैं।

आप शुरुआत से ही अँग्रेज़ी लेखकों से काफ़ी प्रभावित रहे हैं, फिर आपने हिंदी भाषा को ही अपने लेखन के माध्यम के तौर पर क्यों चुना? आज आप हिंदी लेखन के सामने किन बड़ी चुनौतियों को देखते हैं?

मैं हमेशा आम आदमी की भाषा में लिखकर ‘मास’ तक पहुँचना चाहता था, इसलिए मैंने हिंदी को चुना। जहाँ तक हिंदी लेखन की चुनौतियों की बात है तो पैसे के हिसाब से आज भी हिंदी के लेखक के पास कुछ नहीं है। इसके पीछे मुख्य वजह प्रकाशक की बेईमानी है। आज भी हिंदी के लेखकों को रॉयल्टी नहीं मिलती और न ही उनकी किताबें पाठकों तक पहुँच पाती हैं।

आपके उपन्यासों में भोपाल हमेशा एक पात्र के तौर पर मौजूद रहा है। ऐसे में पिछले कई सालों में भोपाल में हुए राजनीतिक और आधुनिक बदलावों को आप कैसे देखते हैं?

भोपाल का विकास तो हुआ, पर वह विकास कई मायनों में नकारात्मक भी रहा। पुरानी विरासत को तोड़कर नई इमारतें बनाना कहीं से भी विकास नहीं। विरासत को सहेजना भी ज़रूरी है। इन मायनों में आज इस शहर को लेकर मेरे अंदर एक गहरा ‘सेंस ऑफ़ लॉस’ रहता है। ऐसा लगता है कि जैसे भोपाल के रूप में मैंने अपना ही कुछ खो दिया हो।

तकनीकी विकास की वजह से ‘ई-ब्लाग्स’ जैसे कई नए प्रकाशन के मार्ग खुल गए हैं। ऐसे में आप नए युवा लेखकों की लगातार आ रही ताज़ा रचनाओं को किस तरह से देखते हैं?

अब लिखने का मूल मुहावरा काफ़ी हद तक बदला है; पर ज़्यादातर काम सिर्फ़ कहानी में ही हो रहा है, उपन्यास में नहीं। नए लेखकों ने पिछले 15 सालों में हुए बदलावों को एक ऐसे स्पेस में पकड़ने की कोशिश की है जिसे सीधे-सीधे देखा नहीं जा सकता, पर महसूस किया जा सकता है। लिखने की नई तकनीक सामने आ रही है। यह बहुत अच्छी बात है। मुझे नए लोगों में काफ़ी ऊर्जा दिखाई देती है। लेकिन कहानी के साथ-साथ अगर उपन्यासों में भी ये सभी प्रयोग हों तो अच्छा रहेगा।

आपके प्रिय लेखक कौन हैं? जब आपने लिखना शुरू किया था, तब से आज के हिंदी लेखन परिदृश्य में आप क्या प्रमुख बदलाव महसूस करते हैं?

समकालीन लेखकों में मुझे ओरहान पामुक, कोएट्ज़ी और अरुंधति रॉय का लेखन ख़ासा पसंद हैं। हिंदी में कृष्णा सोबती और निर्मल वर्मा मुझे बहुत भाते रहे हैं। आज हिंदी लेखन में भाषा के स्तर पर सतर्कता बढ़ी है। किताबों का उत्पादन भी बेहतर हो गया है। पहचान भी धीरे-धीरे मिलने लगी है। पर हाँ, आज भी हिंदी के लेखक को ठीक से पैसे नहीं मिलते। इस मामले में अभी हमें काफ़ी लंबा सफ़र तय करना है।

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प्रियंका दुबे सुपरिचित और सम्मानित पत्रकार हैं। वह इन दिनों दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं।

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