‘प्रेम में मरना सबसे अच्छी मृत्यु है’

इस सृष्टि में किसी के प्रेम में होना मनुष्य की सबसे बड़ी नेमत है। उसके सपनों के जीवित बचे रहने की एक उम्मीद भरी संभावना। मोमिन का एक मशहूर शे’र है :

तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता

यह वही शे’र है जिसके बदले में ग़ालिब ने अपना पूरा दीवान लौटा देने की बात कही थी। सविता सिंह के नवीनतम काव्य-संग्रह—‘खोई चीजों का शोक’—को पढ़ते हुए ज़िंदगी में किसी प्रिय चीज़ की कमी का एहसास पूरी कविता में शिद्दत से महसूस होता है। एक ऐसी अनुपस्थिति जो जीवन का स्थायी भाव बन चुकी है। बुद्ध का कथन है—‘जीवन दुःख है’। निराला इसी भाव का संप्रेषण अपनी शोक कविता में इस तरह से करते हैं—‘दुःख ही जीवन की कथा रही’। ‘सरोज स्मृति’ हिंदी में अपने ढंग का एकमात्र शोक-काव्य है। अपनी युवा पुत्री की असमय मृत्यु पर लिखी इस कविता में करुण भाव की प्रधानता है। इसमें निराला का अपना जीवन भी आ गया है। कवि अंत में कहता है कि बेटी मैं अपने बीते हुए समस्त शुभ कर्मों को तूझे अर्पित करते हुए तेरा तर्पण करता हूँ।

लेकिन सविता सिंह के इस संग्रह की कविताओं में करुण भाव के साथ-साथ हम जीवन के प्रति एक निसंग भाव भी महसूस करते चलते हैं। ऐसी मनःस्थिति अक्सर जीवन के प्रति एक गहरे लगाव के बाद किसी गहरे आघात से पैदा होती है। लेकिन इस निसंगता का अर्थ अवसाद एवं कर्तव्य विमुखता नहीं है। यह ज़िंदगी के संघर्षों से पलायन नहीं है।

इस संग्रह की पहली कविता में ही जीवन जीने की ललक एक गहरे कर्तव्य-भाव से दीप्त है। अपने लिए न सही बच्चों के लिए एवं उनकी अधूरी इच्छाओं के लिए अभी जीना है। यहाँ प्रेम का रूपांतरण एक विरल वात्सल्य रूप में हम देखते हैं। कविता की पंक्तियाँ हैं—‘बच्चों की इच्छाएँ मुझसे बातें कर रही हैं / उनकी ज़िद मुझमें प्राण भर रही है।’ यह एक माँ की ममता और प्यार है जो निर्विकार भाव से व्यक्त हो रहा है। इस प्रेम में वासनामय आसक्ति नहीं, बल्कि उसकी सात्विक चाह है। एक कामना से भरी उम्मीद की लौ जो जीने का संबल है—‘हम मिलेंगे ही जब सब कुछ समाप्त हो चुका होगा / इस पृथ्वी पर सारा जीवन’। प्रेम की यह मनोभूमि मन की एक चरम उदात्त अवस्था है, जहाँ सिर्फ़ मिलन ही एकमात्र अभीष्ट है, बाक़ी चीज़ों का अब कोई मतलब भी नहीं। विशेष रूप से वासना अब जीवन से तिरोहित हो चुकी है। अब उसके होने न होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। प्रेम अब इन चीज़ों से बहुत ऊपर उठ चुका है। जो प्रेम कभी वासनाओं से घिरा एवं शारीरिक आकर्षणों से बँधा था, अब उसका प्लेटोनिक रूप में रूपांतरण हो चुका है। वह नि:स्वार्थ भाव से जीवन के आध्यात्मिक क्षितिज को छू रहा है। वह सृष्टि की परम सात्विकता में अपने को खो देना चाहता है। कविता की एक पंक्ति है—‘प्रेम में मरना सबसे अच्छी मृत्यु है।’ इस पंक्ति का भाव जीवन में प्रेम की अहमियत को और मृत्यु की सार्थकता को व्यक्त करता है।

काव्य-संग्रह में कई जगह वासना की तुच्छ स्थितियों की अभिव्यक्ति भी द्रष्टव्य है—‘एक स्त्री जो अभी अभी गुजरी है / वह उसी शाम की तरह है / जिसने मेरा क्या कुछ नहीं बिगाड़ दिया / तुम रहो वासना की तरह ही।’ शाम यहाँ मृत्यु और वासना का रूपक है और यह स्त्री एक अन्य स्त्री है। कभी-कभी जीवन में देखते-देखते एक हरा-भरा संसार उजड़ जाता है। यह सब कुछ अचानक एक पल में घटित होता है। मृत्यु का जीवन से एक फ़रेब का रिश्ता रहा है। अपने प्रिय के वियोग में बारंबार कविता में निजता का अतिक्रमण स्वाभाविक है। यह जीवन से गहरे लगाव एवं राग की परिणति है। इसे अवसाद में आत्म-निर्वासन की स्थिति मान लेना एक भूल है। कविता की एक पंक्ति है—‘उन स्त्रियों को भी नहीं / जिन्हें उसे लेकर कई भ्रम थे / जो अब तक मृत्यु के बारे में बहुत थोड़ा जानती हैं / वे दरअसल स्वयं मृत्यु हैं।’ एक आग का निमंत्रण उसने स्वीकार कर लिया था : ‘बग़ैर मुझसे सलाह किए / एक पत्ता डाल से लगा हुआ था किसी तरह / पतझड़ में आज वह भी गया।’ यह रूपक ओ हेनरी की कालजयी कहानी ‘द लास्ट लीफ़’ की याद दिलाता है। कथा-नायक उस आख़िरी पत्ते के लिए अपनी जान गँवा बैठता है। कथा नायिका को पता नहीं होता कि वह पत्ता तो कब का झड़ चुका जिससे उसकी ज़िंदगी की डोर बँधी थी। आँखों के सामने जो पत्ता दीख रहा है, वह एक कलाकृति है। परंतु यहाँ यह एक अवांतर प्रसंग है।

यह काव्य-संग्रह समर्पित है उसे जो उसका सबसे अंतरंग था, लेकिन काल ने उसे असमय छीन लिया। पर जिसकी अदृश्य उपस्थिति उसे हर पल होती है—उसे जो है नहीं-सा। वह जो रूह में समाया है, जो रोम-रोम में बसा है और जिसको महसूस किए बिना जीने का कोई मतलब भी नहीं। अपने आराध्य में जिस भक्त की गहरी एवं अटूट श्रद्धा हो उसे हर पल उसके होने का एहसास होता है। वह भौतिक रूप से भले न दिखे, लेकिन वह मन की आँखों से कभी ओझल नहीं होता। विज्ञान कहता है कि तू नहीं है, पर मन इसे नहीं स्वीकारता। मन की मति-गति-स्थिति विज्ञान से भिन्न है। उसकी गति प्रकाश, हवा और आँधी से भी तेज़ है, उसकी मति सांसारिकता की मारी नहीं है एवं वह अपने ही संसार में रमने लगी है जहाँ प्रेम है पर वासना नहीं। जहाँ मन गंगा की तरह निर्मल है। संसार के सारे प्रपंच जिसमें घुलकर तिरोहित हो गए हैं। लेकिन यह ईश्वरीय सत्ता से भिन्न एक मामला है, जहाँ स्मृतियों की सुवास से तन-मन रचा-बसा है। जहाँ प्रेम अपने चरम अभौतिक रूप में जीवन की सहयात्रा में चंदन-पानी की तरह या बादल-बिजली की तरह विद्यमान है।

इस संग्रह को शोक-कविताओं का संग्रह अगर माना जाए तो कोई ग़लत नहीं होगा। दुःख इन कविताओं में एक स्थायी भाव की तरह है। यह दुःख पूरी कविता के रेशे-रेशे में व्याप्त है। इसे लेकर कवि के मन में कोई विक्षोभ भी नहीं है। उसके प्रति एक स्वीकार भाव है। जीवन में अचानक आए इतने बड़े दुःख ने उसके भीतर सहने की शक्ति दी है। उसका हृदय बड़ी से बड़ी मुसीबतों को अब झेल सकता है। इस दुःख ने विपरीत परिस्थितियों में उसे लड़ने की शक्ति दी है। इसकी पुष्टि इन पंक्तियों से होती है—‘दुःख को सँवारने की अनेक कोशिशें कीं मैंने / मगर वे मेरा ही चेहरा बिगाड़ने में लगे रहे / मेरा चेहरा किसी फूल सा हो सकता था / खिली धूप में/ मैंने कब असंख्य ख़ुशियाँ चाही थीं / मेरे लिए तो यही ख़ुशी थी / कि किसी शाम ठंडी हवा में फूलों को देखते / जो इस बात से प्रसन्न होते / कि उन्हें देखने के लिए उत्सुक आँखें बची हुई हैं इस पृथ्वी पर।’ उपरोक्त पंक्तियों में कवि ने अपना निजी दर्द उड़ेलकर रख दिया है। यह इस समय की विडंबना है कि आप चाहे अपना दिल निकालकर दे दें, पर उसका कोई प्रतिदान मिलने वाला नहीं है। नेकी के बदले अब बदी मिलती है। समय पर कोई काम नहीं आता। यह आज का यथार्थ है। इन कविताओं में कहीं-कहीं चाक्षुष बिम्ब भी देखने लायक़ हैं। कवयित्री की एक मामूली-सी इच्छा है कि वह किसी शाम फूलों को देखती रहे। फूल इस बात से ख़ुश हैं कि उन्हें कोई आत्मीयता से देख रहा है।

इस संग्रह में मृत्यु के कई रूपक हैं—कोई चिर परिचित प्रेमिका, कोई एक शाम, कोई साँवला रंग, कोई डरावनी चिड़ियाँ जो ख़ून में शामिल हो।

संग्रह की अंतिम कुछ कविताएँ अपने संप्रेषण में बिल्कुल साफ़ और सहज हैं। कभी-कभी लगता है कि काश सारी कविताएँ इतनी ही पारदर्शी होतीं। मेरे विचार से ‘मैं आती हूँ तुम चलो’ शीर्षक कविता इस संग्रह की एक श्रेष्ठ रचना है। इसमें संवेदना अपने उफान पर है। कविता का भाव यही कि मैं आती हूँ—सब समेटकर। यहाँ समय की कोई हड़बड़ी नहीं, न ही प्रिय के विदा होने की लिजलिजी भावुकता और आँसुओं की बाढ़ है। कवि स्थितप्रज्ञ अवस्था में मृत्यु के आघात को सह चुका है। उसके हृदय में भावों का ज्वारभाटा थम चुका है। कविताएँ जीने का संबल भी हैं। जब-जब हालात तोड़ते हैं कवि को, जब-जब वह गिरता है, कविताएँ उसे उठा लेती हैं। वह शक्ति पाने के लिए कविताओं के पास जाता है। और इस शक्ति-अर्जन में वह अकेला नहीं है। सारा विश्व उसके साथ है। वह इस संसार में अकेला नहीं है। वह सबके साथ है। आजकल शब्दों की गरिमा घट रही है और यह क्षरण बहुत तेज़ है। शब्दों की फ़िज़ूलख़र्ची पूरी सभ्यता पर एक प्रश्नचिह्न है। आख़िर समाज किस ओर जा रहा है?

कविता की एक मूल्यवान पंक्ति है—‘प्रेम में मरना सबसे अच्छी मृत्यु है।’ यह संग्रह भले ही एक शोकाकुल मन की अंतर्व्यथा है, परंतु इसकी मूल आत्मा प्रेम है।

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सविता सिंह की कविताएँ यहाँ पढ़ें : सविता सिंह का रचना-संसार

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