प्रेम, दुर्घटना, छत और बीते दिन…

प्रेम

प्रेम जितना बराबर की चीज़ महसूस होता है, उतना है नहीं। हमें लगता है, हम बराबर चलेंगे। पर कभी बराबर चलते नहीं। हमारे प्रेम का आदर्श लैला-मजनूँ हुआ करते हैं। हममें से आधे मजनूँ हो जाना चाहते हैं। चाहते हैं कि किसी को इस हद तक इश्क़ करें कि क़ुर्बान हो जाएँ। पर उतनी न तो हिम्मत हममें हुआ करती है, न जुनून। दुःखद बात यह है कि एक उम्र जी लेने पर भी हम जान नहीं पाते कि प्रेम होता क्या है। प्रेम की परिभाषा हमें कोई और गढ़ कर देता है। हम उसी में अपने प्रेम को फिट करने की कोशिश करने लगते हैं। अपने दिनों को उन्हीं परिभाषाओं के मुताबिक़ ढालने लगते हैं। तब प्रेम क्या कोई मुक़ाम होता है? जिस पर पहुँचकर हम कह देना चाहते हैं कि प्रेम पूरा हुआ। क्या प्रेमी-प्रेमिका से शादी ही प्रेम का पूरा होना माना जा सकता है? अगर प्रेम कोई भाव है तो क्या उसकी कोई गति होती है?

प्रेम में दो लोग सक्रिय रूप से हों ही मैं ऐसा नहीं मानता। हम प्रेम को हमेशा समझने की कोशिश करते हैं, जैसे मैं कर रहा हूँ। पर वह समझ आ जाने वाली चीज़ नहीं हैं। यह बात इस आधार पर कह रहा हूँ कि प्रेम की व्याख्या वस्तुगत है। प्रेम का कोई स्थिर या एक स्वरूप हो, ऐसा ज़रूरी नहीं। लेकिन एक बात तय है। प्रेम को न महसूस कर पाने वाले या केवल चयनित प्रेम को महसूस करने और चाहने वाले हम लोग प्रेम के हत्यारे हैं। हमें जब कभी मौक़ा मिलता है, हम प्रेम को समाप्त करने को षड्यंत्र रचने लगते हैं। हमने एक ऐसी दुनिया बनाई है जिसमें हत्या क्षम्य है, पर प्रेम नहीं। लेकिन हम और आने वाले नए लोग इस दुनिया को बदल देंगे। वे प्रेम के खाँचों को तोड़ देंगे और उसे विस्तार देंगे। उस दुनिया में प्रेम के हत्यारों की संख्या कम होगी। हम शायद तब न बचें। पर प्रेम बचेगा।

दुर्घटना

हमने सोचा ही कहाँ था। एक दिन हम ट्रेन में चढ़ेंगे और ट्रेन रास्ता भटक जाएगी। पहाड़ उतर रहे होंगे कि पहाड़ मिट्टी बनकर बह निकलेगा। तुमनें एक दिन कहा तो था कि पुराने ज़माने में आसमान से तेज़ाब की बारिश होती थी। मुझे लगा था कि लावनी करते हुए तुम बस एक कहानी सुना रहे हो। हक़ीकत और कहानी में अंतर होता है। अब समझ आया कि कहानी लिखी भी जा सकती है और उसे हक़ीक़त भी बनाया जा सकता है। अब जब नदी पार कर रहे हैं तो एकाएक बाढ़ आ रही है। कहाँ से आता है इतना पानी। लगता है नदियाँ हमारे इंतिज़ार में पानी रोककर रखती हैं, कि हम आएँ और पानी खोल दे। रह-रहकर जब ज़मीन हिलती है तो कोई कहता है हल्लन था, पर मुझे लगता है कि वह आदमी करवटें बदल रहा है। सड़क पर चलते हैं तो धूप बिछी रहती है। जब धूप माँगते हैं तो पानी आता है। वह सोता हुआ आदमी शायद प्रकृति से ही सीखता है। हम सब उसी का हिस्सा हैं, इसलिए जिस भी तरह चाहे, वह हमें खा सकती है। शाम को क्या खाना है। चावल नहीं बचा है। पजेब साहब के पास रखा दी है। चावल और चूड़ा ले आएँगे। आँधी में इस बार सब बौर झर गया। दो-चार आम लगा तो बच्चा सब तोड़कर ले गया। काम कुछ मिले तो करें। बीमारी जाए तभी जी पाएँगे। शहर नहीं जाएँगे। यहीं मजूरी करेंगे। चलते रहे तो ठीक, नहीं तो यहीं मिट्टी में दबा देना।

छत

शाम होते ही हम छत पर चढ़ जाते—लक्की और मैं। दोनों अठन्नी-अठन्नी मिलाकर दो पतंगें ले आते। अँधेरा होने तक हवा में गुँथे रहते। अँधेरे में पतंग उड़ाने की तरकीबें सोचा करते। एक दिन लक्की ने हार मान ली। मैं जुटा रहा। कुछ समय बाद समझ आया कि हवा की दिशा ही पतंग की दिशा हो जाती है। अधिकतर हवा पूर्व दिशा की ओर होती। वहीं जहाँ होटल की दीवार थी। पतंग हमेशा उसमें अटक जाती। एक दिन मैंने भी तय कर लिया कि अब बस पंद्रह अगस्त को ही पतंग उड़ाया करूँगा। उसके बाद पंद्रह अगस्त भी छूट गया। मेरे साथ-साथ सभी ने पतंग उड़ाना छोड़ दिया।

उन दिनों मैं छत पर बैठकर शाम को उतरते देखता। आसमान को रंग बदलते महसूस करता। कभी सोचता कि एक आसमान के पास इतने सारे रंग कैसे हैं। मैं आसमान क्यों नहीं हूँ? एक बार अचानक आसमान में इंद्रधनुष दिखा। जितना अचानक कह रहा हूँ उतना अचानक था नहीं। तब मैं नीचे घूम रहा था और नेहा दीदी ने आवाज़ लगाकर छत पर बुलाया था। उस दिन पता चला कि इंद्रधनुष सच में होता है। और उसमें सात रंग भी होते हैं। उस दिन हवा में घुल जाने तक मैं उसे देखता रहा। थोड़ी देर में इंद्रधनुष नहीं था।

कभी लगता है कि छत पर उस तरह होना और वैसा महसूस करना मेरे लिए सुख और एकांत का एक ख़ाका बन गया है। मेरे ख़ुश होने की एक कसौटी बन गया है। यानी अगर मैं ख़ुश हूँ तो मैं हूबहू वैसा ही महसूस करूँगा जैसा मैं छत पर करता था। अपनी छत के अलावा मुझे कभी वैसी हवा कहीं महसूस नहीं हुई। जब हवा महसूस नहीं होती तो कुछ भी महसूस नहीं होता।

इन सभी घटनाओं को यहाँ से अतीत बनते हुए देख रहा हूँ। ये स्मृतियाँ भी हैं और अनुभव भी। छत अब भी वहीं है। अब हम जाते नहीं। न जाने के हज़ार कारण हो सकते हैं। जिनको समझने बैठें तो पूरी पोथी बन सकती है। पर वह हमें नहीं करना। हम नहीं समझना चाहते। जो जैसा है, हमें स्वीकार्य है। छत से इस तरह अलग रहना भी मुझे उससे दूर नहीं कर पाया। स्मृतियों में मैं उसे जी लेता हूँ। बस गर्मी की शामों में पानी का छिड़काव कर सकेर नहीं पाता।

माचिस की डिबिया जितनी वह छत मेरे चिर एकांत की अधूरी साथी है। कितनी भी बड़ी छत मुझे उस जैसा विस्तार नहीं दे सकती। हवा, बारिश, ताप, अँधेरा, मौन और संगीत कुछ भी उससे छूटा नहीं। उसने सब दिया। बारिश में मिट्टी की ख़ुशबू भी। मैं अगर एक छत बनाने की सोचूँ भी तब भी वैसी छत नहीं बना पाऊँगा जैसी छोटू मिस्तरी ने मेरे लिए बनाई थी। मेरे लिए नहीं बनाई थी, फिर भी कह रहा हूँ। इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि वह मेरी छत है… और किसी की नहीं।

बीते दिन

उसने कहा था। उस घर से चले जाने के बाद उसे कोई याद नहीं करेगा। उसे भी पता है उसने झूठ कहा था। मैंने भी अब वह घर छोड़ दिया है। वहाँ भटकता भी नहीं। बस दिन भटकते हैं। मन भटकता है। उधर नुक्कड़ से सीधा नहीं जाता। दूसरी गली में मुड़ जाता हूँ। मुड़ने पर लगता है, मेरे पीछे कोई चल रहा है। जो मेरे बैग को ऊपर उठाकर इस तरह छोड़ देगा कि मैं लड़खड़ा जाऊँगा। फिर हँसती हुई एक गाली हवा में तैर जाएगी। मैं बेशक उसे याद नहीं करता। पर उस रास्ते में कुछ है जो मुझे खींचता है। जो मेरे साथ हमेशा चला आता है।

कभी लगता है कि मैं वहीं उसी घर में हूँ, अब भी। सुबह उठने से पहले लगता है, मेरे पैरों के बिल्कुल सामने लोहे का वही नीला दरवाज़ा है। मैं उठूँगा तो दरवाज़े की कुंडी में अख़बार में लिपटी फूल-माला टँगी होगी। पर आँख खोलता हूँ तो सामने हल्के पीले रंग की इस दीवार को पाता हूँ। लगता है एक क्षण में दुनिया बदल गई हो। जैसे सपना टूट गया हो। पर वह भ्रम ही होता है। अब तो सपने भी कम आते हैं। लगता है मेरे दिन सपनों में बीत जाते हैं, रात को देख लेने लायक़ सपने मैं बचा नहीं पाता हूँ।

सपने सच्चाई में बदल जाने पर उतने रूमानी नहीं रहते। कुछ महसूस ही नहीं होता। शायद कुछ को होता हो। मुझे नहीं होता। सपने के छूट जाने का एक भाव रह जाता है। दिन ख़त्म होने से पहले ही वह चुभन में बदल जाता है। उस चुभन का कुछ नहीं किया जा सकता। इसे असंतोष कह सकते हों शायद। इसे महसूस करते ही सब जड़-सा हो जाता है—सब ठंडा। तब कुछ कर नही पाता। तब वह दोस्त याद नहीं आता। उसे याद नहीं करता। बस सपने देखता रहता हूँ। सपनों को कहीं उतारता भी नहीं। वह पढ़ेगा तो सपने में उतर आएगा। हँसेगा और सभी किताबें फेंक देगा। मंदिर में शिवजी की पूजा करेगा और कहेगा कि काशी जाना है। शायद वह अब भी काशी में हो। काशी उसका सपना था।

सर्दी इतनी बढ़ गई है कि न चाहते हुए भी इतना लबादा ओढ़ना पड़ता है। कपड़े कई दिनों में सूखते हैं। सूरज अब मोमबत्ती नज़र आता है। पापा आज कोयला ले आए हैं। बड़ी चाची घर नहीं हैं। कोयला कौन जलाए। बड़े चाचा होते तो इतनी लकड़ी जुगाड़ लेते कि पूरी सर्दी चूल्हे पर घर भर का पानी गर्म हो जाए। पर लोहे की रॉड धुआँ नहीं करती। वह आसान है। उससे भी सावधान रहना होता है। जब छत पर चूल्हा था तब दो बार आग लग गई थी। एक बार तो कुर्सी ख़ाक हो गई। पड़ोस वाली अम्मा नें बताया तो पानी लेकर भागे।

एक बार की बात है। छत पर चाचा सो रहे थे। भरी सर्दी में—छत पर। पड़ोस की अम्मा नें उस दिन भी आवाज़ लगाई। सब फिर बाल्टी उठाकर छत पर भागे। चाचा को ज़रा भी भनक नहीं लगी कि आग फैल गई। पर बिस्तरों तक आग नहीं पहुँची थी। जब शोर मचा तो चाचा की नींद टूटी। आग देखकर चौंके नहीं। चुपचाप उठे। चुपचाप रजाई-बिस्तर समेटा और चुपचाप सीढ़ियाँ उतर गए। कभी-कभी इस घटना को याद करके हम ख़ूब हँसते हैं।

हम कभी-कभी समय पर भी हँसते हैं। हँसते हैं, उसी तरह जिस तरह नहीं हँसना चाहिए। हम अपने पर हँसते नहीं, दया करते हैं। यह बात शायद किसी कविता में पढ़ी थी।

कमरा अँधेरा

उनकी शब्दावली में इसे भागना कहूँगा। मैं भाग रहा हूँ। भागता जा रहा हूँ। पर कहीं पहुँच नहीं रहा। समझ नहीं पा रहा कि किससे भाग रहा हूँ। कहाँ पहुँच जाने की इच्छा लिए फिर रहा हूँ। अब तक ऐसा क्या महसूस नहीं किया जैसा करना चाह रहा हूँ। वह क्या है, जिसे लगातार ढूँढ़ता रहता हूँ—सभी की आँखों में? उसे कोई भी नाम देने से क्यों कतराता हूँ?

अपने लहज़े में मैं उसे भागना नहीं कहूँगा। वह मेरे लिए अवकाश होगा। कुछ दिनों के लिए सबसे निजात। इससे कुछ न भी हो, तब भी कुछ ज़रूर होगा।

मैं सब कुछ को जर्जर नहीं कहूँगा। अब भी बहुत कुछ है जो बचा है भीतर और बाहर दोनों सतहों पर, लेकिन उन्हें देखकर भी उन्हें छू लेने की इच्छा नहीं है। बच रहा हूँ। क्यूँ? पता नहीं।

साफ़ कहें तो इस सब में अपनी भूमिका पहचान लेने की जद्दोजहद में पिछले दिन घुटते रहे हैं। ये दिन भी जा ही रहे हैं। इसमें सब कुछ असंतुलित है। मिसफ़िट है। असंगत है। सब आधा है।

पर जो भी कमी महसूस कर रहा हूँ, उसे उन सभी को कभी बता देने का मन होते हुए भी बता नहीं पाऊँगा। उसे भी कभी नहीं बताऊँगा। वह पूछ भी लेता है, तब भी नहीं। मैं पहले पूरा हो जाऊँगा तब कभी बताऊँगा। यहाँ पूरा होना मृत्यु नहीं है। यह कोई आध्यात्म नहीं है, जीवन है।

मैं क्या करूँ, अगर मेरे सपनों में वह कमरा आता है तो? मैं उस तक नहीं पहुँच पा रहा तो क्या करूँ मैं? किसी से रास्ता पूछने पर कुछ होगा? कोई क्या बताएगा? किसी को कुछ पता भी तो नहीं। अब मैं चैन से सोना चाहता हूँ, उसी अँधेरे कमरे में। तब तक जब तक कि नींद पूरी न हो जाए। लग रहा है सदियों से सोया नहीं। कई दिनों, हफ़्तों, सालों तक सोते रहने की ख़्वाहिश लिए मैं फिर रहा हूँ—उसी अँधेरे कमरे की तलाश में।

सुनो अनुज

मैं एक दिन दुनिया के सभी नियमों को बदल दूँगा। एक शाम को तय करूँगा कि रात भर सोऊँगा नहीं। उसके बाद हर रात को जागा करूँगा। दोस्ती और प्रेम भरे गीत सुना करूँगा और ख़ूब रोया करूँगा। अंदर से सूख जाने के बाद मैं कहूँगा कि दोस्ती और प्रेम कुछ नहीं होते। ये बाज़ार के ईजाद किए भाव हैं। इन सभी दृश्यों में तुम नहीं होंगे। मैं अकेला रहूँगा। उसी कमरे में बंद जिसे मैं अपना बना लेने के ख़्वाब देखा करता हूँ। उम्र में अनुज तुम कभी उसके दरवाज़े तक नहीं पहुँच पाओगे। मैं तुम्हें कभी नहीं बताऊँगा कि मैं कहाँ रहता हूँ।

तुम भले ही प्रेम की कितनी ही व्याख्याएँ करते रहो, पर मैं कभी यह नहीं कहूँगा कि तुम्हारा उसकी ओर आकर्षण प्रेम है। और न ही यह कहूँगा की हमारी दोस्ती प्रेम नहीं है। पर मैं कभी प्रेमी नहीं हो पाऊँगा। न ही कभी उसे प्रेम लिखना सीखा पाऊँगा। न ही तुम्हारा दोस्त रह पाऊँगा।

सुनो अनुज, तुम दुनिया को देखने की अपनी नज़र बनाना। मैं जानता हूँ कि तुम समझदार हो और नासमझ भी। हम हमेशा साथ नहीं रहेंगे। सब दुनियाएँ बदल जाएँगी। लोग भी बदल जाएँगे। मैं भी बदल जाऊँगा। तब कोई सलाह नहीं दे पाऊँगा। देखो तुम प्रेम करना। रजकर करना। वह नहीं जिसे सब प्रेम समझते हैं। किसी और के जैसा नहीं। अपनी तरह का नया प्रेम। उससे प्रेम करना जो तुमसे प्रेम करे, जो तुम्हारी दुनिया में, तुम्हारे लोगों में रम जाए। तुम सब कुछ मुझसे बेहतर जानते हो।

तुम मेरी कोई बात नहीं मानना। यहाँ सब झूठा है। सब अर्थों से ख़ाली है—खोखला। तुम मुझे कभी उस तरह याद मत करना। मैं कुछ नहीं कह पाऊँगा। कोई सलाह नहीं दूँगा। मुझे खोजने की कभी कोशिश नहीं करना। मैं मिल भी जाऊँगा तो वह नहीं रहूँगा, जिसे तुम जानते हो। मैं किसी का नहीं हूँ। तुम्हारा भी नहीं हूँ, अपना भी नहीं। इसलिए अपनी तमाम स्मृतियों से मुझे ग़ायब कर देना। सभी बातों से मेरे संवाद हटा देना। कहीं अटक जाओ को ख़ुद को याद करना। तब आगे बढ़ना। सुनो अनुज, इस दुनिया में अपना बचपना बचाना और अपना ख़याल रखना।

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