वह क्यों मेरा सरनेम जान लेना चाहता है

घड़ी

घड़ी की सुइयाँ रुक गई हैं। वक़्त अब भी बीत रहा है। हम यहाँ बैठे हैं। वक़्त के साथ-साथ हम भी बीत रहे हैं। हम रोज़ सुबह उठते हैं और रात को सो जाते हैं। वक़्त से आधा घंटा देर से खाना खाते हैं। रात देर तक फ़ोन से चिपके रहते हैं। इस पूरी दिनचर्या में एक वक़्त ऐसा नहीं जाता, जब इस घड़ी के बारे में न सोच रहे हों। लेकिन पाँच मिनट निकालकर इस घड़ी में सेल डाल सकने की इच्छा को उगने नहीं दे रहे हैं।

लगता है कि दुनिया हमेशा ऐसी ही थी। हमेशा से यह घड़ी बंद थी और हम सेल नहीं डाल पा रहे थे। हमारे संबंधों में भी सेल बदल लेने का वक़्त आ गया है। लेकिन इच्छा को अब भी ढूँढ़ नहीं पा रहे हैं। क्या हम यह करना चाहते हैं?

हमारे हाथों में हमारी दुनिया सिमट गई है। उसके भीतर और बाहर दोनों भ्रम है। सब तरफ़ भ्रम। अब यही भ्रम हमारी दुनिया है। यही हमारी हक़ीक़त। इसी हक़ीक़त में हमारी ईर्ष्याएँ और आदर एक के बाद एक लहर की तरह आते रहते हैं। हम डूबते-उतराते रहते हैं। इसी से हमारी भाषा और इच्छाएँ बन रही हैं। तुम्हें लगता होगा तुम मौलिक हो, पर ऐसा नहीं है। तुम भी वही सोच रहे हो, महसूस कर रहे हो जो मैं कर रहा हूँ।

ऐसा कैसे होता है कि एक समय में अधिकतर लोग एक जैसा महसूस करने लगते हैं? वे एक जैसा बोलने भी लगते हैं। अधिकतर कामों को एक तरह करने लगते हैं। मैं ऐसा होने की प्रक्रिया पर कुछ नही कहने वाला। सोचने वाला भी नहीं। अपने हर सवाल का जवाब मैं ही थोड़ी ढूँढ़ूँगा। इसलिए इस सवाल को ऐसे ही छोड़ रहा हूँ।

सरनेम

किसी व्यक्ति की पहचान के सूत्र कहाँ-कहाँ होते हैं? उसके परिवार में? शहर या गाँव के किस हिस्से में उसका घर है? उसने कितनी और क्या पढ़ाई की है? भाषा में? वह किस तबक़े से आता है? उसकी जाति क्या है?

बाक़ी चीज़ों को छोड़कर मैं जाति के सवाल पर रुक जाना चाहता हूँ।

मेरा एक नया दोस्त है। वह कई बार मुझसे मेरा सरनेम पूछ चुका है और मैं हर बार बात दाएँ-बाएँ कर देता हूँ। मैं क्यों ऐसा करता हूँ? इसका जवाब फ़िलहाल नहीं दे रहा। मेरे सरनेम में उसकी दिलचस्पी का कारण पूछता हूँ तो वह कोई ख़ास तर्क नहीं दे पाता।

वह क्यों मेरा सरनेम जान लेना चाहता है?

मैं इस प्रक्रिया को इस तरह समझता हूँ। जब हम किसी व्यक्ति से उसका निवास स्थान पूछते हैं तो अपने मस्तिष्क में मौजूद मानचित्र में उसे स्थापित कर देते हैं। वह व्यक्ति कहाँ रहता है इससे हमारे मिलने की संभावनाओं पर प्रभाव पड़ता है। या शायद किसी स्थान विशेष में रहने वाले लोगों का व्यवहार हम उसमें खोजने लगते हों। जब हम किसी से उसका सरनेम पूछते हैं, तब हम उनकी जाति ही जानना चाहते हैं। तब जाति के तय पदानुक्रम में उस व्यक्ति की जाति को स्थापित कर देते हैं। तब यहाँ दो व्यक्ति दो जातियों के प्रतिनिधि बन जाते हैं। बाक़ी सब इसके बाद होता है। इस बाक़ी सब में सब कुछ शामिल है।

किसी व्यक्ति की जाति जानकर हम क्या-क्या तय कर सकते हैं? क्या हम लू और देह के नए संबंधों को रच सकते हैं? या सत्तू की ठंडक के एहसास को बदल सकते हैं? हर्ष और विषाद दोनों को महसूस करने की विशेषता हमें मन देता है। देह देती है। तब उस नए मित्र से की जाने वाली बातों की प्रसन्नता के बीच जाति का प्रश्न किस प्रकार आ जाता है? इस प्रश्न के कई उत्तर हो सकते हैं। जिन पर वह मित्र कई तर्क दे सकता है। लेकिन मुझे कुछ सुनना नहीं है। इस प्रश्न का उत्तर मैं स्वयं खोज लूँगा।

एक बात जो मैं याद दिलाना चाहता हूँ वह यह है कि जातीय गौरव को जो बनाए रखना चाहते हैं, जो दूसरों की जाति जानकर अपना व्यवहार तय करते हैं वे कभी दुनिया को एक बेहतर जगह नहीं बना सकते। उनकी ज़बान पर अगर समानता और बंधुत्व की बातें हों तो उनका वह अर्थ न लेना जो शब्दकोशों में दिया गया हैं। जातिवादी ज़बान पर चढ़ते ही शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं।

चप्पलें

चींटियों ने अगर उन चप्पलों के तलों में घर नहीं बना लिया होता तो अँगूठे की पट्टी को सिलाकर अब तक बरतता। चींटियों को भगाने की क़ुव्वत मुझमें है नहीं इसलिए उन चप्पलों को कूड़ेदान के सुपुर्द कर दिया। जो नई चप्पल लाया, वह अब तक पैर के मुताबिक़ हो नहीं पाई है। कई बार अटककर लड़खड़ा चुका हूँ, गिरते-गिरते बचा हूँ।

घर में और जगह होती तो अब तक इस्तेमाल की हर चप्पल को सँभाल कर रखता। उन्हें रखता ताकि समय समय पर उन्हें देख सकूँ, बीते हुए उन दिनों को देख सकूँ जब दिल्ली को अलग- अलग जगहों से देखना शुरू किया था। एक दिल्ली में कई दिल्लियाँ एक साथ बसती हैं, यह तभी पता चला था।

चप्पलें पैरों को जूते के मुक़ाबले जल्दी थका देती हैं। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चप्पलों से चलना ख़ासा मुश्किल हो जाता है। बसों के पीछे भागने में भी चप्पलों के उतर जाने का डर रहता है। जूते हमेशा पंजों पर कसे रहते है। आप उनकी कसावट को फीतों से तय कर सकते हैं, जबकि चप्पलें एक बार जितना खुल गईं उतनी ही रहती हैं। चप्पलें जूतों के मुक़ाबले ज़्यादा आज़ाद होती हैं और आज़ाद रखती भी हैं। मुझे तो जूते हमेशा से झंझट लगते रहे हैं। इस तरह मैंने जूतों की जगह चप्पलों को चुना। कड़ाके की ठंड में भी जूते नहीं ख़रीदे। जहाँ मौक़ा मिला झट चप्पल उतारकर चौकड़ी लगाकर बैठ गया। इस बार बेमन ख़रीदी चप्पलें अब तक नहीं जमीं। अब अलग डिज़ाइन की एक और जोड़ी चप्पल कनॉट प्लेस से लाऊँगा। भूरे रंग की।

ख़ाली जगह

कविता के बीच रह गए ख़ाली स्थानों को अलग-अलग शब्दों से भरने की कोशिश करता हूँ। तुम मेरे लिए कहीं वही शब्द तो नहीं हो? जिन्हें स्मृति और कल्पनाओं की रौशनी में खोज रहा हूँ। मिलना अभी बदा नहीं है। कविताएँ भी अधूरी रह जा रही हैं। इसीलिए कुछ बोलता नहीं हूँ। इन पंक्तियों के बीच की बातों को मैं लगातार पढ़ रहा हूँ। जो लिखा गया नहीं है, उसे भी पढ़ रहा हूँ। इसी तरह एकांत को भी पढ़ा जाना चाहिए। कविताएँ भी एकांत ही होती है। मेरे लिए कविताएँ कुछ नहीं हो पाईं हैं, इसीलिए एकांत मिला नहीं अभी तक। कभी-कभी ज़रा सा एकांत चख लेता हूँ, बस।

अपने पास रखी कविताओं की सभी किताबों को एक साथ इकट्ठा करके रख चुका हूँ। उन्हें देखकर सोचता हूँ कि उनमें से कुछ किताबों को एक बैठक में पढ़ जाऊँगा। हालाँकि कविताएँ इस तरह नहीं पढ़ी जानी चाहिए। तो किस तरह पढ़ी जानी चाहिए कविताएँ? अब तक तो जान नहीं पाया। शायद पढ़ते-सुनते समझ जाऊँ। तुम्हें भी पढ़ने की कोशिश करते-करते अब समझने लगा हूँ। अब बेहतर समझने लगा हूँ। इसलिए इसलिए…

मैं उस दिन के इंतिज़ार में हूँ जब किसी के लिए कोई कविता मेरे मन में अंकुर की तरह फूट पड़ेगी। उसे किसी को दिखाऊँगा नहीं। पढ़ाऊँगा नहीं। उसे उगने और बढ़ने दूँगा। उसके सूख जाने तक देखता रहूँगा।

इन बातों के साथ कई और बातें हैं जो कहना चाहता हूँ। पर सुन नहीं पा रहा कुछ। बहुत शोर है यहाँ। इसलिए बाक़ी सभी बातों की तरह इस बात को भी अधूरा छोड़ रहा हूँ।

पहाड़

पहाड़ को देखता हूँ तो लगता है कि चढ़ जाऊँगा। कोशिश करता हूँ तो हाँफने लगता हूँ। पहाड़ को देखकर पहाड़ हो जाना चाहता हूँ। पर कुछ-कुछ समय में अपने भीतर से उठते पहाड़ को महसूस करता हूँ तो सोचना बंद कर देता हूँ। मेरे भीतर से उठता पहाड़ आसमान तक जाएगा। तब मैं वो नहीं रहूँगा जो आज हूँ।

पहाड़ पर कम लोग रहते हैं। मेरे साथ भी जो लोग बचे रह गए हैं—एक-एक कर जाते रहेंगे। जाएँगे किस लिए? जटिलता को देखते हुए। मैं जितना कठिन प्रश्न बनता रहूँगा उतने अधिक अभ्यर्थी मुझसे किनारा करते जाएँगे। मुझे उससे समस्या नहीं। जो बचे रह जाएँगे हम उन्हें संख्या में गिनेंगे नहीं।

जब भी पहाड़ मुझे बुलाते हैं मैं कान बंद कर लेता हूँ। ज़रा नहीं सुनता। क्या मेरे बुलाने पर पहाड़ आएँगे? पहाड़ कहीं आते-जाते नहीं। मुझे लगता है मैं नगवई में छूट आया वो पहाड़ ही हूँ जो वहाँ भी है और यहाँ भी। मैं ख़ुद ही ख़ुद को आवाज़ देता हूँ और ख़ुद के ही कान बंद कर लेता हूँ। ख़ुद ही ख़ुद से मिलने निकलता हूँ और बैरंग लौट आता हूँ। अगर मैं पहाड़ न होता तो क्या मुझे यह भाषा आती?

पहाड़ कभी-कभी धँसता भी है। टूटता भी है। बिखर भी जाता है। उसका बिखराव दिखाई देता है। इनसानों का टूट जाना शायद न भी दिखाई देता हो। पर वह मौजूद होता है। हर वक़्त। क्या मेरा टूटना तुम देख पा रहे हो? क्या तुम सुन रहे हो? तुम्हारी दोनों हथेलियों पर चुप्पी पसरी है। वहाँ कुछ लिखा नहीं हैं। पहाड़ का पता भी नहीं। तुम अपनी चुप्पियों को संगीत में बदल सको तो बदल लो। शोर को संगीत से ही काटा जा सकता है। फिर तुम्हें भुलाना भी होगा। तुम भी हथेलियाँ कानों पर रख लो।

तुम

कब से तुम्हें ही सोच रहा हूँ। पहले सोचता था कि यह ज़्यादा दिन नहीं चलेगा। पर अब तक चल गया। मैं हैरान हूँ। तुम्हारी आँखें मेरे मन में अटक गई हैं। कागज़ पर आड़ी-तिरछी रेखाएँ बनाता हूँ तो तुम्हारी आँखें बन जाती हैं। आँखें बंद करता हूँ तो तुम्हारी आँखें दिखाई देती हैं। आँखों के साथ भौंहें भी। किसी की भौंहें भी किसी के दिल में उतर सकती हैं, यह कभी किसी नें बताया नहीं था। तुम्हारी तस्वीर बार-बार देखता हूँ। देखता हूँ तो सोचता हूँ कि तुम्हारे लिए कुछ लिखना चाहिए। कुछ ऐसा जो तुम समझ पाओ। लेकिन मेरे पास ऐसे शब्द नहीं हैं। न ही भाषा है। मैं तो इतना भी नहीं समझ पाता कि यह क्या है। कभी-कभी इसे आकर्षण का नाम दे देता हूँ। उससे आगे कभी महसूस नहीं कर पाता। असल में मैं आगे बढ़ना नहीं चाहता। जहाँ हूँ, वहीं रहना चाहता हूँ।

तुम्हारे लौट आने का इंतिज़ार मैं नहीं करता। अगर करूँगा तो न जाने तुम्हें क्या लगे। दूर रहने में जो सुकून है, वह साथ रहने में नहीं है। और हमारा साथ रहना तो मुमकिन है भी नहीं। मैं तुम्हारी आँखों और भौंहों के साथ रहूँगा। तुम्हारी आवाज़ और उसका संकोच भी मेरे पास है। तुम्हारी हँसी और व्यंग्य भी मेरे साथ हैं। तुम अगर साथ न हो तब भी सब चल जाएगा। साथ होने के लिए साथ होना ही ज़रूरी नहीं होता। अगर तुम कभी यह पढ़ो तब भी कुछ ग़लत नहीं सोचना। इंसान कई बार केवल इंसान होने की हर सीमा से छूट जाता है। वह भाव बन जाता है। वह व्यक्ति साथ हो न हो, लेकिन वह भाव हमेशा आपके पास रहता है। उस एक भाव में कई और भाव भी शामिल होते हैं। इन सभी बातों में जो शामिल हो पाया है, वह केवल एक भाव है। बाक़ी जो भाव बचे रह गए हैं, उन्हें यहाँ कहूँगा नहीं। बहुत कुछ मैं किसी को बताना नहीं चाहता।

सपना

कल रात तुम्हें सपनें में देखा। पता चला तुम एक नहीं दो लोग हो। एक ही चेहरे और क़द-काठी के दो लोग। एक ही भाषा और लहजे के दो लोग। नीचे उतरती उन ऊँची और चौड़ी सीढ़ियों पर बैठकर मैं तुमसे पूछ रहा हूँ, तुम कौन हो? यहाँ तक हम हँसते-हँसते आए हैं। तुम्हारा सामान भी मैंने अपने कंधों पर लाद रखा है। सामान बहुत भारी है। जहाँ जाना है, वह जगह बहुत दूर है। सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए मैं थक गया हूँ। एक सीढ़ी पर ही सामान रखकर बैठ गया हूँ। तुम भी बैठ गई हो। सीढ़ियों के नीचे बहुत भीड़ है। पुलिस है। लाठियाँ और गोलियाँ हैं। फिर भी हमें उसी रास्ते से जाना है। हम वहाँ जाते उससे पहले ही मैं थक गया। बैठ गया। तुम भी बैठ गईं। हम दोनों यहीं से सब देख रहे हैं। जो घट रहा है उससे निरपेक्ष मैं तुम्हें देखता हूँ। तुम हँस रही हो। मेरे मन में किसी की छवि उभरती है। उसने मुझे कुछ कहा था। कौन थी वह? क्या तुम ही थीं? मेरे मन में उभरी छवि को सवाल में बदलते हुए अविश्वास से भर गया हूँ। अगर वह तुम थीं तो तुम यहाँ क्यों हो मेरे साथ? तुमने तब कुछ और कहा था। मैं तुमसे पूछ लेता हूँ। क्या वह तुम ही थीं? इस सवाल पर तुम हँस देती हो। तुम्हारी हँसी मेरे इस सपने की आख़िरी गति है। सपना यहीं ख़त्म हो जाता है।

सवाल को इस तरह पूछ लेने से पहले भी कुछ घटित हुआ। तुम मेरी बाईं ओर हो और तुम्हारे बाईं तरफ़ दीपक बैठा है। सीढ़ियों पर बनी एक झुग्गी में एक औरत स्टोव पर सब्ज़ी बना रही है। वह अपने पास से कुछ तस्वीरें दीपक को देती है। इन तस्वीरों में एक आदमी की हत्या के ऐन बाद के समय को बचा लिया गया है। उसे गोली लगी है। कपड़ों पर ख़ून है। एक तस्वीर में चेहरा है, एक में गोली का घाव, एक में पैरों की तस्वीर। दीपक उलट-पलटकर उन तस्वीरों को देखता है और हँसता है। सीढ़ियों के नीचे लोग भाग रहे हैं। वे भागने और गिर पड़ने का अभिनय कर रहे हैं। गोली लग जाने का अभिनय कर रहे हैं। पुलिस अपनी ढाल के साथ चल रही है। अनाउंसमेंट हो रही है। हम सब देख-सुन रहे हैं। हम चुप हैं, केवल दीपक हँस रहा है। उस तस्वीर के आदमी का चेहरा हूबहू दीपक जैसा है।

कविता क्या है?

उसका रूप हम कैसे तय करेंगे? क्या कोई आकर हमें बताएगा या हमें ख़ुद उसे खोजना पड़ेगा? कोई अगर हमें बताता भी है तो क्यों उसकी बात को हमें मान लेना होगा? या फिर हम जिस रूप तक पहुँचे होंगे, वह किन सिद्धांतों के तले गढ़ा गया होगा? क्या इस रूप को ही अंतिम मान लिया जाना चाहिए। इतिहास में देखें तो रूप की परिवर्तनशीलता को हम समझ पाएँगे। यह भी समझ पाएँगे कि कभी कोई रूप अंतिम नहीं होता। एक रूप के बरअक्स कई रूप मौजूद हो सकते हैं। लेकिन परंपरा ने जो रूप हमें सौंपा है, कम से कम हमें उसके क़रीब तो रहना ही होगा। अगर हम उस रूप को तोड़कर कोई नया रूप बनाते हैं तो या तो उसे अलग विशेषण की तरह इस्तेमाल करना होगा या परिचय की तरह आगे जोड़ना होगा। संस्कृत के आचार्यों ने जो कहा है : उसे नींव की तरह देख सकते हैं, लेकिन विधा का रूप बदलता है। दुनिया बदल गई है। विधाएँ या तो नई बनी हैं या परिवर्तित हो गई हैं। ऐसे में विमर्श के पास बताने के लिए शायद कुछ है नहीं। जो बताने योग्य व्यक्ति हैं, वे वैचारिक जलेबियाँ बनाने में उलझे रहते हैं। वे असल में उलझे नहीं रहते, आपको उलझाना चाहते हैं। आप स्वरूप पूछेंगे, वे आपको रचना-प्रक्रिया बताने लगेंगे। उसमें आध्यात्मिकता और ब्रह्म को जोड़ देंगे। आपको लगने लगेगा यह विधा असामान्य है। जबकि बात इसके एकदम विपरीत है। हमें जिस खाँचों में देखना सिखाया गया, उन्हीं खाँचों में सब कुछ देखता रहा हूँ। उससे निकलकर भी कुछ-कुछ देख रहा हूँ, पर समझ कुछ नहीं पा रहा। सब विचारों से लरजते हुए भी कोई सूत्र नहीं मिल पा रहा। अभी देखता हूँ कि एक लौ मिली है। अब शायद समझ पाऊँ कि कविता क्या है।