‘दुनिया को लेकर मेरा अनुभव बहुत अजीब है’

विष्णु खरे (9 फ़रवरी 1940–19 सितंबर 2018) को याद करते हुए यह याद आता है कि वह समादृत और विवादास्पद एक साथ हैं। उनकी कविताएँ और उनके बयान हमारे पढ़ने और सुनने के अनुभव को बदलते रहे हैं। मेरी उनसे पहली विधिवत् मुलाक़ात साल 2007 की सर्दियों में हुई थी, और आख़िरी 2017 के शरद में। यहाँ प्रस्तुत है इस ‘काल और अवधि के दरमियान’ दर्ज सात दिनों की स्मृति :

विष्णु खरे │ स्रोत : अप्रतिम खरे

पहला दिन

‘जाना कहाँ है’ की अनिश्चितता और अनिर्णय में डूबते चले जा रहे दिनों में मैंने विष्णु खरे का बहुत पीछा किया। मुझे लगता था कि विष्णु खरे के पास ज़रूर कोई ऐसा पता होगा, जहाँ इस बेचैन ज़िंदगी को ले जाया जा सकता है। दरअसल, हिंदी में हुए उन सारे महानुभावों को बारहा मैंने बहुत हसरत और उम्मीद से देखा जिन्हें कवि-आलोचक कहकर पुकारा गया। केवल कवियों के पास भी रौशनी थी, लेकिन केवल आलोचक कहलाने वाले शख़्स हिंदी में मुझे बहुत जड़ और घृणा-योग्य लगते थे। वे बहुत महत्वाकांक्षी, मौक़ापरस्त और मतलबी थे।

बहरहाल, मेरे ‘पीछे’ की उत्कटता मुझे अंतत: एक रोज़ विष्णु खरे के डेरे तक ले गई। जहाँ ख़ुद और ख़ुद से बाहर की प्राथमिक और ज़रूरी बातें जान और बता देने के बाद विष्णु खरे मुझसे बोले :

‘‘और कोई किताब जो तुम पढ़ना चाहते हो और यहाँ तुम्हें दिख रही हो तो तुम उसे ले सकते हो।’’

‘‘कुछ हिंदी कवियों के पहले कविता-संग्रह पढ़ना चाहता हूँ, लेकिन अब कहीं मिलते नहीं। साहित्य अकादेमी की लाइब्रेरी में भी नहीं।’’

‘‘जैसे?’’

‘‘बहनें और अन्य कविताएँ।’’

‘‘ज़रा उठो और वहाँ जाओ फ़ैक्स मशीन से थोड़ा उधर ‘ऋग्वेद’ के नीचे जो किताब है उसे निकालो।’’

वह किताब कुछ जर्जर हालत में थी, लेकिन यह जर्जरता उसके अविराम अन्वेषण को अविलंब विराम देने वाली थी। सुरेंद्र राजन के रचे आवरण की पीली आभा में स्याह रेखाएँ और पैरहन लिए बहनें थीं और भीतर अन्य कविताएँ भी। जयश्री प्रकाशन, दिल्ली। प्रथम संस्करण : 1980। मूल्य : 25 रुपए। ब्लर्ब के दूसरे हिस्से पर युवा असद ज़ैदी : जन्म–31 अगस्त 1954, करौली, राजस्थान में। इस समय जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में अध्ययनरत। शुरू में कुछ कहानियाँ लिखीं जिनमें से कुछ प्रकाशित। समय-समय पर रंगमंच, कला तथा साहित्य संबंधी आलोचनात्मक लेखन। विदेशी साहित्य से अनेक अनुवाद। एक संपूर्ण उपन्यास ‘जागना रोना’ भी लिखा है। बीच के कुछ वर्ष पत्रकारिता, अनुवाद और छिटपुट नौकरियों में बिताए। 1975 से मुख्यत:, और नियमित रूप से, कविताएँ लिखी हैं। यह पहली किताब है। संपर्क : 39, पेरियार, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110067

ब्लर्ब के पहले हिस्से पर जो टिप्पणी है उस पर किसी का नाम नहीं है, लेकिन वह अपनी भाषा से विष्णु खरे की लिखी हुई लगती है : ‘‘ये कविताएँ ज़िंदगी के संपृक्त अहसास की कविताएँ हैं—इनकी जड़ें बहुत गहरे लगावों से जिए गए जीवन में हैं। इसलिए ये आज की ज़िंदगी की तरह वैविध्यपूर्ण हैं और इस झूठ को फ़ाश कर देती हैं कि प्रतिबद्ध कविता को एक-आयामीय ही होना चाहिए। इनसे कुछ भी छूटा नहीं है—अपने घर और परिवार से जटिल नाता, बचपन और कैशोर्य की स्मृतियाँ, बड़े होने और ख़ुद के पैरों पर खड़े होने के प्रयत्नों की निर्मम, उद्घाटक प्रक्रिया, अपने वक़्त और समाज, मित्रों, शत्रुओं, प्रियजनों की पहचान तथा एक द्वंद्वात्मक जीवन-दृष्टि को अनुभवों और सबक़ों के रास्ते हासिल करना।’’

प्रिंट लाइन के ठीक ऊपर एक आत्म-स्वीकार : ‘‘इस संग्रह के लिए अंतिम रूप से कविताओं का चुनाव श्री विष्णु खरे ने किया है जिनका मैं शुक्रगुज़ार हूँ।’’

मुझे उसमें ही खोया देख, विष्णु खरे ने कहा : ‘‘इधर ले आओ। तुम इसे ले जाना। लेकिन इससे पहले मैं तुम्हें इससे एक कविता सुनाता हूँ :

कोयला हो चुकी हैं हम बहनों ने कहा रेत में धँसते हुए
ढक दो अब हमें चाहे हम रुकती हैं यहाँ तुम जाओ

बहनें दिन को हुलिए बदलकर आती रहीं
बुख़ार था हमें शामों में
हमारी जलती आँखों को और तपिश देती हुई बहनें
शाप की तरह आती थीं हमारी बर्राती हुई
ज़िंदगियों में बहनें ट्रैफ़िक से भरी सड़कों पर
मुसीबत होकर सिरों पर मँडराती थीं
बहनें कभी सांत्वना पाकर बैठ जाती थीं हमारी पत्नियों के
अँधेरे गर्भ में बहनें पहरा देती रहीं’’

…मैंने देखा कि विष्णु खरे की आँखें भीगी हुई हैं और गला भी शायद इस क़दर भर आया है कि आगे की कविता-पंक्तियाँ वह बोल नहीं पा रहे हैं। उनका चश्मा कुछ धुँधला गया है। वह थोड़ा रुककर कविता-संग्रह मेरे आगे बढ़ाते हुए बोले : ‘‘ले जाओ, तुम पढ़ना। मुझसे पढ़ी नहीं जाती यह कविता, दिल डूबने लगता है।’’

वह विष्णु खरे थे—हिंदी साहित्य संसार में अपनी आक्रमकता, असहिष्णुता और अभद्रता, अपने आक्रोश के लिए कुख्यात। कालांतर में विष्णु खरे की इन विशेषताओं का मैं भी शिकार हुआ। मैंने भी बहुतों की तरह उनके मुँह से गालियाँ सुनीं, लेकिन मैंने कभी भी अपनी मौजूदगी में विष्णु खरे को दी गई गालियाँ बर्दाश्त नहीं कीं, क्योंकि साल 2007 की एक सर्द तारीख़ में—जो मुझे कभी नहीं भूलेगी—मैं जान चुका था कि विष्णु खरे भीतर से कितने आर्द्र हैं।

दूसरा दिन

विष्णु खरे न सिर्फ़ बतौर रचनाकार, बल्कि बतौर मनुष्य भी देखने पर बहुत ज़ोर देते थे। यह देखना ही निर्मित करता है। मैंने एक बार उनसे उस पल के बारे में जानना चाहा जब उन्हें यह लगा कि वह देख रहे हैं। उन्होंने कहा :

‘‘मेरी ज़िंदगी का यह सबसे त्रासद पक्ष है कि जब मैं केवल छह साल का था, तब मेरी माँ की मृत्यु हो गई। माँ की स्मृतियाँ बहुत कटी-छँटी और सलेक्टिव हैं। माँ की मृत्यु के बाद मेरी दोनों बुआओं की मृत्यु हुई। मेरे बारह साल के होते-होते औरतें हमारे परिवार से एकदम साफ़ हो गईं। औरत नाम की चीज़ ही नहीं बची। मेरे पिता संसार के सबसे चुप्पे लोगों में से एक थे। तुम जिसे मेरा ‘देखना’ कह रहे हो, वह इस सबके बीच शुरू हुआ और समझ में आया कि यह दुनिया क्या है और किस तरह आप इसमें अकेले और अलग पड़ जाते हैं। यह जो सुलूक करती है आपके और आपके परिवार के साथ और इसमें जो आपका शहर बदल रहा है, आस-पास के लोग बदल रहे हैं। मैं थोड़ा आगे जाऊँ तो कह सकता हूँ कि जब मैं छिंदवाड़ा छोड़कर गया, तब तत्काल छह या सात रोज़ बाद कुछ करने के लिए लौटा। मैंने देखा कि मैं वहाँ एलियन हो गया हूं। मैं कुछ भी नहीं हूँ अब। कुछ हूँ ही नहीं मैं। यह मेरे लिए एक बड़ा भारी ऑब्जर्वेशन था कि कैसे आप अपनी आइडेंटिटी खो देते हैं और कैसे उसे पुन: अर्जित करना पड़ता है और कैसे वह ज़्यादा प्रॉमिनेंट होती है और कैसे इसके लिए आपको अंदर जाना पड़ता है। दरअसल, बाहर की आइडेंटिटी कोई मायने नहीं रखती और अंदर की आइडेंटिटी बहुत पेनफ़ुल होती है, क्योंकि वह हमेशा देखती रहती है कि आप क्या हैं, संसार की आंखों में आप क्या हैं, अब आप क्या हो गए, अब आप क्या नहीं रहे। इसलिए मैं कह रहा हूँ कि दुनिया को लेकर मेरा अनुभव बहुत अजीब है। यह अनुभव नकारात्मक नहीं है, लेकिन मैं दुनिया को बहुत पहले पहचान गया था कि दुनिया कितनी निर्मम हो सकती है—आपको लेकर।’’

तीसरा दिन

कविता में से अगर वह सब कुछ निकाल लिया जाए जिससे कविता बनती है, तब जो कुछ बचेगा, वह विष्णु खरे की कविता होगी। गिरधर राठी ने लिखा है कि उनकी कविता का बाना ऐसा है जिसमें से ‘कवितापन’ के निशान मानो चुन-चुनकर हटा दिए गए हों। उनकी कविता पर बहुत गद्यमय होने के आरोप लगते हैं। मैंने इस पर उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही थी, और उन्होंने कहा था :

‘‘गद्यात्मक होना मेरी कविता की पहेली है। यह एक पहेली है लोगों के लिए कि इसके बावजूद मेरी कविता, कविता कैसे है? कविता इसे माना कैसे गया है? यह उसका नकारात्मक तत्त्व नहीं है। यह कोई फ़ॉरमूला नहीं है, अगर यह कोई फ़ॉरमूला होता तो मैं कब का ख़त्म हो चुका होता। मैं इसे फ़ॉरमूला बनने से इसलिए रोक पाता हूँ, क्योंकि मेरे पास विषय सैकड़ों हैं। मैं इसे क्यों फ़ॉरमूला बनने दूँगा… मैं कवि हूँ, क्राफ़्टमैन हूँ। मैं क्यों अपने क्राफ़्ट को वल्गर होने दूँगा।’’

चौथा दिन

वह वामन शिवराम आप्टे वाला संस्कृत-हिंदी कोश उलट-पलट रहे थे, जब मैं उनके अकेलेपन में प्रविष्ट हुआ। वह मेरी नज़र देखकर कहने लगे कि इसमें कभी-कभी विचित्र शब्द मिलते हैं। आज एक शब्द मिला—आनाय:। इसका अर्थ है—जाल। मैं जल्द ही इसका प्रयोग इंटरनेट के लिए करूँगा। ख़ैर, तुम पूछो क्या पूछना चाहते हो?

मैंने पूछा कि अशोक वाजपेयी ने इधर एक साक्षात्कार में कहा है कि मुक्तिबोध की प्रसिद्धि और कीर्ति को छोड़ दीजिए, वह अब तक कठिन काव्य के प्रेत कवि ही हैं। उन्होंने जिस लालित्य का ध्वंस किया, उसका हिंदी कविता में पुनर्वास हुआ। मुक्तिबोध का कोई अनुयायी नहीं, वे तो बिल्कुल भी नहीं जो ऐसा होने का दावा करते हैं।

यह दावा आपके यहाँ बहुत है और लालित्य का आपके कविता-संसार में घोर अभाव है। लालित्य के सिलसिले में अशोक वाजपेयी का इशारा मंगलेश डबराल की तरफ़ लगता है। आप इस पर क्या कहेंगे?

विष्णु खरे ने कोश को एक तरफ़ रखते हुए कहा :

‘‘अशोक यहाँ दो स्टेटमेंट दे रहा है। लालित्य का पुनर्वास—मैं कहीं देखता नहीं हूँ। …और मुक्तिबोध के अनुयायी तो हम सब ही हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि सब मुक्तिबोध-सी ही कविता लिखेंगे। …और मुक्तिबोध ने कौन-से लालित्य का ध्वंस किया इसको भी डिफ़ाइन किया जाना चाहिए, क्योंकि लालित्य का ध्वंस तो हिंदी कविता में मुक्तिबोध से पूर्व ही हो चुका था—छायावाद के दौर में ही। एक रूखी कविता हिंदी में हमेशा से रही है। मेरा कहना है कि अशोक पहले लालित्यपूर्ण कविता को परिभाषित करे और फिर कहे कि इसका ध्वंस मुक्तिबोध ने किया और फिर कहे कि उसका पुनर्वास हुआ। मुझे लगता है कि जो चीज़ थी ही नहीं या गई ही नहीं, वह लौटेगी कैसे?’’

पाँचवाँ दिन

वह जागरूकता का प्रथम क्षण होता है, जब लगता है कि अब रोज़गार की ज़रूरत है।

यह जागरूकता अगर बचपन में हो तब बचपन बीत जाता है, अगर तरुणाई में हो तब तरुणाई और अगर यह वृद्धावस्था में हो तब जीवन बीत जाता है।

इस जागरूकता में बहुत सारी कामनाएँ और स्वप्न बिखर जाते हैं। ये क़तार में ले आने वाले पल होते हैं।

वे जिन्होंने जीवन में कभी रोज़गार की खोज नहीं की, मृत्यु तक कच्चे रहेंगे।

रोज़गार को खोजने की प्रक्रिया और अवधि ही बेरोज़गारी है।

साल 2017 की एक शरद दुपहर में एक संवाद से बाहर रहे आए संवाद में मैंने विष्णु खरे से प्रश्न किया था कि आप 1993 से बेरोज़गार हैं। इस बीच आपने कोई पत्रिका भी नहीं निकाली और न ही कोई प्रकाशन शुरू किया। इतनी लंबी अवधि तक इस प्रकार बेरोज़गार रहने वाले हिंदी कवियों-लेखकों के क्लब में आपके साथ देवी प्रसाद मिश्र भी शामिल होंगे जिन्होंने रोज़गार-संस्थानों को दासताओं के अड्डे कहा है। मैं यहाँ आपसे जानना चाहता हूँ कि बेरोज़गारी में सबसे ज़्यादा क्या चीज़ काम आती है? इस सवाल का यह सोचकर जवाब दें कि सामने एक बेरोज़गार बैठा हुआ है।

मैंने इस प्रश्न के बहुत अमूर्त और दार्शनिक उत्तर की अपेक्षा की थी, लेकिन विष्णु खरे इसलिए ही स्मरणीय हैं कि वह अपेक्षाओं के पार चले जाने वाले व्यक्तित्व हैं। उन्होंने कहा कि बेरोज़गारी में सबसे ज़्यादा काम आती है—फ़्रीलांसिंग और उसकी मेहनत और कर सको तो अनुवाद। मेरा उदाहरण वैसे तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में थोड़ा भिन्न है, क्योंकि मैंने विदेशी भाषाओं से हिंदी में लाखों रुपए के अनुवाद किए हैं। इसके लिए मुझे मेडल भी मिले हैं और नाइट और सर की उपाधि भी। मैं यह करके भारत से बाहर बहुत सम्मानित हुआ हूँ। लेकिन क्या है कि मेरे साथ एक लाभ यह रहा कि मुझे इस प्रकार के वेलपेड काम एक के बाद एक बराबर मिलते गए। मेरे प्रकाशकों ने भी मेरे साथ कई वर्षों तक बेईमानी नहीं की, बहुत बाद में की।

लेकिन अब ध्यान से सुनो : फ़्रीलांसिंग बहुत अजीब चीज़ है, इसके लिए आपको प्रतिभाशाली होना पड़ेगा। एक और बात कि फ़्रीलांसिंग के लिए आपको अपनी गृहस्थी में यक़ीन होना चाहिए। अपनी जीवनसंगिनी, उसकी मेहनत और उसकी समझदारी पर यक़ीन होना चाहिए। इस प्रकार परस्पर प्रेम और समर्पण होना चाहिए कि अभाव कलह का रूप न ले सके। मेरी पत्नी ने मुझसे कभी नहीं कहा कि अब क्या होगा? वह जानती थी कि ये आदमी कहीं से भी पैसे लाए, लेकर आएगा। मैं तुम्हें यहाँ एक बेहद हृदयविदारक दृश्य दिखाने जा रहा हूँ, देखो :

जब मैंने नवभारत टाइम्स छोड़ा—जयपुर में, तब हुआ यों कि किराए का मकान ख़ाली करना है। मैं वहाँ अकेले रहता था, इसलिए थोड़ा ही सामान था मेरे पास। मैंने पत्नी को बताया कि नौकरी छूट गई है। मैंने उसे दिल्ली से बुलाया कि यहाँ आ जाओ और मेरी थोड़ी मदद करो—पैकिंग-वैकिंग में, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि अब दफ़्तर की या किसी और की कोई मदद लूँ।

वह आई और हमने एक-एक चीज़ पैक की। एक बड़े बोरे में रखी और ऑटो मँगाया। ऑटो में बोरा रखा और हम लोग भी बैठे। जयपुर बस-स्टैंड पहुँचे। दिल्ली वाली बस खड़ी थी। मैं ऊपर चढ़ गया और पत्नी ने नीचे से बड़े प्यार से बोरा पकड़ाया। मैंने बोरा जहाँ रखना चाहिए था, वहाँ रख दिया। अब बस चलने लगी। पत्नी मुझसे बार-बार पूछे कि बोरा ठीक से रखा था न? मैं कहूँ—हाँ भई! लेकिन उसका संशय सफ़र भर बरक़रार रहा। रात गए हम लोग बोरे सहित सकुशल दिल्ली पहुँचे।

मैं कहना यह चाह रहा हूँ कि उस औरत ने कभी उफ् तक नहीं की कि यार तुम फिर बेकार हो गए। मैंने भी उसे कभी भूख से मरने नहीं दिया। मेरे बच्चों को तो कभी पता ही नहीं चला कि पापा अब बेरोज़गार हैं। मैं बेकारी में भी ख़ूब विदेश जाता रहा। मैंने इस काल और अवधि के दरमियान ख़ूब कमाई की। मेरा मतलब यह है कि मैं अपने बेरोज़गार होने का रोना नहीं रो सकता। मैं हिंदी का सबसे ख़ुश, निर्लज्ज और कमाऊ बेरोज़गार हूँ।

छठवाँ दिन

हिंदी में मौजूद आठवें दशक की केंद्रीय कविता ने बाबूकेदारनाथसिंहनुमा कविता को एक वक़्त तक प्रसंग में नहीं आने दिया। यह उपलब्धि थी या विवशता यह अलग विमर्श है, लेकिन यह दौर ज़्यादा देर तक रहा नहीं और हिंदी में आठवें दशक के बीतते-बीतते बाबूबुद्धि कवियों की बाढ़ आ गई। यह ‘ज़मीन पक रही है’ और ‘सब की आवाज़ के पर्दे में’ के बीच का वक़्त है।

इस वक़्त में ही केदार और विष्णु के क्लोन कवियों का परस्पर संघर्ष शुरू हुआ। इस संघर्ष ने हिंदी के चंदेक बेहतर कवियों को यह प्रेरणा दी कि वे इस संघर्ष से बाहर रहकर हिंदी की नई कविता के पूरे विकास-क्रम पर पुनर्विचार करें। यह पुनर्विचार एक उल्लेखनीय आक्रोश और गंभीर उदासीनता की तरफ़ ले गया। क्लोन कवि और उनके प्रतिनिधि इस बीच ही कविता में गाँव और प्रकृति के होने या न होने का रोना रोने लगे। संसार में नवउदारवाद के रास्ते आई आवारा पूँजी बढ़ी और हिंदी कविता में लोक की माँग और आपूर्ति भी। इस प्रसंग में मैंने विष्णु खरे से जानना चाहा कि यह विचलन है या विकास?

उन्होंने कहा कि हिंदी के कवि को गाँव में न रहते हुए आज कई वर्ष हो गए हैं और इस दरमियान गाँव भी गाँव नहीं रहे, तब गाँव आख़िर कविता में कैसे आएँ!

मैंने कई गाँवों को क़स्बे में और कई क़स्बों को इस बीच तेज़ी से शहर में तब्दील होते देखा है। एक बहुत भारी विस्थापन हुआ है और कोई कहीं का नहीं रह गया है। गाँव का मतलब अब बस छठ है। इस स्थिति में मैं किसे गाँव का कवि कहूँ, किसे क़स्बे का, किसे शहर का, किसे जनकवि कहूँ और किसे मध्यवर्ग का कवि कहूँ? ये सारी कोटियाँ अब धूमिल हो गई हैं।

एक बहुत बड़ा खंड-खंडीकरण हुआ है—समाज में और लोग इसे देखते नहीं हैं कि यह शहरों में हुआ है। आज क़स्बे की कविता बड़े शहरों को गालियाँ बकती है और बड़े शहर का कवि गाँव के नॉस्टेल्जिया में बर्बाद हो जाता है। मैं इसे कवियों का पाखंड ही कहूँगा, क्योंकि वे ही गाँव छोड़कर यहाँ आए हैं और उन्होंने ही ये कविता बनाई है। दरअसल, यह मनुष्य को मनुष्य से लड़ाने वाली सोच है।

सातवाँ दिन

‘‘मुझे एक पूरा कमरा चाहिए।’’ यही कहा था उन्होंने, जब मैंने उनसे दिल्ली छोड़कर मुंबई और मुंबई छोड़कर छिंदवाड़ा जाने की वजहें पूछी थीं :

‘‘मैंने सोचा कि छिंदवाड़ा जाकर वहाँ काम करूँगा—एक अलग कमरा लेकर। लेकिन इस बीच हुआ यह कि मुझे पिछली जुलाई (2016) में छिंदवाड़ा में रात को तीन बजे हार्ट अटैक हुआ। उसके बाद पता नहीं तुम्हें पता है या नहीं कि मुझे मुंबई में 5 फ़रवरी (2017) को स्ट्रोक हुआ। इसमें व्यक्ति को बजाय दिल के दिमाग़ का दौरा पड़ता है, और अगर यह बहुत गंभीर हुआ तो तत्काल आपको मार डालता है। इसके कई स्टेज होते हैं। मुझे फ़र्स्ट स्टेज वाला हुआ था। मैं ठीक भी हो गया, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि अब आप अकेले नहीं रह सकते, क्योंकि यह स्ट्रोक आपके घर में बैठा हुआ आपका सबसे बड़ा दुश्मन है। दिल का इलाज तो है, लेकिन इस दिमाग़ का अब कोई इलाज नहीं। इसमें बहुत परहेज़ करना पड़ता है। भारत में प्रतिवर्ष क़रीब दस लाख लोग स्ट्रोक से मरते हैं। अब तुम बताओ कि काम कैसे करूँ, जब मैं अकेला ही नहीं रह सकता।’’

मैं : लेकिन यात्राएँ तो अब भी आप ख़ूब कर रहे हैं?

वह : हाँ, आख़िर डरकर मैं कब तक रहूँगा। मुझे अकेले रहकर काम करना ही होगा।

मैं : काम बहुत है?

वह : हाँ, काम बहुत है। लेकिन लगता नहीं कि पूरा हो पाएगा। मेरी मृत्यु मुझे बहुत नज़दीक लगती है।

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विष्णु खरे की कविताओं का समग्र साल 2019 में सेतु प्रकाशन से प्रकाशित हो चुका है। उनकी प्रसिद्ध और प्रतिनिधि कविताओं से गुज़रने के लिए यहाँ देखें : विष्णु खरे का रचना-संसार

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