सपनों वाला घर और मेरा झोला

मैं घर से ख़ाली हाथ निकलना चाहता था। पर वो घर ही क्या जो ख़ाली हाथ निकल जाने दे। जब मैं बाहर के लिए निकल रहा था तो घर ने कहा कि ये झोला लेते जाओ। इसमें तुम्हारे रास्ते का सामान है। मैंने घर की तरफ़ मना करने के लिए देखा, पर घर के चेहरे पर इतनी तरह के भाव एक साथ थे कि मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने झोला थाम लिया।

जब मैं झोले के साथ निकला तो घर देर तक मुझे देखता रहा था। अपनी पीठ पर घर की आँखें महसूस करते हुए मैंने पीछे की तरफ़ देखा। घर मुस्कुरा रहा था। उसकी मुस्कुराहट की कोरों से आँसू टपक रहे थे। जो इतने गर्म थे कि ज़मीन पर गिरने से पहले ही भाप में बदल जा रहे थे। यह भाप मेरे चेहरे तक पहुँची और मैंने अपना चेहरा सामने, रास्ते की तरफ़ घुमा लिया।

झोला मेरे कंधे से लटक रहा था। कई जगहों से इसके रेशे उधड़ रहे थे। उन रेशों के भीतर से झोले के भीतर के बहुत सारे सामान बाहर झाँक रहे थे। वे पहली बार घर से बाहर निकले थे। बाहर की दुनिया उन्हें नई लग रही थी और वे बाहर देखने के लिए कूद फाँद मचा रहे थे। इस चक्कर में झोला नए सिरे से उधड़ रहा था।

झोले के भीतर से बहुत सारी दृश्य, सपने, अनुभव, पीड़ाएँ, चोटें, ख़ुशियाँ और उदासियाँ बाहर की दुनिया से टुकुर-टुकुर संवाद कर रहे थे। कई तरह की ग़रीबी और अभाव थे, जिन्हें मैं घर पर ही छोड़कर आना चाहता था। वे झोले से बाहर कूद गए थे और मेरी उँगली पकड़ कर चल रहे थे। मेरे भीतर एक बेबसी भरी झल्लाहट उतरने लगी।

मैंने अपनी चाल तेज़ कर दी कि ये सब पीछे छूट जाएँ। तरह-तरह से उछल कूदा कि झोला तितर-बितर ही हो जाए और उसके भीतर का सामान भी। झोले पर इसका उल्टा ही असर हुआ। पता नहीं डर से या ख़ुशी से झोले के भीतर के लोगों ने एक दूसरे का हाथ थाम लिया। वे तेज़ी से उधड़े हुए रेशों की मरम्मत में लग गए।

जल्दी ही झोला नया-सा दिखने लगा। पर मैं झाँसे में नहीं आया। इसके सारे ताने-बाने को मैं अलग से पहचानता था। यह पहचान इतनी गहरी थी कि मैं उन्हें कभी भी, कहीं भी देख सकता था। बिना किसी अतिरिक्त कोशिश के हवा में महसूस कर सकता था। जबकि मैं चाहता था कि यह न हो। मैं झोले को छोड़कर आगे बढ़ जाना चाहता था।

मेरे देखते-देखते झोला घर में बदल जाता है। घर में मैं भी हूँ। घर वह है जिसमें मेरा बचपन बीता। हालाँकि सच में वह घर आज कहीं नहीं हैं। उसकी जगह पर एक नया पक्का घर है। मैंने सपने में इस नए घर को कभी नहीं देखा। सपने में जब भी घर आता है तो यही पुराना घर आता है जो जैसे मेरे ख़ून में बसा हुआ हो। क्या मैं किसी सपने में हूँ!

जब कभी मैं घर को याद करता हूँ तो हमेशा वही पुराना घर सामने आ खड़ा होता है। उसके एक-एक कोने-अँतरे से मेरी तमाम स्मृतियाँ जुड़ी हैं। न जाने कितने दृश्य हैं जो सामने आ जाते हैं। क्या मेरे सपने उन्हीं दृश्यों से बनते होंगे। जबकि अपने नए घर को याद करने के लिए सायास कोशिश करनी होती है, तब कहीं जाकर उसकी छवि आँखों के सामने आती है।

जैसे आज के सपने में मैं अभी का हूँ, पर घर पुराना वाला है। वह नीम का पेड़ है जिसको कटे कम से कम पच्चीस साल होने को आए। उसके चारों तरफ़ बना चबूतरा है जिस पर आजी बैठी हैं। मैं अम्माँ से रसोई का बचा-खुचा खाना लेकर निकलता हूँ। पीछे से भैंस पुकार रही हैं—मेरा नाम लेकर। उनकी बाँ-बाँ में मुझे मेरा नाम साफ़ सुनाई दे रहा है।

वे उस जगह पर बँधी हैं, जहाँ इस ज़मीन पर पुरखों का पहला घर रहा है। मैं उनकी तरफ़ जाने को होता हूँ कि आजी मेरे हाथ से बचा हुआ भोजन ले लेती हैं। आजी कह रही हैं कि उन्हें बहुत भूख लगी है। उस भोजन में बैंगन की बिना मसाले की सब्ज़ी है… बासी रोटियाँ हैं और बाजरे का भात। मैं आजी से यह सब छीनना चाहता हूँ। आजी नहीं देतीं, वह रिरियाने लगती हैं, खाने दो मुझे बहुत भूख लगी है। पीछे से भैंसें मेरा नाम लेकर पुकार रही हैं।

मैं करवट बदलता हूँ और बिस्तर पर अधजगी-सी पत्नी से कहता हूँ कि अभी मैंने आजी को बासी खाने के लिए रिरियाते देखा। पत्नी कहती है कि यह सपना अच्छा नहीं है। यह तो वह सुबह बताएगी कि रात को उसने ऐसा कुछ भी नहीं कहा। मतलब यह कि रात को वह भी मेरे सपने में शामिल थी जबकि मैं उसे सपने के बाहर समझ रहा था। मैं सुबह उसे बताऊँगा कि उसने सपने से बाहर रहने का भ्रम रचते हुए कई बार मेरे सपने में हस्तक्षेप किया।

आजी जब से नहीं रहीं, जब मन होता है सपने में चली आती हैं। जब तक ज़िंदा थीं, कभी भूले से भी मेरे सपनों में नहीं घुसीं। यहाँ तक कि जब मैं अपने बचपन के घर को देखता था जिसमें आजी पूरी तरह से रची-बसी हैं, तब उन सपनों में भी कभी आजी नहीं दिखाई पड़ीं, कुछ इस तरह कि जैसे वह सचमुच के घर में कहीं थीं ही नहीं।

जबकि सपने में भी मैं जानता हूँ कि घर में सबसे ज़्यादा कोई था तो वही थीं। सपने में मुझे कभी उनकी शकल नहीं याद आती। कई बार मैं सपने में उनका चेहरा याद करने की कोशिश करता और तब सब कुछ दिखता बस चेहरा नहीं। कई बार चेहरे की जगह पर अँधेरा तो कई बार सपाट सतह… जो अक्सर रंग बदलती रहती।

झोला भी आजी के चेहरे की तरह रंग बदलता रहता है। मैं इसकी माया पहचानता हूँ। इसके बावजूद मेरे भीतर इससे मुक्त होने की कोशिश उतनी सघन नहीं है, जितनी होनी चाहिए थी। मेरी मुश्किल यह है कि इस झोले के भीतर की बहुत सारी चीज़ें मुझे अपनी चमड़ी की तरह ज़रूरी लगती हैं। उनके बिना मैं अपनी कल्पना भी नहीं कर पाता।

पर झोले के भीतर ऐसी भी बहुत सारी चीज़ें हैं जो त्वचा पर फफोलों की तरह दिखती हैं। मैं इन फफोलों से मुक्त होना चाहता हूँ। चाहता हूँ कि मेरी त्वचा को कुरूप बनाने वाले ये फफोले ग़ायब हो जाएँ। इस तरह कि उनका कोई निशान भी मेरी चमड़ी पर न दिखाई दे। मेरी मुश्किल यह है कि इस कोशिश में अक्सर मैं इन फफोलों को फोड़ देता हूँ। फिर देर तक इनके भीतर के लिसलिसे पानी में डूबता-उतराता रहता हूँ।

मेरी साँस फूलने लगती है। फेफड़ों में यही लिसलिसा पानी भर जाता है। तब मैं देखता हूँ कि यह लिसलिसा पानी सब तरफ़ फैल गया है। जैसे प्रलय के समय सब तरफ़ पानी ही पानी रहा होगा, उसी तरह। मुझे तैरना नहीं आता। जैसे मुझे ही बचाने के लिए इसी पानी में तैरती हुई बस आती है। मैं बस पर कुछ इस बेक़रारी से बैठता हूँ कि बस में पहले से बैठी सवारियाँ अचरज से मुझे देखने लगती हैं।

बस चल पड़ती है। मेरा झोला मेरी गोद में है। मैं उठता हूँ और तिरछे खड़े होकर झोला अपने सिर के ऊपर बनी जगह में रखता हूँ। वहाँ पहले से ही बहुत सारे लोगों के झोले पड़े हुए हैं। मुझे ऐसा लगता है जैसे झोलों के भीतर से बहुत सारी आँखें मुझे देख रही हों। पल भर में वे आँखें बस की सवारियों की आँखों में बदल जाती हैं। मैं कोशिश करता हूँ, पर उनमें से किसी से आँखें नहीं मिला पाता। बदले में अगला जो भी स्टॉप आता है, उस पर उतर जाता हूँ।

उतरते ही बस आगे बढ़ जाती है। और इसी के साथ मैं अपने उस झोले के लिए व्याकुल होने लगता हूँ, जिसे मैंने जान-बूझकर छोड़ दिया है। मैं अपने झोले के लिए बस के पीछे दौड़ने की कोशिश करता हूँ पर पूरी ताक़त के बाद भी आगे नहीं बढ़ पाता। बस अपनी ही जगह पर बहुत भारी होता हुआ कूदता रहता हूँ। बस बहुत धीरे-धीरे जा रही है। बस बहुत देर तक मुझे दिखाई देती रहती है।

अब मैं इंतज़ार करता हूँ कि कोई भला मानुस मेरा झोला बस के बाहर फेंक देगा। कोई नहीं फेंकता। मैं बस की ख़ैरियत मनाता हूँ कि उसके साथ कहीं कोई दुर्घटना न हो। जैसे भी हैं अच्छे बुरे, उसमें मेरे सफ़र के साथी हैं। उसमें मेरा झोला है। झोले में वह सब सामान हैं, जिन्हें लेकर मुझे अगली यात्रा पर निकलना है। यह झोला नहीं होगा तो मेरी यात्रा अनाथ हो जाएगी।

मैं अपनी ही जगह पर कूदता रहता हूँ। बस बहुत दूर निकल गई है, पर मैं इतनी ऊपर तक कूद रहा हूँ कि दूर जाती हुई बस मुझे दिखाई दे रही है। और फिर एक ऐसा मोड़ आता है, जब बस दिखाई देना बंद हो जाती है। बस के ओझल होते ही मैं अपने पुराने घर पहुँच जाता हूँ। घर पहुँचते ही मैं रोने लगता हूँ और रोता ही जाता हूँ। रोने के साथ मेरी उमर कम होने लगती है। मुझे समझ में ही नहीं आ रहा कि मैं रो क्यों रहा हूँ।

मेरे आँसू मेरे बचपन का एक साथी पोंछता है, जो बचपन में मेरे बहुत पतला होने को लेकर मुझे चिढ़ाया करता था। मैं उसके माथे के घाव से उसे पहचानता हूँ। यह मेरा ही दिया हुआ घाव है, जब उसके चिढ़ाने से आजिज़ आकर मैंने एक दिन उसे ईंट के एक टुकड़े से साध दिया था। वह रोता और ख़ून बहाता मेरे घर आया था। माँ ने उसके माथे पर फिटकरी पीस कर लगाई थी और पट्टी बाँध दी थी।

बदले में आजी ने वैसा ही घाव मेरे माथे पर हाथ पर पैरों पर बना देना चाहा था। जब मैं मार खाते हुए चिल्ला रहा था, तब इसी चोट खाए दोस्त ने चिल्लाकर कहा था अबे सींकिया साले भाग… खड़े-खड़े पिट क्यों रहा है। यह तह कर के भीतर जमा दिया गया तभी का अभ्यास है कि पिटता रहता हूँ, पर भाग नहीं पाता हूँ।

दोस्त मुझे खींचकर बाहर ले जाता है। दोस्त मुझे खींचकर बाहर ले जाते हैं। मैं दोस्तों के साथ जाता हूँ, पर बहुत सारे दोस्तों के चेहरे नहीं पहचानता। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। वे अपने साथ मुझे डुबो देते हैं। उनके साथ डूबकर मैं सोचता हूँ कि अब मैं पहले जैसा नहीं रहा। अब मैं हमेशा के लिए बदल गया हूँ। अब मैं कभी नहीं रोऊँगा। अब मैं बड़ा हो गया हूँ। मैं यह बात दोस्तों से कह देता हूँ। वे मुस्कुराते हैं, पर मेरी बात पर कोई टिप्पणी नहीं करते।

फिर एक दिन आता है, जब सारे दोस्त घर चले जाते हैं। तब मुझे भी घर की बहुत याद आती है। मुझे अचरज होता है कि घर मुझे अभी तक याद है। इस हद तक कि मैं उसकी याद में बेचैन होने लगूँ। इसी बेचैनी में मैं घर पहुँचता हूँ। आजी वहाँ डंडा लेकर मेरा इंतज़ार करती मिलती हैं। मुझे डर लगे इसके पहले वह डंडा फेंक देती हैं। आजी मुझे गोद में लेती हैं और चूमती हैं। मैं टिटकारी मारते हुए सीटी बजाता हूँ।

अपनी ही बजाई हुई सीटी की आवाज़ मुझे सब तरफ़ से गूँजती हुई सुनाई पड़ती है। मैं अपने कान ढँकना चाहता हूँ। आजी को यह बात पसंद नहीं। वे मेरे कानों पर से मेरी हथेलियाँ हटाती हैं। हथेलियों के बाहर बहुत शोर है। इसी शोर में पगलाते हुए मेरी निगाह अपने झोले पर जाती है। झोला ओसारे में खूँटी पर टँगा हुआ है।

झोले के भीतर से बहुत सारी बातें झाँक रही हैं। बहुत सारे दृश्य झाँक रहे हैं जो कभी भी जीवित होने को तैयार बैठे हैं। आप भरोसा नहीं करेंगे पर झोले के भीतर मुझे अपनी ही आँखें दिखाई पड़ती हैं जो मुझे ही देखकर मुस्कुरा रही हैं। मैंने इस मुस्कान का जवाब आज तक नहीं दिया। आज भी दे पाऊँ यह संभव नहीं दिखता।

तभी मेरी निगाह दुबारा अपने झोले पर जाती है। न भी जाती तो इसे तो मैं बस साँस लेते हुए पहचान सकता हूँ। मेरी निगाह जिस चीज़ पर जाकर रुक जाती है, वह एक बदसूरत लिखावट है। झोले के ऊपर बस के जले हुए तेल से लिखा हुआ है—सॉरी। बस वाला।

तभी मुझे बाहर हॉर्न की आवाज़ सुनाई पड़ती है। मैं बाहर झाँकता हूँ तो पाता हूँ कि बस मेरे इंतज़ार में खड़ी है। आजी और मेरे बहुत सारे दोस्त मुझे बुला रहे हैं कि मैं जल्दी से बैठ जाऊँ तो सफ़र शुरू हो। मैं तेज़ी से बाहर निकलता हूँ और भागना शुरू कर देता हूँ। बस मेरे पीछे लग जाती है।

बस में मेरे झोले के भीतर के सारे लोग बैठे हुए हैं और खिड़की के बाहर सिर निकाल कर ड्राइवर का उत्साह बढ़ा रहे हैं।

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