प्यास के भीतर प्यास

प्यास को बुझाते समय
हो सकता है कि किसी घूँट पर तुम्हें लगे
कि तुम प्यासे हो, तुम्हें पानी चाहिए
फिर तुम्हें याद आए
कि तुम पानी ही तो पी रहे हो
और तुम कुछ भी कह न सको
प्यास के भीतर प्यास
लेकिन पानी के भीतर पानी नहीं

प्यास के भीतर प्यास शीर्षक इस कविता के अंतिम दो वाक्यों पर फिर से ग़ौर करें :

प्यास के भीतर प्यास
लेकिन पानी के भीतर पानी नहीं

रचना अगर प्यास के भीतर प्यास है तो विजयदेव नारायण साही की आलोचना पानी के भीतर पानी की उतनी ही असमाप्त खोज; जितना अधूरा उनका लघुमानव वाला लेख है।

अगर मुक्तिबोध के यहाँ ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष’ नई कविता के अंतर्विरोधों के ख़िलाफ़ आत्मीय संघर्ष था तो उन अंतर्विरोधों को बहस के बड़े परिप्रेक्ष्य के लिए समूची नाटकीयता, उत्तेजना, शक्ति और सीमाओं में पहचानने का काम साही की आलोचना ने किया। साही की आलोचना ने वह ताज़ा और सार्थक तारतम्य भी खोजा; जिसके आलोक में छायावाद से अज्ञेय तक की कविता को एक साथ पढ़ा जा सकता है।

विजयदेव नारायण साही के आलोचक-व्यक्तित्व की कहानी यहाँ नहीं, भदोही से सुनी जानी चाहिए। समाजवादी आंदोलन, क़ालीन मज़दूरों के संगठन, सोशलिस्ट पार्टी के सम्मेलनों और शिक्षण-शिविरों के ज़रिए सक्रिय राजनीतिक कर्म की प्रत्यक्षता ने उन्हें ऐसा आत्मविश्वास दिया कि वह आलोचना को राजनीति से स्वायत्त कर सके। यों, उनकी आलोचना किसी वैचारिकी का उपनिवेश तो नहीं ही है; ऐसे उपनिवेशवाद की जड़ताओं के विरुद्ध बेहद चौकन्ने और सूक्ष्म संघर्ष में भी शामिल है। ‘तीसरा सप्तक’ में प्रकाशित उन्हीं के वक्तव्य के एक अंश में इस संघर्ष की एक झलक देखी जा सकती है :

‘‘कम्युनिस्ट प्रगतिवाद ने केवल ऐसे लोग पैदा किए जो मज़दूर नेताओं में साहित्यकारों जैसी बात करते हैं और साहित्यकारों में मज़दूर नेताओं जैसी। जहाँ दोनों न हों वहाँ दोनों जैसी और जहाँ दोनों हों, वहाँ बग़लें झाँकते हैं। तब से ऐसे लोगों को मूर्ख और बेईमान समझने की आदत पड़ गई है जो रह-रहकर व्यक्त होती है।’’

लेकिन ठहरिए! इस कथन के ऐतबार से उनकी राजनीति के बारे में किसी निष्कर्ष तक पहुँच जाना भ्रामक होगा; क्योंकि तीसरे सप्तक के इसी वक्तव्य में उन्होंने आगे बताया है :

‘‘कांग्रेस शासन में तीन बार जेल के दर्शन हुए। एक बार एक महीने मज़दूरों की हड़ताल के संबंध में—दूसरी बार तीन दिन गोलवलकर को काला झंडा दिखाने के अपराध में, तीसरी बार तीन घंटे जवाहरलाल नेहरू की मोटर के सामने किसानों का प्रदर्शन करने के दुस्साहस पर!’’

नई कविता के आस-पास लिपटे हुए सिद्धांतों में शीतयुद्ध की छाप है, पर साही की नज़र इस ध्रुवांतता के आर-पार देखती है। आज यह समझना भले मुश्किल हो गया हो, लेकिन वह न इधर हैं, न उधर। अस्सी के दशक में अशोक वाजपेयी ने संवाद की दुनिया में जो खुला और ख़तरनाक़ बीच प्रस्तावित किया था; छठवें दशक में उसके वास्तविक पूर्वज साही थे। क्या क़माल है कि वह सभी बहसों में शामिल थे, लेकिन बीच में रहकर। इन दिनों, हम लोग अपने अनुभव से जानते हैं कि बीच कहीं है नहीं। वह विकल्पहीन हो जाने की जगह है।

साही जी ने शांत शक्ति के इसी अभिप्राय के साथ आलोचना को राजनीति से अलग करके पहचाना था। उन्होंने निर्विकल्पता की रचना की और किसी काव्येतर विकल्प से हासिल अंतर्दृष्टि को अपने औज़ारों में स्थायी नहीं होने दिया। दरअसल, वह इकतरफ़ा या बेलोच नहीं हो सकते थे। यह दिलचस्प है कि अथक संवाद में शामिल इस आलोचक के पास अक्सर आलोच्य कृति के अलावा कोई आश्वासन या संस्तुति नहीं है। रचना की सरहदों पर वह अकेला जाता है—निष्कवच और वेध्य। ज़ाहिर है, ऐसी एकांत स्थिति उन्होंने ख़ुद निर्मित की है। नए की पहचान और प्रतिष्ठा के लिए होने वाले संग्राम में रचना के साथ-साथ आलोचना को भी शामिल करने वाले आत्मसजग लेखकों की पंक्ति में वह अन्यतम हैं और उनकी आत्मसजगता का यह भी एक अंदाज़ है।

उनका मिज़ाज कविता के वज़न पर आलोचना को पा लेना चाहता रहा है। शमशेर की काव्यानुभूति के बारे में बात करते हुए वह कहते हैं :

‘‘काव्यानुभूति अपने आप में एक तरह का अतिक्रमण है। लेकिन किसका अतिक्रमण और किस दिशा में? एक समय उत्तर बहुत आसान था। यह अतिक्रमण तमस से ज्योति की ओर, असत से सत की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर था।

हमारे चारों ओर रोज़मर्रा का एक जीवन है। इसी का अतिक्रमण करने की कोशिश कविता करती है। इस रोज़मर्रा के जीवन को हम चाहे तमस कह लें, मध्यवर्गीय कुंठाएँ कह लें, कोल्हू के बैल का अंधा चक्कर कह लें, वस्तुओं का शिकंजा कह लें, लोलुपता और फ़ैशन कह लें…”

साही इसी प्रतिदिनता, इसी यथास्थिति के अतिक्रमण के रूप में काव्यानुभूति को सोचते हैं। यों, उनकी आलोचना भी यथास्थिति के बरअक्स एक निजी और स्वतःसंपूर्ण अभियान की मानिंद निर्मित होती है।

निजी और स्वतःसंपूर्ण : इन दो शब्दों का इस्तेमाल यहाँ जानबूझकर किया गया है। आकस्मिक नहीं कि शमशेर की काव्यानुभूति की विशिष्टता को रेखांकित करने के लिए साही इन दो प्रत्ययों का इस्तेमाल कई बार करते हैं। ये शब्द उनकी आलोचना के सरोकारों के बहुत क़रीब हैं।

और यथास्थिति? जिस बिंदु से काव्यानुभूति को एक अतिक्रमण की तरह उन्होंने देखा—वह साहित्यिक, सांस्कृतिक या स्थूल अर्थ में सामाजिक यथास्थिति नहीं है; बल्कि मानवीय अस्तित्व का वह अनूठा पहलू है, जिसे ग़ालिब ने ग़मे-हस्ती—होने का अवसाद—कहकर पुकारा था।

बीच की जगह साही की आलोचना का केंद्रीय रूपक है; बशर्ते नितांत समसामयिकता की नैतिक एंग्ज़ाइटी में हम इस जगह का निरा राजनीतिक पाठ न तैयार कर लें। नई कविता के दौर का सबसे नेक, परिष्कृत और बहसधर्मी हिस्सा भीतर और बाहर—दोनों स्तरों पर साथ-साथ सृजन के मूल्यों के लिए लड़ रहा था। मुक्तिबोध ने काव्य में सृजन-प्रक्रिया के विश्लेषण को नए रचनाकार का कर्तव्य बना दिया। कविता एक ओर छायावादी और उत्तरछायावादी काव्य-संस्कार से ख़ास तरह से अनुकूलित रेफ़्लेक्सेस और दूसरी तरफ़ आत्मग्रस्तता के ख़िलाफ़ बड़ी बहस में शामिल थी। इस द्वंद्व ने हिंदी आलोचना को कविता के मूल्यांकन के नए औज़ार खोजने में मदद की। इस पूरे अभियान में मुक्तिबोध और साही एक दूसरे के लीलासहचर हैं; भले ही उनमें प्रत्यक्ष संवाद कम हुआ हो।

मुक्तिबोध नामदेव और तुकाराम की ज़मीन से चलकर यहाँ पहुँचे हैं। उनके कृतित्व पर रास्ते की धूल है। साही ठेठ हिंदी हैं। मुक्तिबोध आधे मराठी और आधे छत्तीसगढ़िया हैं; साही आधे बनारसी आधे इलाहाबादी हैं। मुक्तिबोध कार्तिकेय हैं, साही गणेश। मुक्तिबोध रचना की ज़मीन से वैचारिकी के आसमान में चले जाते हैं। साही तन्मय एकाग्रता के साथ आलोच्य पाठ की ही परिक्रमा करते रहते हैं। लेकिन क़माल देखिए; नई कविता के प्रसंग से भीतर और बाहर के असमाप्त दुहरे समर में दोनों एक ही मूल्य को अलग-अलग शब्दों में विवक्षित करते हैं।

मुक्तिबोध कहते हैं : लेखक का आत्म आभ्यंतरीकृत विश्व है; जबकि साही के शब्दों में; समाज-सत्य को निजी उपलब्धि बनाना उसे आत्मसात करना या उपयोग में लाना है। यानी, मुक्तिबोध के मुहावरे में जो चीज़ वाह्य का आभ्यंतरीकरण है, साही के यहाँ वही वस्तुपरकता की आत्मपरकता हो जाती है।

बहरहाल, साही और मुक्तिबोध की तुलना के इस प्रसंग को यहीं अधूरा छोड़कर हम बीच की जगह वाले नुक़्ते पर लौटें। ‘बीच की जगह’ का रूपक साही के आलोचक-व्यक्तित्व की रूपरेखा को समझने में दूर तक हमारी मदद करता है। साही के मुताबिक़ :

‘‘निजी और बिल्कुल पराए के बीच एक और क्षण है, जहाँ आँसू निजी है भी और नहीं भी है : पराया है भी और नहीं भी है। न तो वह बिल्कुल आत्मपरक है, न बिल्कुल वस्तुपरक। वह अभिव्यक्ति भी है और संकोच भी है।

अभिव्यक्ति और संकोच के इस तनाव में एक तरह की स्थिरता और संतुलन पैदा होता है। यह स्थिरता, यह अटकाव, यह स्थिति अनस्तित्व और अस्तित्व के बीच एक अंतराल है—विशुद्ध संभावना का क्षण है। यह वह मनोभूमि है जहाँ कविता अपने अर्थ से आलोकित होती है।”

शायद यही है साही की जगह। उनका बीच। एक अहर्निश गोधूलि।

क्या साही आलोचना में वह लिख लेना चाहते हैं जो कविता में लिखने की आकांक्षा एक कवि में होती है? बेशक, उनकी आकांक्षा महाकाव्यात्मक है। कविता में उन्होंने अपने लिए असंभव लक्ष्य तय किए हैं। शिल्प के रतजगे उनकी आलोचना में भी झिलमिलाते हैं। बहस, कल्पनाशीलता और पाठ पर तन्मय एकाग्रता की हार्मोनी ने उनकी आलोचना को बहुत सम्मोहक बना दिया है; लेकिन इसी जादू के बीच वह इतनी ठोस और तर्कसंगत है कि उसे पढ़ते हुए साहित्य के प्रति हमारा भावयंत्र हर बार अधिक उन्मुख, अधिक सूक्ष्म और अधिक स्पंदनशील हो उठता है। उनके निबंधों को इसलिए हम बार-बार पढ़ते हैं। बार-बार पढ़े जाने पर वे कुछ और खुलते हैं।

लेकिन हम लोग जाने-अनजाने उनकी आलोचना से प्रतिकृत नहीं हो पाए और पेशेवर आलोचना बहुत चतुराई के साथ उनके अवदान को कमतर कर देने की कोशिशें करती रही। अपनी पुस्तक ‘वाद विवाद संवाद’ में नामवर सिंह कहते हैं :

‘‘आज हिंदी आलोचना की जैसी स्थिति है, उसमें सर्वथा नई किसी रचना के साक्षात्कार के समय उसकी विशिष्टता का ठीक-ठीक वर्णन करने में आलोचक की भाषा का एक हद तक व्यक्तिगत हो उठना असंगत नहीं है। शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट का विश्लेषण करते हुए श्री विजयदेव नारायण साही ने इसी प्रकार की व्यक्तिगत भाषा का उपयोग करने की विवशता अनुभव की है, जो प्रथम परिचय में अबूझ प्रतीत होती हुई भी अंततः रचना के प्रति एक अंतर्दृष्टि प्रदान कर जाती है। …स्पष्ट ही आलोचना की यह व्यक्तिगत शब्दावली सार्वजनिक भाषा की पारिभाषिक पदावली का अंग नहीं बन सकती और कदाचित उसका उद्देश्य भी यह नहीं है।’’

कितना अद्भुत है कि जिस आलोचक ने अपनी किताब का नाम साही के खोजे हुए पद पर रखा है, वही उनकी आलोचना को अबूझ प्रतीत होने वाली और सार्वजनिक भाषा की पारिभाषिक पदावली का अंग बन पाने में अक्षम घोषित कर रहा है। ऐसा करके ही साही द्वारा प्रस्तावित पदों को सोच-विचार की मुख्यधारा में आने से रोका जा सकता था।

इस बीच धीरे-धीरे मेरे मन में यह स्थूल धारणा मज़बूत होती गई है कि अच्छा कवि वह है जिसका नाम लेते ही उसकी कविताओं का ख़याल आ जाए और अच्छा आलोचक वह, जिसका ज़िक्र आते ही उसके द्वारा प्रस्तावित पद याद आने लगें; जैसे रामचंद्र शुक्ल—लोकमंगल, हजारीप्रसाद द्विवेदी—दूसरी परंपरा, रामविलास शर्मा—हिंदी जाति, मुक्तिबोध—तीसरा क्षण, व्यक्तिगत ईमानदारी, स्थानांतरगामी प्रवृत्ति और साही—आत्मपरकता की वस्तुपरकता और वस्तुपरकता की आत्मपरकता।

ज़ाहिर है, जिस कीर्ति पर उनकी आलोचना का अधिकार है, वह आज तक मिलना बाक़ी है।

साही जी की आलोचना में जो सम्मोहन है, उसका शिल्प एक भूलभुलैया का है। रास्ता भूलने का जोख़िम उठाए बिना उनके यहाँ किसी मंज़िल तक पहुँचना मुश्किल है। शमशेर की काव्यानुभूति वाले लेख की शुरुआत में उन्होने ज़ोर देकर कहा है कि नई कविता की सामान्य विवेचना के लिए शमशेर को उदाहरण की तरह इस्तेमाल करना इस लेख का अभीष्ट नहीं है। इसके बाद वाक़ई वह लेख शमशेर की मनोभूमि में प्रवेश कर जाता है; लेकिन कुछ ही पन्नों के बाद प्रगति बनाम प्रयोग वाली बहस पृष्ठभूमि में चुपके-चुपके फिर से खड़ी होने लगती है। पहले साही यह स्थापित करते हैं कि मार्क्सवाद के लिए शमशेर के आग्रह क्रमशः ढीले पड़ते गए हैं। उदाहरण के साथ वह बताते हैं कि जिस चीज़ को पहले शमशेर मार्क्सवाद कहते थे, उसी को क्रमशः उन्होंने समाज-सत्य, समाज-सत्य का मर्म और फिर इतिहास की धड़कन कहकर पुकारा है।

अंततः साही इस निष्कर्ष तक पहुँचते हैं कि शमशेर के कवि-व्यक्तित्व में समाज-सत्य अर्थात् प्रगतिवाद आत्मसात होकर निजी उपलब्धि तो बनता है; लेकिन काव्यानुभूति के केंद्र में, केंद्र के साथ सायुज्य में उसकी सत्ता नहीं है—वह चीनी लिपि वाली कविता के शिल्प की तरह उनकी, यानी शमशेर की, मनोभूमि के हाशिए पर है। साही के शब्दों में :

‘‘शमशेर के यहाँ काव्यानुभूति और प्रगतिवाद आमने-सामने दर्पण की तरह रखे हुए हैं—कविता और हाशिए पर की लिखावट की तरह।’’

शमशेर वाला निबंध 1964 में लिखा गया और तभी प्रगति और प्रयोग वाली बहस बीस साल पुरानी थी। साही की इंटेलेक्चुअल हैसियत देखिए—शमशेर की सृजन-प्रक्रिया के विश्लेषण के ज़रिए वह दो दशक पुरानी बहस में भी नए नुक़्ते जोड़ सकते हैं; बहस के एजेंडे को बदल भी सकते हैं।

इसकी वजह यह है कि साही का पाँव कभी भी बहस के बाहर नहीं पड़ता। किसी ने कहा है कि कवि हमेशा एक ही भाषा में बात करता है, चाहे वह कविता के बाहर ही बात क्यों न कर रहा हो। साही जी भी, चाहे कुछ भी कर रहे हों, बहस ही कर रहे होते हैं। आप देख लीजिए; इस निबंध की बिल्कुल शुरुआत में ही वह कह रहे हैं कि काव्यानुभूति की बनावट में ही परिवर्तन आ गया है—बहस में इस पर बल कम दिया गया है।

मेरा निवेदन है कि इस वाक्य को अभिधा में न पढ़ा जाए। नई कविता की बड़ी बहस के बीच यह कोई तकनीकी स्थापना या हवाई ख़याल भर नहीं है। साही जी यों ही नहीं ध्वनिकार और व्यंजना-शक्ति के मुरीद हैं। ठीक इसके आगे उन्होने लिखा है :

‘‘चेतना के जो तत्त्व काव्यानुभूति के आवश्यक अंग दिखते थे, उनमें से कुछ अनुपयोगी या असार्थक दिखने लगे, कुछ अन्य जो पहले अनावश्यक या विरोधी लगते थे, काव्यानुभूति के केंद्र में आ गए।’’

यानी पूरे आत्मविश्वास के साथ साही शमशेर की काव्यानुभूति के केंद्र में से मार्क्सवाद को हटाकर सौंदर्य को बिठाते हैं। सवाल उनके इस उद्यम की सफलता या असफलता पर स्थूल निर्णय कर लेने का नहीं है। वह संभव नहीं है; ज़रूरी भी नहीं है। इस नतीजे तक पहुँचने के लिए बहस के जिस छंद का आविष्कार उन्होने किया है; दरअसल वह हमारा हासिल है। उनकी भाषा कभी भी सपाट या एकरेखीय नहीं होती। उनके निबंधों को, उनकी असमाप्त संवादधर्मिता को, उनके रूपकों के आशय को, दाग़ के मुहावरे में, जानते-जानते ही जाना जा सकता है।

इस बीच हिंदी कविता के इनसाइडर्स कम होते गए हैं। शायद कविता को देखने और सोचने की जगह कुछ बदल गई है; इसलिए नई कविता के ज़माने की बहस एक असंभव तथ्य, एक स्वप्न-कथा जैसी लगती है। साही की आलोचना इस बात का भी दुर्भाग्यपूर्ण साक्ष्य है कि आज की कविता को समकक्ष आलोचनात्मक पर्यावरण नहीं मिला; उसमें भी साही जैसा अनूठा और सशक्त इनसाइडर तो दुर्लभतम है। अगर लेखक के आत्म का एक्सरे मुक्तिबोध के पास है तो रचना की एमआरआई रिपोर्ट साही के यहाँ जमा रहती है। लघुमानव वाले निबंध में ही देखिए—कैसे कामायनी की कथा—श्रद्धा, मनु, इड़ा और मानव की आत्मछवियों और एक दूसरे के साथ उनके रिश्तों को कविता पर चल रही बहसों और ‘अपराजेय संकल्प’, ‘अपराजेय विवशता’, ‘ऊपर से कुछ और अंदर से कुछ और’ जैसी बीहड़ स्थापनाओं में उन्होंने पढ़ लिया है। पूरी बहस पर उनकी नज़र एक कवि की तरह पड़ती है; इसलिए नए कवि के चैलेंज को वह एक वाक्य में बता सकते हैं : जिस ‘समरसता’ को प्रसाद जी ने अनुभूति से दर्शन में बदल दिया कैसे उसे दर्शन से अनुभूति में बदला जाए!

टैरी इगल्टन ने ‘वाल्टर बेंजामिन ऑर टुवर्ड्स ए रेवोल्युशनरी क्रिटिसिज़्म’ शीर्षक अपनी किताब में जैसे बेंजामिन को फिर से खोजा, वैसे हम साही को क्यों नहीं खोज सके? क्या इसकी वजह यह है कि ख़ुद साही, कुँवर नारायण और अशोक वाजपेयी जैसे अपवादों को छोड़ दें तो प्रगतिशीलता की मैसिव परंपरा का वैसा ही वृहद क्रिटीक हमारे पास नहीं है?

अगर साही अभी होते तो हिंदीसाहित्यसंसार की इस पार या उस पार की स्थूल कसौटियों पर कसकर क्या उन्हें नागपुर तक न खदेड़ दिया गया होता? या वह ख़ुद ही कविता के सशक्त इनसाइडर की अपनी भूमिका से विमुख होकर—किसी ऋषि की तरह—कुछ-कुछ अपने समानधर्मा लोहियावादी कृष्णनाथ की तर्ज़ पर एकांत साहित्य-साधना करने लगे होते, जिसकी ओर एक क़दम उन्होंने जायसी पर गवेषणात्मक निबंध लिखकर बढ़ा ही दिया था, या वह जेएनयू और जामिया के छात्र-आंदोलनों के समर्थन में सड़क और चौराहों पर भाषण देते मिलते; क्योंकि सिविल नाफ़रमानी—अवज्ञा—को पच्चीसवाँ शील तो वह बहुत पहले बता चुके थे।

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परिशिष्ट/पुनश्च/फ़ुटनोट :

माँ युवजन थीं। हिंदी आंदोलन की अग्रिम पंक्ति के आंदोलनकारियों में से एक। बीएचयू में उनका मित्रमंडल वैसे ही युवजनों से मिलकर एक गुंबद की तरह तना हुआ था जो आसमान से नज़रें मिलाता था। सत्तर के दशक में आवाज़ें बहुत गूँजती थीं और परिवर्तन बहुत क़रीब था। उसे छुआ जा सकता था। रामबचन पांडे, देवव्रत मजूमदार, मार्कंडेय सिंह, दीपक मलिक, यदुनाथ सिंह, लालमुनि चौबे, मोहन प्रकाश, आनंद कुमार, चंचल, नरेंद्र नीरव, शतरुद्र प्रकाश और अंजना प्रकाश तब मिथक नहीं, विश्वविद्यालय-परिसर में बेचैन टहलती सचाइयाँ थीं।

माँ जीवन भर उसी आंदोलनकारी ताप में तपती रहीं—उनके साथी युवजन भी। ध्यान दें, यह एक पराजित सेना है, इसलिए हम इसे और भी अंगीकार करते हैं।

लेकिन मुझे अपनी माँ से जुड़ा एक दिलचस्प छोटा क़िस्सा सुनाना है, जो माँ ने ही मुझे सुनाया था। संभवतः सन् सत्तर की बात है—माँ अपने मित्र और समाजवादी नेता यूसुफ़ बेग और उनकी जीवन-संगिनी ज़ुलेख़ा के साथ सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने ट्रेन से पुणे जा रही थीं। बेग साहब और उनकी पत्नी के साथ एक सज्जन और थे—बुज़ुर्गवार, मोटा चश्मा लगाए, औसत से कुछ कम शक़्ल-ओ-सूरत वाले और शरीफ़। सफ़र लंबा था। रात बीत गई और सबेरा हो गया। उन बुज़ुर्गवार सज्जन ने माँ से पूछा कि यह तो ठीक है कि आप सोशलिस्ट पार्टी के सम्मेलन में जा रही हैं, लेकिन किस गुट की ओर से? माँ ने छूटते ही उत्तर दिया : विजयदेवनारायण साही के गुट से। उन महोदय ने कुछ आश्चर्य, कुछ सहमति में सिर हिलाया और मुस्कराए।

दरअसल, माँ साही जी से कभी मिली नहीं थीं। उत्तर भारत के मज़दूर आंदोलन की फ़िज़ाओं में गूँजता वह सुदीर्घ नाम सुना भर था। यह ज़रूर जानती थीं कि बेग साहब साही जी के प्रमुखतम शिष्य हैं। जो बेग साहब का गुरु, वह मेरा भी गुरु के सिद्धांत और तेईस बरस की उम्र की रौ में उन्होंने कह दिया कि वह साहीजी के गुट की हैं।

बेग साहब बहुत संघर्षशील, लेकिन मासूम तबीयत के आदमी थे। उन्होंने उन सज्जन से माँ का बहुत ज़ोरदार परिचय कराया; लेकिन माँ को यह नहीं बताया कि वही सज्जन विजयदेवनारायण साही हैं।

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