गद्य की स्वरलिपि का संधान

हिंदी के काव्य-पाठ को लेकर आम राय शायद यह है कि वह काफ़ी लद्धड़ होता है जो वह है; वह निष्प्रभ होता है, जो वह है, और वह किसी काव्य-परंपरा की आख़िरी साँस गोया दम-ए-रुख़सत की निरुपायता होता है। आख़िरी बात में थोड़ा संदेह हो भी तो यह मानने में क्यों कोई मुश्किल हो कि मनहूसियत उसमें निबद्ध होती है। वह डार्क और स्याह होता है। इसकी वजह क्या यह है कि हिंदी में कविताएँ ही अक्सर डार्क होती हैं।

यह तो सच है कि हिंदी की समकालीन कविता अपने समय के स्याह को कहना अपनी मूलगामी अंतर्वस्तु मानती है। वह सामाजिक असंगतियों और विसंगतियों को लेकर विकल रहती है। निराश करने वाले समय में उत्फुल्ल कविताएँ लिखी भी कहाँ जा सकती हैं। और उन एक दो कवियों पर तानाकशी भी की जाती है, जो उत्सवधर्मी कविताओं में मशग़ूल रहते हैं।

लेकिन हिंदी का काव्य-पाठ क्या इसीलिए बड़ी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा नहीं हो पाता, क्योंकि वह अँधेरे से निकलने की सूझ भले ही हो; अँधेरे में फँसे होने का वृत्तांत वह अधिक है। लेकिन अवसाद में डूबे दिलीप कुमार के संवाद तो इसीलिए कोहराम मचा दिया करते थे कि वह किसी दुख या निराशा को कह रहे होते थे, फिर वह कितना ही रोमांटिक क्यों न हो। मीना कुमारी त्रासद की देवी थीं, लेकिन अवसाद के कहन को उन्होंने किस ऊँचाई पर जा रखा। बलराज साहनी ने मुश्किलों में फँसे किरदारों को निभाया, लेकिन कैसी तो रूहानियत होती थी उनके कहन में।

जान पड़ता है कि हिंदी कवि अपने को और अपने समय को लिख तो डालता है, सुनता वह नहीं है कि उसने लिखा क्या। वह कविता के लिखितत्व से इतना आविष्ट होता है कि कविता श्रव्य भी हो इसे लेकर वह उदासीन ही नहीं ख़ूँख़ार भी होता है कि उसे सुना जाए या नहीं उसकी बला से। इस निस्पृहता में उसका बाज़ार विरोध शामिल भले ही हो, वह इस आलोचना से नहीं बच सकता कि जो मेहनत वह अपनी कविता को लिखने में करता है, उसके वाचन को लेकर वह लापरवाह रहता है।

विडंबना यह है कि कविता-पाठ धड़ाधड़ हो रहे हैं, लेकिन वे किसी सामाजिक अभियान का हिस्सा नहीं हो पा रहे हैं। बीस लोग किसी कविता-पाठ में आ जाएँ तो उसे सफल मान लिया जाता है। लोग होते भी इतने कम हैं कि उनको एक साँस में गिना जा सकता है।

दरअस्ल, श्रोताओं की घटती संख्या की वजह ठंडा और बेगाना पाठ है। गद्य कविता को सपाट कहन का पर्याय मान लिया गया है। उसे इतनी बेरहमी से पढ़ा जाता है कि कवि पर रहम करने की कोई वजह नहीं बचती।

हिंदी-काव्य-पाठ का वातावरण शोकसभा का होता है। मैं मानता हूँ कि शोकाकुल काव्य-पाठ की विपत्ति हिंदी कविता का गद्य नहीं है। दरअस्ल, कहन की कोई तहज़ीब भी हो सकती है; इसका कोई इल्म हिंदी कवि के पास है नहीं। हिंदी के अधिकांश कवियों को आख़िरी वक़्त तक यह विभ्रम होता है कि वे क्या पढ़ेंगे। पढ़ना होगा चार कविताएँ और चालीस का पोथा लेकर चलेंगे। जब तय ही नहीं है कि क्या पढ़ना है तो पढ़ना कैसे प्रभावोत्पादक हो, यह गौण हो जाता है। तब पाठ में बलाघात, सायलेंस, अंतराल, मंद्रता, अवरोह, आरोह के लिए कोई जगह ही नहीं बचती। दरअस्ल, मैं इशारा यह कर रहा हूँ कि गद्य में भी लिखी कविता की अपनी स्वरलिपि होती है; इसका कोई एहसास हिंदी के निस्पृह कवि के पास नहीं होता।

हिंदी का कविता-पाठ ऊब और उचाट का पर्याय हो गया है। इसका निराकरण छंद की तरफ़ लौटकर नहीं हो सकता। गद्य हिंदी कविता की नियति है। अब वह किसी भी आधुनिक या उत्तर आधुनिक कविता की नियति है। छंद हिंदी से ग़ायब नहीं हुआ है—वह हिंदी कविता में आता रहेगा, लेकिन अब वह कविता का मेनस्टे नहीं हो सकता। इसमें कोई दो मत नहीं कि हिंदी कविता में हिंदी के सबसे कृतिकार और निराले वाक्य लिखे जा रहे हैं। वे सामाजिक और राजनीतिक बोध को गहराई और विस्तार देते हैं। उनमें गहरी युगीन अंतर्वस्तु होती है, लेकिन इसकी निरीह अभिव्यंजना ने उसके जनोन्मुख काव्यत्व को भी लगभग लोकविरुद्ध कर दिया है; अगर कवि का काव्य-पाठ इसकी कसौटी हो। माफ़ कीजिए, यह ललकार और आह्वान की वकालत नहीं है। पाठ में यह थिएट्रिकैलिटी की माँग भी नहीं है।

नई कविता के दौर में कविता और संगीत के बीच शत्रुता खोज ली गई थी। उस समय यह बताया गया कि जीवन इतना विलगाव और तनाव से भरा है कि निर्वासित जीवन को अभिव्यक्त करने वाली भाषा में संगीत कहाँ बचता है। कविता के मनहूस पाठ की शुरुआत शायद वहाँ से शुरू हुई। नई कविता के कवियों ने संगीत के साथ अपने बैर भाव को नहीं छिपाया और देवीशंकर अवस्थी ने तो कविता और संगीत नाम के अपने लेख में साफ़ कहा कि नई कविता को संगीत की ज़रूरत नहीं है। काव्य-पाठ में यह सपाटता और एलिएनेशन का प्रवेश था।

कविता को उसके श्रव्य व्यक्तित्व से वंचित करने वाले कवि कविता में शब्द गाँजते चले जा रहे हैं। हाल में एक बड़े काव्यायोजन में मैंने दो युवा कवयित्रियों को सुना। दोनों के पास ही असंपादित टेक्स्ट भरा पड़ा था। वे दोनों ही फ़ेसबुक का उत्पाद थीं। और दोनों ने ही अपनी कविता को अपने को नहीं सुनाया था, नहीं तो वह श्रोताओं पर वह अत्याचार न करतीं। मतलब यह कि कविता को ख़ुद सुनना, उसे संपादित करने का गहरा विवेक भी देता है और संयतकारी भाषा को बरतने की सीख।

रैप और हिपहॉप के इस समय में गद्य की लय को आविष्कृत किया जा रहा है। हो सकता है हिंदी कवि को गद्य की अंतर्ध्वनि सुनाई दे जो नरेश सक्सेना जैसे कवि लंबे अरसे से सुनते रहे हैं और काव्य-पाठ को एक व्यक्तित्व देते रहे हैं। लेकिन ज़्यादातर कवि इस आग्रह और खोल से बाहर नहीं आना चाह रहे कि समकालीन कविता लिखित टेक्स्ट ही है और इसके अलावा अगर वह कुछ हो सकती है तो यह कविता का दुर्भाग्य और विचलन है।

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देवी प्रसाद मिश्र सुपरिचित हिंदी कवि-गद्यकार हैं। ‘हिन्दवी’ के लिए ‘मैं जो कहूँ’ स्तंभ के अंतर्गत वह साहित्य-संस्कृति के इर्द-गिर्द लिखेंगे।

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