कविता सीढ़ियों नहीं, छलाँगों की राह है

कविता अगर यह व्रत ले ले कि वह केवल शुद्ध होकर जिएगी, तो उस व्रत का प्रभाव कविता के अर्थ पर भी पड़ेगा, कवि की सामाजिक स्थिति पर भी पड़ेगा, साहित्य के प्रयोजन पर भी पड़ेगा।

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कविता में ज्ञान जहाँ भी प्रवेश करता है, वह किसी न किसी कर्म की प्रेरणा से सम्पृक्त होता है।

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‘कला के लिए कला’ का सिद्धांत बार-बार खंडित किए जाने पर भी सत्य है।

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कवि को यदि रचना की प्रक्रिया से अलौकिक आनंद की प्राप्ति नहीं हो, तो उसकी कविता से पाठकों को भी आनंद नहीं मिलेगा।

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कला की सारी कृतियाँ पहले अपने आपके लिए रची जाती हैं।

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कविता जिन विशिष्ट गुणों के कारण शास्त्र से भिन्न समझी जाती है, वे गुण कलाकार के गुण हैं।

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कविता गाने नहीं, बिसूरने की चीज़ है।

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कविता ताली बजाने की नहीं, सुनकर अपने भीतर डूब जाने की वस्तु है।

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कविता आदमी का सुधार नहीं करती, वह उसे चौंकाना जानती है, धक्के देना जानती है, उसकी चेतना की मुँदी आँखों को खोलना जानती है।

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कविता सीढ़ियों नहीं, छलाँगों की राह है।

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कविता विचारों के परवान पर चढ़कर अपने आकार को बढ़ाना नहीं चाहती।

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जहाँ भावना ख़त्म होती है, वहीं कविता का भी स्वाभाविक अंत है।

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कविता की प्रचलित शैली में से ही अगली शैलियों का जन्म होता है।

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जिस व्यक्ति में उत्साह नहीं जगता; दया, प्रेम और घृणा नहीं होती—वह और चाहे जो कुछ हो, कवि नहीं है।

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कवि मानवता का वह चेतन यंत्र है, जिस पर प्रत्येक भावना अपनी तरंग उत्पन्न करती है; जैसे भूकंप-मापक-यंत्र में पृथ्वी के अंग में कहीं भी उठने वाली सिहरन आपसे आप अंकित हो जाती है।

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हम कवि उसी मात्रा में होते हैं, जिस मात्रा में हम भावुक होते हैं और कवि हम तभी तक रहते हैं; जब तक भावुकता हममें शेष रहती है और केवल कवि ही नहीं, पाठक भी सहृदय, भावुक या रसज्ञ होते हैं।

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साहित्य की सारी पूँजी भावों को लेकर है। यदि भावुकता का सरोवर सूख गया तो कवि और पाठक, दोनों साहित्य के लिए बेकार हैं।

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भावुक केवल रोमांटिक कवि ही नहीं होते, भावुकता—क्लासिक कवियों का भी गुण है।

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कवि के लिए भावों की सूची निर्धारित करने का अधिकार दूसरों को तो क्या, स्वयं कवि को भी प्राप्त नहीं होता।

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कवि जिन संस्कारों में पल कर युवा होता है, जिस वातावरण में साँस लेकर बढ़ता है, वह वातावरण और वे संस्कार उसके भावों और संदेशों का आप से आप निश्चयन कर देते हैं।

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प्रत्येक कवि अपनी भाव-दिशा और संदेश को पूर्व निर्धारित पाता है और वह प्रयास करने पर भी उनसे भाग नहीं सकता।

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कौन कवि किन भावों से प्रेरित होकर लिख रहा है, कला में इस प्रश्न का स्थान हमेशा गौण रहता आया है। मुख्य प्रश्न तो यही हो सकता है कि कवि के भीतर जो भाव उठते हैं उन्हें वह पूरी सामर्थ्य के साथ लिख पाता है या नहीं।

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कवि में केवल प्रेरणा की गुदगुदी ही नहीं, उसे सम्यक् रूपेण चित्रित करने की शक्ति भी चाहिए। इनमें से पहला गुण भावुकता से उत्पन्न होता है, किंतु दूसरे गुण का आधार बौद्धिक विदग्धता और साधनाओं द्वारा अर्जित कठोर शक्ति है।

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कविता का महत्त्व ज्ञान-दान में नहीं, सौंदर्य की सृष्टि में है। ज्ञान देने वाली विद्याएँ साहित्य से बाहर भी मौजूद हैं, जो इतना ज्ञान देती हैं जितना किसी भी कविता के लिए अदेय है।

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ज्ञान आनंददायी इसलिए बन जाता है कि कला उसका साथ देती है।

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यह विचित्र बात है कि साहित्य में ठुमुक-ठुमुक कर चलने में कला मानी जाती है, दौड़कर चलने में नहीं। थकी आवाज़ में दम ले-लेकर बोलने को कला कहते हैं, प्रभावोत्पादक ढंग से गरज कर बोलने को नहीं। आँसू जब थोड़े-थोड़े चलते हों तब उनमें कला होती है, जब ज़ोर से चलते हों तब नहीं। इसी प्रकार, पौरुष का सिंहनाद हो तब कला नहीं है, भूख और रोटी की बात हो तब कला नहीं है, अन्याय के विरुद्ध आक्रोश हो तब कला नहीं है; कला नारियों के कुंतल जाल और असली या ख़याली प्रेमिका के लिए उठने वाली तड़प और पुकार में मानी जाती है!

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जिसे हम कवि की साधना कहते हैं, वह इस अभ्यास के सिवा और कुछ नहीं है कि हम जो अनुभव करते हैं, उसे अनुरूप ढंग से अभिव्यक्त कर सकें। किंतु जब कवि यह समझ लेता है कि जवानी की ताज़गी स्वयं सबसे बड़ी कविता है तथा हमें परिश्रम से बचे रह कर इस ताज़गी को बचाए रखना चाहिए, तब साहित्य में अर्थ से अधिक अनर्थों के ही उदाहरण भरने लगते हैं।

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कवियों और पाठकों के बीच का सेतु हर युग में नए ढंग से बनाया जाता है अथवा उस पर नए रंग छिड़के जाते हैं और जब यह पुल जीर्ण हो जाता है अथवा उसके रंग पुराने पड़ जाते हैं, तब फिर नया सेतु रचने अथवा पुराने सेतु पर नया रंग छिड़कने की आवश्यकता अनुभूत होने लगती है।

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अच्छा हो या बुरा, साहित्य में नया युग तो आता ही रहता है। सपूत हो या कपूत, पिता का दायित्व किसी न किसी पुत्र को ढोना ही पड़ता है।

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कविता के संबंध में पूछा जाने योग्य अब यह प्रश्न नहीं रहा कि कविता ज्ञान है या आनंद। हमें पूछना यह चाहिए कि कौन वह कार्य है जिसे केवल कविता कर सकती है। ज्ञान और आनंद अपनी जगह पर रहें। हमें उनसे कोई झगड़ा नहीं है। किंतु कविता के रूप और आत्मा पर प्रभाव अब उस उत्तर का पड़ेगा जो इस प्रश्न से निकलता है कि कविता किन कारणों से अन्य विद्याओं से भिन्न है अथवा कौन वह कार्य है जिसे अन्य विद्याएँ नहीं कर सकतीं, किंतु कविता कर सकती है।

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रामधारी सिंह दिनकर (1908-1974) हिंदी के समादृत कवि और निबंधकार हैं। वह ज्ञानपीठ सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित हुए। उनके यहाँ प्रस्तुत उद्धरण उनकी ‘शुद्ध कविता की खोज’ (लोकभारती प्रकाशन, संस्करण : 2019) और ‘चक्रवाल’ (उदयाचल, संस्करण : 1956) शीर्षक पुस्तकों से चुने गए हैं। दिनकर की कविताएँ यहाँ पढ़िए : रामधारी सिंह दिनकर का रचना-संसार

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