एकांतवास, कमज़ोर मन और आकांक्षाओं का अभिशाप

सत्य कितना सत्य

उसने बीती रात एक ग़ैर मर्द के साथ बिताई थी। एक चाहना थी कि उसे किसी ऐसी गोद में सिर रखकर सोना है जो बालों में उँगलियाँ फिराए, ना कि उसकी कसती हुई छाती को मुट्ठी में भींच ले। ऐसा ही हुआ—अनेकों बार। उसके गालों पर प्यारी-नाज़ुक थपकियाँ पड़ीं। उन हाथों से जिनमें बॉक्सिंग ग्लव्स आने को हैं। उसके तलुवों के पोर-पोर पर कोमल छुअन थी, उन हाथों की जो दीवारों में समय-समय पर थोड़ी दरारें ला चुके थे।

वह ये सब दिखा सकने में माहिर थी कि कैसे वह एक अप्रतिम प्रेम-संबंध में आकंठ डूबी थी। किंतु यह दिख रहा सत्य कितना सत्य था, इसके बारे में कोई नहीं जानता था, सिवाय स्वयं उसके।

वह आकांक्षाओं की जाई संतान है। माता-पिता के ब्याह के नौ वर्ष बाद वह इस दुनिया में आई। उसे चाहा गया—हमेशा। उसे प्रेम मिला और मिलता ही रहा तब तक जब तक कि उसके जीवन में ‘प्रेमी’ टाइप जीवों की आवाजाही नहीं शुरू हो गई। …और फिर एक बार जब यह सिलसिला चल पड़ा तो इसने थमने का नाम ही नहीं लिया—प्रेमी प्रेम का चोला ओढ़कर, प्रेम को छोड़कर सब कुछ करने के लिए अपनी सुविधानुसार आवाजाही करते रहे।

वह जो चाहना की संतान थी, ठोकर का एक पत्थर बनने तक अकेली होती गई।

मगर जब ठोकर लगती है तो केवल पत्थर पर ही चोट नहीं होती—‘अंगद-पाँव’ का दंभ भी टूटता है।

जब सूबे की सरकार ने घरबंदी का ऐलान किया तो उसकी नब्ज़ ‘लब-डब’ से ज़्यादा तेज़ और बहुत धीरे के स्तर को छूने-उचटने लगी। उसने अपने प्रेमी को फ़ोन मिलाया। यह फ़ोन मिलाते हुए उसे कोई उम्मीद नहीं थी, मगर मानव-मन… फ़ोन के उस पार से घरबंदी पर ख़ुशी और चहक भरा जवाब आया। उसने फ़ोन रखा। तुरत ही प्रेमी का फ़ोन आया, जो कि पहली घंटी के साथ ही काट दिया गया। यह परिघटना किसी न किसी परिस्थिति में आज से पूर्व भी हुई है।

वह बीती रात कमर-दर्द और पेट की ऐंठन से निढाल थी। मगर उसके जानने वाले जो देख रहे थे, उसमें वह शराब के गिलास खनकाती दिख रही थी। वह अकेली थी, मगर वह ‘अपनों’ से घिरी हुई दिख रही थी। वह बंगाली गाने सुन रही थी ऐसा उसके क़रीबियों को लगता था, मगर वह अँधेरी रातों में खिड़की से छनकर कमरे में गिर रहे एक आफ़ताब के सामने यूँ टिककर बैठती कि रौशनी उसकी ठुड्डी पर पड़ती और वह फ़ैज़ अनवर की ग़ज़ल गुनगुनाती—‘‘जान बाक़ी है मगर साँस रुकी हो जैसे।’’

वह अकेली नहीं रहना चाहती, यह बात उसका प्रेमी जानता है। यह बात वह लड़का भी जानता है। मगर दोनों में से कोई उसके साथ रहने का वादा नहीं देना चाहता। वादे वह निभाना जानती है। वह यह बात किसी से नहीं कह सकती कि वह अकेलेपन से डरती है। उसके सभी प्रेमी यह बात जानते हैं कि वह अकेलेपन से डरती है, मगर इस सच से वे तब तक मुँह चुराएँगे जब तक कि चुरा सकते हैं, क्योंकि इस सच की स्वीकार्यता एक उत्तरदायित्व लेकर आएगी—उसे अकेले न रहने देने या यूँ कहिए कि अकेले मरने के लिए न छोड़ने का उत्तरदायित्व।

अब तक प्रेमियों ने मज़बूत दिखने वाली कोमल-हृदयी प्रेमिकाओं का अकेलापन बाँटने जितना बड़ा दिल नहीं पाया है। अभी बस वे बिस्तर बाँटने भर ही सक्षम हुए हैं।

जीवन की अंतिम ध्वनि

उसे यह कोई नहीं बता पाएगा कि वह एक असाध्य रोग से जूझ रहा है। उसके चाहने वाले उसे हमेशा एक आबशार जैसा महसूस करवाते रहे हैं। बेलौस, बेरोक-टोक वह किसी उन्माद-सा पवन की गति से बढ़ता हुआ सबको दिख रहा है। मगर एक लड़की है जो भोर के एक पहर में उसके स्वप्न में आती है। वह जो उसके सच को भली-भाँति जानती है। जब भी इस सच से वह उसका साक्षात्कार करवाना चाहती है तो औचक ही वह नींद से जाग जाता है। वह लड़की उसकी भावी प्रेमिका हो सकती है या फिर उसकी मृत माँ या फिर उसकी वह बेटी जिसे वह अपनी पूर्व-प्रेमिका के गर्भ में ही मरवा चुका है।

जा चुके के लिए…

वह चला गया था… और उसकी आवाज़ भी आहिस्ता-आहिस्ता जाती रही। वह घर के किसी भी कोने में जाकर खड़ी होती तो उसकी पुकार सुनना चाहती। वह पुकार जिसे अब कभी नहीं आना था। इस फैली हुई चुप में उसे लगता कि एक आवाज़ आएगी और उसकी उखड़ती साँसों को बचा लेगी। वह आवाज़ उसका ‘एंकर’ हो सकती थी, मगर वह आवाज़ फिर लौटकर नहीं आई। वह अकेली रह गई। बेआवाज़। अब न कोई सुख-दुख उसे महसूस होता था, न छाती में कोई हूक ही उठती थी।

वह स्वीकार कर चुकी थी—मौन को।

इंतिज़ार में पथराती आँखें

आँखों में अब बस बियाबान था। उसने अपने जीवन से सब रंग निकाल फेंके थे। अकेलापन इस क़दर सालने लगा था उसे कि वह छत पर घंटों मरघट की तरफ़ मुँह किए बैठी रहती थी। उसने सवाल सुनना और जवाब देना बंद कर दिया था। उसने जान लिया था कि उसे अकेले ही रहना होगा। मगर इस बात को अब भी मान नहीं सकी थी। उसे अब भी इंतिज़ार था कि वह लौट आएगा और वह शायद अकेली होने से बच जाएगी। मगर बच न पाना ही इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है।

वह ताप की वजह से लगभग खौलते हुए पानी को चेहरे पर एकधार उड़ेलती जाती, और जब रुकती तो अपना चेहरा आईने में देखती। उसकी आँखें जिनका रंग फ़िरोज़ी था, उनमें अब कोई रंग नहीं दिखाई पड़ता था। बिल्कुल ऐसी ही आँखें उसे उन सब तीमारदारों-रिश्तेदारों की भी लगती थीं जो अस्पतालों, मुर्दाघरों, श्मशानों और क़ब्रिस्तानों के बाहर खड़े अपनों के लिए रो-रोकर जड़ हो चुके थे।

उदासी और गुहार

उदास मन क्या कर सकता है?

वह प्रार्थना में नतमस्तक हो सकता है। वह प्रेम-मनुहार कर सकता है। वह क्रोध और असहायतामिश्रित रौद्र रूप भी धर सकता है। याचनाएँ कितनी सफल होती हैं? याचनाओं का सकारात्मक उत्तर मिलता रहा हो, ऐसा बहुत कम ही देखा गया है।

देश, जीवन और प्रेम तीनों में बराबरी की आकांक्षा बहुत अधिक है, किंतु वास्तविकता इससे उलट है। टूटा हृदय क्यों न ज़ोर-ज़ोर से बैन करे? क्यों वह ख़ून का घूँट पीकर रह जाए? क्यों वह न याद दिलाए किसी को उसकी जवाबदेही फिर चाहे वह शासक हो या संबंधी।

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