रात्रि की भयावहता में ही रात्रि का सौंदर्य है

25 मार्च 2020

पूर्व दिशा की ओर से खेरों की झाड़ियों में से उठती निशाचर उल्लुओं की किलबिलाहट से नींद खुल गई। यूँ तंद्रा का टूटना अनायास ही अकुलाहट का कारण बन गया। शुक्र का तारा आसमान के पूर्वी क्षितिज से कुछ हाथ ऊपर चढ़ा हुआ जगमगा रहा था। मृगयाएँ और कृतिकाएँ शुक्र के पीछे-पीछे उदास प्रेयसियों-सी मुँह लटकाए खड़ी वसुंधरा के पालव से झाँक रही थी। सप्तर्षि सरक कर पश्चिमी नभ के बीचोबीच तपस्या कर रहे थे। वृश्चिक पूर्व-पश्चिम-दक्षिण नभ में तीन हिस्सों में चौड़ा होकर सो रहा था। अभी सुबह का उजियारा होने में कुछ समय था, इसलिए मैं फिर से धरणी की गोद में सिकुड़ गया। नेत्रों को भींचकर रेन के अँधेरे से अंतर के अँधेरे तक ले गया। कानों को उल्लुओं के शोर से दूर ले जाकर मन की आवाज़ें सुनाने का प्रयास किया, किंतु सारे प्रयास व्यर्थ रहे, फिर से मेरी आँख लगी नहीं।

मैं बिस्तर की खोह में पड़ा-पड़ा करवटें बदलता रहा कि तब तक खब्बड़सिंघ (मेरा ऊँट) भी जाग गया। उसने जागकर जैसी ही बड़ी फुंगार (छींकना) ली कि उल्लू डरकर चुप्प हो गए। ज्यों ही उल्लुओं का शोर बंद हुआ, चहुँओर सन्नाटा व्याप गया। सन्नाटे ने अँधेरे को और भी अधिक गाढ़ा बना दिया। रात्रि और भयावह लगने लगी। रात्रि की भयावहता में ही रात्रि का सौंदर्य है, पर मैं इस सौंदर्य को बरसों से भोगकर अब ऊब चुका हूँ। अब जब नींद ही नहीं आ रही थी, तब कब तक यूँ ही लेटे-लेटे रात्रि का मुँह ताकता रहता? उठा, खब्बड़सिंघ की पीठ पर पलाण बाँधा, डेरा उठाया और चल पड़ा क़स्बे की ओर।

घंटे-भर रल में चलते हुए जब झारा पहाड़ियों की शृंखला में से एक मँझली पहाड़ी पर ज़रा रुककर पीछे मुड़कर देखा तब पूर्व में क्षितिज पर लालिमा छाई हुई थी। आस-पास की जंगली झाड़ियों में से उठाता पक्षियों का कलरव एक ऐसे शोर में बदल गया था कि किसी एक पंछी की चिहुक स्पष्ट पहचानना, सुनना कठिन था। गोरैया, बप्पीहा, बुलबुल, रेगिस्तानी मैना, होली, मोर, तीतर, टीटहरी सबका कल-शोर यूँ घुल-मिल-सा गया था कि जैसे ग्राम्य औरतों की चौपाल लगी हो। कुछ देर में धरती से लाल संतरे-सा सूर्य निकला; बहुत ही मोहक और रस भरा, आँखों में रक्तिम शीतलता भर देने वाला! लाल संतरे-सा वह पीला होकर धीरे-धीरे आग के गोले में बदलता उससे पहले मैंने खब्बड़सिंघ की लगाम ढीली की, वह पहाड़ी से फलाँगता हुआ उतरकर युद्ध-घाटी में पहुँच गया।

झारा की इस युद्ध-घाटी में कई कच्छी और सिंधी बार-बार आपसी लड़ाइयों कट मरे; अपनी ज़मीन और अहं के लिए क़ुर्बान होने वाले अपने उन पूर्वजों के प्रति मैंने और मेरे ऊँट ने घुटनों पर झुककर हमेशा की तरह सम्मान प्रकट किया। उनके प्रति यह सम्मान इसलिए नहीं था कि वे मेरे पूर्वज थे और उन्होंने शमशीरों से खेलते हुए मृत्यु को गले लगाया था, बल्कि उनके प्रति यह सम्मान इसलिए था कि उन्होंने अपने अभिमान और आज़ादी के लिए जीवन का मोह न पाला था।

कोरोना महामारी के चलते प्रधानमंत्री महोदय ने इक्कीस दिनों तक पूरे राष्ट्र को लॉकडाउन कर दिया है। देश में कोरोना महामारी का संक्रमण फैलने का डर है और देस में भुखमरी का संक्रमण फैलने का। देश और देस ने अपनी अपनी महामारियों से निपटने के लिए अपने-अपने तरीक़े अपनाए हैं। देश महामारी से बचने के लिए खाद्य सामग्रियों का ढेर जमाकर अपने-अपने घरों में क़ैद हो गया है और देस भुखमरी से बचने के लिए अपने-अपने गाँवों की ओर पलायन कर रहा है। मैं भी एक रण-द्वीप से निकलकर पास के क़स्बे में कुछ खाद्य-सामग्री जुटाने और कहीं ठहरकर लॉकडाउन काटने निकला हूँ।

बीच में एक जगह भेड़-बकरियाँ चराता तैयब मिला जिसने मुझे दूर से ही पहचान-कर, “रा…, औढाड़…, बावा…” की आवाज़ें लगाकर रुकवाया। तैयब पास के ही झारा गाँव का बाशिंदा है और उसके पास ढाई-तीन सौ के क़रीब भेड़-बकरियाँ हैं। भूरे सिर-गरदन वाली ‘देशण’ नस्ल की भेड़े और लाल-काले बदनवाली तथा लंबे आँचलों वाली दुधारू ‘काछण’ नस्ल की बकरियों का स्वामी तैयब फ़क़ीराना तबियत का बंदा है। तैयब ने मुझे भेड़ों के दूध की चाय बनाकर पिलाई और कटोरा भर बकरियों का दूध भी पिलाया। तैयब से मुझे मालूम हुआ की जगह-जगह सड़कों, चौराहों पर पुलिस बैठ चुकी है और लोगों की आवाजाही को संपूर्ण बंद कर दिया है। उसने मुझे हिदायत भी दी कि सड़क से अगर जाऊँगा तब मुझे पुलिस रोक सकती है, इसलिए मैं सीम (सीवान) की पगडंडियों वाले रास्ते से होकर जाऊँ।

मैंने तैयब की हिदायत पर अमल किया। सड़क की और न जाकर सीम की पगडंडियों से ही अपने ऊँट को आगे बढ़ाया। कँटीली झाड़ियाँ, ऊबड़-खाबड़ पगडंडियाँ और उतरती-चढ़ती पहाड़ियाँ होने के बावजूद मैंने ऊँट को पंध में ही तगड़ा। तीस-चालीस किलोमीटर का सफ़र पाँच-छः घंटों में ही समेट लिया और ग्यारह बजे के क़रीब ‘घड़ुली’ क़स्बे के चौराहे पर जा धमका। वहाँ गश्त पर बैठी पुलिस से बातचीत करके मुश्किल से बाज़ार जाने की छूट पाई। वैसे बहुत कम ही लोग घरों से बाहर निकलते दिख रहे थे, पर जो भी वहाँ से निकल रहा था पुलिस उसे रोककर सख़्ती से पूछताछ कर रही थी।

मैंने तुरंत एक किराने की हाट से चावल, खजूर, मूँग-चना वग़ैरह कठोल और मिर्च-मसाले की ठीक-ठाक गठरी बाँध ली और ऊँट लेकर लखपत की ओर चल पड़ा। दूर मोड़ लेने से पहले एक बार पलटकर पीछे देखा, पुलिस ने उस चौराहे पर कुछ लौंडों को मुर्ग़ा बनाया हुआ था। मैंने अपने ऊँट को लगाम झटककर तेज़ किया।

ऐसे में जब लॉकडाउन की स्थिति में कहीं आया-जाया नहीं जा सकता, तब मैंने निश्चय किया कि इस लॉकडाउन की अवधि में मैं ‘साकरीया’ वाले खेत में ही रहूँगा। छोटे-छोटे बीस गाँवों को समाए हुए पसरा पड़ा यह पूरा क्षेत्र क़रीब-क़रीब दो सौ चोरस किलोमीटर का है; समतल ज़मीन, घास से लहलहाते बड़े-बड़े चरागाह, एक कोयला खदान, बहुत सारे खेत और बहुत सारे घुमंतू पशुपालकों के डेरे और जलमग्न सैकड़ों तालाब तथा सरोवर! यह इलाक़ा मेरी जन्मभूमि, मेरा स्वर्ग, मेरा देस है! इसके हरेक पेड़, हरेक पहाड़ी, हरेक तालाब, हरेक नदी-नाले से मेरा केवल परिचय ही नहीं, घनिष्ठता भी है।

चरागाहों, खेतों, सीमों से चलते हुए बहुत सारे किसानों और गडरियों से मिलना हुआ। जगह-जगह चाय-पानी और बातचीत भी हुई। बातचीत से स्पष्ट हो रहा था कि कोरोना वायरस के संक्रमण से पहले गाँवों को सांप्रदायिकता का वायरस संक्रमित कर चुका है। तरह-तरह की अफ़वाहों और ज़हर से भरे इन ग्रामीण लोगों को मैं सिर्फ़ सुनता रहता, कहता कुछ नहीं। कुछ कहने का मतलब भी नहीं था, कुछ भी कहना अपने आपको उस ज़हर से डँसवा लेना था।

हिंदुओं को लग रहा था कि मुसलमान जान-बूझकर यह वायरस फैला रहे हैं, वे हिंदुस्तान को बर्बाद करना चाहते हैं इसलिए हज, उमराह से लौटकर वे अपने साथ कोरोना बीमारी देश में लाए हैं। मुस्लिमों के तर्क भी बहुत अलग-अलग थे; कोई कह रहा था कि ये जो मुसलमानों पर दुनिया भर में ज़ुल्म हो रहे हैं, उसका अल्लाह इंसाफ़ कर रहा है। दूसरा कोई कह रहा था कि क़यामत का दिन आने वाला है, अल्लाह अपने ईमान और दीन के पाबंद लोगों को जन्नत अता करेगा। तीसरा कोई कह रहा था कि यह अल्लाह की लाठी है जो मुसलमानों के अलावा सब पर पड़ेगी। ‘जितने मुँह उतनी बातें’ वाला मुहावरा इन दिनों ‘जितने मुँह उतना विष’ के शब्दार्थ में ही ठीक परिभाषित हो रहा है। किंतु ये बिल्कुल साफ़ था कि इन दिनों मुस्लिमों में मूर्खता और डर भरा पड़ा था और हिंदुओं में घृणा और क्रोध।

कच्छ की भीषण गर्मी और जिस्म से ख़ून चूस लेने वाली लू वैसे तो मार्च के तीसरे हफ़्ते से ही शुरू हो जाती हैं, परंतु इस साल शियाले की तरह उनाला भी कुछ देरी से आ रहा है। उत्तर और पश्चिम में काले वडरों (बादलों) को पीठ पर लादे हुए आभ कुछ नीचे झुक आया है। तीतर और मोर कंठों को फुला-फुलाकर फट्टे पड़े जा रहे हैं। बदरियों के छत्र को भेदकर धूप और सूर्य-किरणें धरती का दीदार करने के लिए अक्षम हैं। प्रकृति जब इस क़दर रोमांटिक हुई जा रही है, तब किसानों में किलोल की जगह कल्पांत मचा हुआ है। रबी फ़सलें खेत-खलिहानों में पकी पड़ी हैं और गगन में मेघाडंबर जम गया है। हर कोई तिरपाल, पन्नियों को लेकर खेतों की ओर भागा जा रहा था। महामारी, उसके पीछे की सारी ऊलजुलूल बातें, लॉकडाउन सब बिसरा गया था। घट और घटना में सिर्फ़ फ़सलों को किसी तरह बचाने की उतावल बनी हुई थी। हल्की-हल्की ठंडी हवा चलने लगी थी जो किसानों के ख़ून को ठंडा कर दे रही थी। ख़ुशनुमा बना मौसम किसानों के कलेजों में मातम-सा उतर रहा था।

आकाश में मेघ-गर्जनाओं की रणभेरियाँ बज रही थीं और बिजली सारे आसमान में आग लगाने पर आमादा थी। हल्की-हल्की बूँदाबाँदी शुरू हो चुकी थी। ‘गुनेरी’ गाँव की सीम में ‘राधोजी’ अपने खेत में कट्टी फ़सल बचाने की मशक़्क़त कर रहे थे। उनकी पंद्रह एकड़ ज़मीन में इसबगोल, अरंडा और गेहूँ की फ़सल लगी हुई थी। राधोजी मुझे दूर से ऊँट पर आते देखकर हेत से पसीजने लगे। राधोजी का मित्रता के स्नेह से भीगा कंठ कुछ ऊँचा हुआ, वह मुझे लाड़ लगाने लगे; “मुँजा सोढल, मुँजा रा, अवेर टाणे प् आवई पूगें! अच्च मुँजा मींह, मुँजी बाँह जा बर, मुँजा बावा, मुँजा सावज सींह!’’ (मेरे सोढा, मेरे रा, ऐसे आफ़त के समय में तुम जैसा मित्र यूँ अचानक चला आया! आयो मेरे मेघ, मेरी भुजाओं के बल, मेरे पिता, मेरे सावज सिंह!)”

पसीने से नहाया और हाँफता हुआ राधोजी काम छोड़कर बाँहें फैलाता हुआ बीस-तीस क़दम आगे बढ़ते हुए मुझे लेने आया। ऊँट से उतरकर मैं सीधे अपने मित्र राधोजी की बाँहों में समा गया। ज़्यादातर फ़सल तो खेत में ही खड़ी थी, किंतु अरंडा और इसबगोल की कुछ कटाई हो चुकी थी जो खरवाल में फैली पड़ी थी जिसे समेटकर तिरपाल से ढकने के श्रम में राधोजी जुटे हुए थे। हम दोनों मित्र तुरंत दंतालियाँ लेकर खरवाल में फैली पड़ी इसबगोल और अरंडों की फ़सल को उसेट-समेटकर तिरपाल से ढकने में लग गए। घंटे भर तक यह तनतोड़ तजवीज़ चली। इतना सख़्त श्रम और यत्न करने में हम दोनों पूरी तरह हाँफ गए थे। पर अब ज़रा बूँदाबाँदी रुक गई थी। लेकिन नभ अब भी काले मेघों से भरा पड़ा था जो किसी भी वक़्त बरस पड़ने को आतुर था।

राधोजी ने मुझे आगे बढ़ने न दिया, आज अपने वहाँ खेत पर ही रोक लिया। वह अपनी मोटरसाइकिल लेकर घर गए हैं। घर-गाँव से वह मद्य-भोज लेकर आएँगे और फिर हमारी रात्रि महफ़िल जमेगी। बारिश होने की संभावना के चलते और खेत में—खुले में भीग जाने के ख़तरे को देखते हुए खेत के पास ही एक गुफा में डेरा डाल दिया है। राधोजी के खेत के नज़दीक ही एक गुफा है, जहाँ बैठा मैं उनके लौटने का इंतज़ार कर रहा हूँ। यह एक प्राकृतिक गुफा है जो नदी के पानी के कटाव से बनी है। सदियों से पानी की कलाकारी, शिल्प-कौशल और श्रम से इन पत्थरों में यह प्राकृतिक गुहा-गृह संभव हुआ है। वैसे, कुछ दूरी पर और भी बहुत सारी मानव निर्मित बौद्ध गुफाएँ हैं। बौद्ध साधुओं ने किसी काल में यहाँ की पहाड़ियों में अस्सी के क़रीब गुफाएँ बनाई थीं। एक समय यहाँ बड़े-बड़े बौद्ध विहार भी हुआ करते थे। चीनी यात्री ह्यु-आन-साँग भारत भ्रमण करते हुए यहाँ आया था। उसने यहाँ की अस्सी बौद्ध गुफाओं का और बड़े बड़े बौद्ध विहारों का वर्णन अपनी किताब में किया है, हालाँकि अब अस्सी गुफाएँ तो नहीं मिलतीं; पर कुछेक गुफाएँ ज़रूर बची हुई हैं। कच्छ भूकंप प्रभावित क्षेत्र है और यहाँ अक्सर ही भूकंप आया करते हैं जिससे बहुत सारी गुफाएँ टूटकर खंडहर बन गई हैं; पर बची हुई गुफाएँ आज भी मेरे जैसे भटकते हुए लोगों के लिए, पशुपालकों के लिए, चोरों और शराबियों के लिए, अपराधियों के लिए सिर छिपाने का आसरा बनती हैं।

लकड़ियाँ इकट्ठी कर पाषाण गुहा में अलाव किया। उजाला होते ही बहुत सारे चमगादड़ चिंचियाते हुए बाहर भागे। गुहा के भीतरी कोनों तक ताप और प्रकाश नहीं पहुँच रहा था, पर हमारे लिए रात बिताने के लिए इतनी जगह पर्याप्त थी। यह ‘इतनी’ जगह किसी छोटे सभागार जितनी तो थी ही! चमगादड़ों के मल-मूत की तीव्र दुर्गंध को दबाने के लिए, मैंने अपने पास पड़ा कुछ गूगल आग में डाला। कुछ देर में ही बदबदाती गुफा महकने लग गई। घास का एक जूड़ा बाँधकर झाड़ू बनाया और अपनी ज़रूरत भर की जगह को साफ़ कर दिया। कुछ दूर नदी के सूखे पट में मेरा ऊँट चर रहा है। राधोजी मद्य-खाद्य सामग्री लेकर आ गए हैं और बाहर फिर से हल्की-हल्की बूँदाबाँदी शुरू हो चुकी है।

जारी…

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तीस वर्षीय सावजराज का संबंध गुजरात के कच्छ से है। वह गुजराती, सिंधी, अँग्रेज़ी और हिंदी भाषाएँ जानते हैं; लेकिन कभी स्कूल नहीं गए हैं। वह स्वाध्याय का मेधावी निष्कर्ष हैं। अपनी वैचारिक और सजग नैतिकता की वजह से गुजराती में लिखना छोड़ चुके सावजराज ने गुजराती में किए अपने सारे काम को कुछ बरस पहले सार्वजनिक रूप से अनकिया घोषित कर दिया है। इस काम में बहुत सारी कविताएँ और निबंध शामिल हैं। सावजराज इन दिनों हिंदी में कभी-कभी कविताएँ, समीक्षाएँ, प्रतिक्रियाएँ, रपटें, निबंध और पत्र लिखते हैं। यह लिखना भी बहुधा प्रकाशन के तंत्र में शरीक होने के लिए क़तई नहीं है। सावजराज सरीखी प्रतिभाएँ इस तंत्र की तात्कालिक निरर्थकता को बहुत बेहतर ढंग से समझते हुए चुपचाप अपना मूल काम करती रहती हैं। इस काम की बीहड़ता अपने पढ़ने वाले को अपने में समोने का हुनर रखती है। ‘लॉकडाउन डायरी’ सावजराज का नवीनतम काम है, जिसे ‘हिन्दवी ब्लॉग’ दस कड़ियों में प्रकाशित करने जा रहा है। ग़ौरतलब है कि आज से ठीक एक साल पहले देश में कोरोना के चलते 21 दिनों का संपूर्ण लॉकडाउन लागू किया गया था। ऐसे में इस डायरी की पहली कड़ी (25 मार्च 2020) को आज (25 मार्च 2021) पढ़ना अपने आपमें एक रोमांचक अनुभव है।