सावजराज

तीस वर्षीय सावजराज का संबंध गुजरात के कच्छ से है। वह गुजराती, सिंधी, अँग्रेज़ी और हिंदी भाषाएँ जानते हैं, लेकिन कभी स्कूल नहीं गए हैं। वह स्वाध्याय का मेधावी निष्कर्ष हैं। अपनी वैचारिक और सजग नैतिकता की वजह से गुजराती में लिखना छोड़ चुके सावजराज ने गुजराती में किए अपने सारे काम को कुछ बरस पहले सार्वजनिक रूप से अनकिया घोषित कर दिया है। इस काम में बहुत सारी कविताएँ और निबंध शामिल हैं। सावजराज इन दिनों हिंदी में कभी-कभी कविताएँ, समीक्षाएँ, प्रतिक्रियाएँ, रपटें, निबंध और पत्र लिखते हैं। यह लिखना भी बहुधा प्रकाशन के तंत्र में शरीक होने के लिए क़तई नहीं है। सावजराज सरीखी प्रतिभाएँ इस तंत्र की तात्कालिक निरर्थकता को बहुत बेहतर ढंग से समझते हुए चुपचाप अपना मूल काम करती रहती हैं। इस काम की बीहड़ता अपने पढ़ने वाले को अपने में समोने का हुनर रखती है। ‘लॉकडाउन डायरी’ सावजराज का नवीनतम काम है, जिसे 'हिन्दवी ब्लॉग' दस कड़ियों में प्रकाशित कर रहा है।

प्रकृति का चरित्र और कोरोना-कारावास

कोरोना काल में लॉकडाउन के चलते इंसान के संसार के गति रुक-सी गई है; लेकिन प्रकृति अब भी कितनी सहज, सरल और सुंदर ढंग से गतिमान थी। प्रकृति का चरित्र कितना संस्कृत और सुचारु है! किसी को भी ख़लल डाले बिना, हानि पहुँचाए बिना ज़रूरत भर का लेना और लौटाना।

हमारा और उनका नुक़सान

भीगी मिट्टी की मादक ख़ुशबू ने नासिका-द्वार से घ्राणेंद्रिय पर और पक्षियों के कलहनुमा कलशोर ने कानों के परदों के मार्फ़त श्रवणेंद्रिय पर दस्तक देकर सुबह-सुबह हमें नींद-मुक्त किया। रात भर मेह बरसा था और नभ अब भी मेघाच्छादित था।

रात्रि की भयावहता में ही रात्रि का सौंदर्य है

कोरोना महामारी के चलते प्रधानमंत्री महोदय ने इक्कीस दिनों तक पूरे राष्ट्र को लॉकडाउन कर दिया है। देश में कोरोना महामारी का संक्रमण फैलने का डर है और देस में भुखमरी का संक्रमण फैलने का।

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