सावजराज

तीस वर्षीय सावजराज का संबंध गुजरात के कच्छ से है। वह गुजराती, सिंधी, अँग्रेज़ी और हिंदी भाषाएँ जानते हैं, लेकिन कभी स्कूल नहीं गए हैं। वह स्वाध्याय का मेधावी निष्कर्ष हैं। अपनी वैचारिक और सजग नैतिकता की वजह से गुजराती में लिखना छोड़ चुके सावजराज ने गुजराती में किए अपने सारे काम को कुछ बरस पहले सार्वजनिक रूप से अनकिया घोषित कर दिया है। इस काम में बहुत सारी कविताएँ और निबंध शामिल हैं। सावजराज इन दिनों हिंदी में कभी-कभी कविताएँ, समीक्षाएँ, प्रतिक्रियाएँ, रपटें, निबंध और पत्र लिखते हैं। यह लिखना भी बहुधा प्रकाशन के तंत्र में शरीक होने के लिए क़तई नहीं है। सावजराज सरीखी प्रतिभाएँ इस तंत्र की तात्कालिक निरर्थकता को बहुत बेहतर ढंग से समझते हुए चुपचाप अपना मूल काम करती रहती हैं। इस काम की बीहड़ता अपने पढ़ने वाले को अपने में समोने का हुनर रखती है। ‘लॉकडाउन डायरी’ सावजराज का नवीनतम काम है, जिसे 'हिन्दवी ब्लॉग' दस कड़ियों में प्रकाशित कर रहा है।

सुनहरा और शोर भरा सौंदर्य

राजूसिंघ आकर मेरी नींद का बेरी बना। दुपहर हो चुकी थी। देर रात तक जागता रहा था, इसलिए बहुत देर तक सोता रहा था। राजूसिंह अपने घर से तसला भर विश्नान लाया था मेरे लिए और उसे जल्द खाकर तालाब में नहाने चलने की हिदायत दे रहा था।

मेरी कोई स्त्री नहीं

सियोत से लौट आने के बाद दो दिन से खेत पर ही पड़ा हूँ। यूँ पड़ा रहना मेरे स्वभाव के विपरीत रीति है। गतिशीलता, भटकन (मन और तन दोनों की) और उत्पात में ही मेरी आभा है और मुझे सुभीता है। मैं बहुत देर तक कहीं पड़ा नहीं रह सकता और बहुत देर तक एक जगह खड़ा भी नहीं रह सकता। लेकिन छड़ा रहने का गुण (अवगुण) मैंने ख़ुद विकसित किया है और जड़ा तत्त्व मुझमें स्वभाव-गत है।

लहू में आग और खाल में राग

सुबह-सवेरे मेरी आँख खुली तो सामने ग़ज़ब दृश्य था। बकरियों के बीच ज़मीन पर रामा लेटा पड़ा सो रहा था और बकरियाँ मिमियाते हुए उसका मुँह चाट रही थीं। रात को हम शराब पीकर नशे में ढेर हो गए थे। रात को कुछ खाया न था, इसलिए सुबह-सुबह बहुत ज़ोरों की भूख लगी थी। परंतु चूल्हे पर चढ़ाया गया खारी-भात का पतीला ग़ायब था।

प्रकृति का चरित्र और कोरोना-कारावास

कोरोना काल में लॉकडाउन के चलते इंसान के संसार के गति रुक-सी गई है; लेकिन प्रकृति अब भी कितनी सहज, सरल और सुंदर ढंग से गतिमान थी। प्रकृति का चरित्र कितना संस्कृत और सुचारु है! किसी को भी ख़लल डाले बिना, हानि पहुँचाए बिना ज़रूरत भर का लेना और लौटाना।

हमारा और उनका नुक़सान

भीगी मिट्टी की मादक ख़ुशबू ने नासिका-द्वार से घ्राणेंद्रिय पर और पक्षियों के कलहनुमा कलशोर ने कानों के परदों के मार्फ़त श्रवणेंद्रिय पर दस्तक देकर सुबह-सुबह हमें नींद-मुक्त किया। रात भर मेह बरसा था और नभ अब भी मेघाच्छादित था।

रात्रि की भयावहता में ही रात्रि का सौंदर्य है

कोरोना महामारी के चलते प्रधानमंत्री महोदय ने इक्कीस दिनों तक पूरे राष्ट्र को लॉकडाउन कर दिया है। देश में कोरोना महामारी का संक्रमण फैलने का डर है और देस में भुखमरी का संक्रमण फैलने का।

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