रमाशंकर सिंह

हिंदी कवि-लेखक और अनुवादक। इतिहास और समाजविज्ञान के अध्ययन-लेखन से संबद्ध।

दूसरी लहर के साये में

आज सुबह चार बजे ही उठ गया। बादल हैं, हल्का-हल्का उजाला हो रहा है। द्वार पर लगे बेल के पेड़ पर किसी चिड़िया ने घोंसला बनाया है। वह चहचहा रही है। उसके बच्चे भी हैं। माँ और शिशुओं की आवाज़ आपस में मिल जाती है। बाईं बाँह में वहाँ हल्का-सा दर्द हो रहा है, जहाँ कल टीका लगा था।

क्या हम समय, स्थान और लोगों को पहचान रहे हैं

इस अस्पताल में आने वाले मरीज़ों की सामाजिक-आर्थिक प्रोफ़ाइल का डेटाबेस बनाया जाए तो पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के एक बड़े हिस्से के बारे में चौंकाने वाले खुलासे होंगे।

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