हमारा और उनका नुक़सान

26 मार्च 2020

भीगी मिट्टी की मादक ख़ुशबू ने नासिका-द्वार से घ्राणेंद्रिय पर और पक्षियों के कलहनुमा कलशोर ने कानों के परदों के मार्फ़त श्रवणेंद्रिय पर दस्तक देकर सुबह-सुबह हमें नींद-मुक्त किया। रात भर मेह बरसा था और नभ अब भी मेघाच्छादित था। रात को बादलों ने जो पानी नीचे उड़ेला था, उसकी परिणति-स्वरूप नदी के पाट में एक झरने-सी जलधारा बहती जा रही थी। राधोजी ने नदी में मटमैले से बहते पानी पर एक दृष्टि डाली और मुड़कर गुफा में आग पर चाय चढ़ाई। नदी के पानी का मटमैलापन उनके चेहरे तैर आया था। इसी तरह बे-मौसमी बारिश ने कितने ही किसानों की फ़सल बर्बाद की होगी और उनके मुखों को मटमैला कर दिया होगा।

फ़सल के साथ साथ सारा श्रम और उम्मीदें भी पानी बहा ले गया था—मटमैलें मुखों, बदनों, वस्त्रों और चित्तों को छोड़कर।

चाय पीकर हम खेत में फ़सलों बर्बादी देखने चले। खब्बड़सिंघ (मेरा ऊँट) खेत की बाड़ में जंगली बेलें चर रहा था। खेत में प्रवेश करते ही पता चल गया कि सब कुछ नष्ट हो चुका था। गेहूँ ज़मीन पर सरपट लेटे हुए पड़े थे। पक्की हुई बालियाँ मिट्टी और कीचड़ में धँसी हुई थीं।

इसबगोल पूरी तरह चौपट होकर मिट्टी में ही मिल चुका था। इसबगोल के दानों के बारिश में झरकर मिट्टी में घुलमिल जाने से ज़मीन पर एक चिकनी, चमकती परत जम गई थी। अरंडों के पौधों में बारिश से धुलकर नई चमक आ गई थी पर उन पर से सारे पके सिरटें ज़मीन पर गिरकर नष्ट हो गए थे। खेत में चलते हुए राधोजी के पैर भारी हो गए थे। न उनसे चला जा रहा था, न मुँह से कुछ बोल फूट रहे थे। बस, खलिहान में कल शाम को जो तिरपाल से फ़सल ढक दी थी, वह साबुत बच गई थी—इतनी ख़ुशनसीबी थी। मुझसे उन्हें कुछ आश्वासन देते तो न बना, पर पीठ पर हल्का-सा हाथ रखा तो वह ज़रा मुस्कुरा दिए और बोले, “खेती में त्वारा-सारा वें, रा।” (रा, खेती-बाड़ी में अच्छे-बुरे आते रहते हैं।)

एक बार और चाय पीकर मैंने राधोजी से आगे बढ़ने की रज़ा ली। भीगी हुई ज़मीन में चलते हुए खब्बड़सिंघ के पैर धँस रहे थे। धरती पर पीछे पीछे पैरों के साफ़ निशान बन रहे थे जो महीनों तक नहीं मिटने वाले थे। आगे ‘धोरो तरा’ (सफ़ेद तालाब) के पास बकरियाँ चराता इशु मिला। इशु मेरे गाँव लखपत का ही बाशिंदा है, पर उसका डेरा अपनी बकरियों के साथ-साथ यहाँ-वहाँ बदलता रहता है। इशु पर अब तो बुढ़ापा छाने लगा है, पर इसकी युवानी के रंग और क़िस्से बहुत ख्यात है।

“मीं आयो न् रा प् आयो।” (मेघ आया और रा भी आया।) उक्ति से मुस्कुराकर इशु ने मेरा स्वागत किया। इशु ने बकरियों के दूध की चाय पिलाई और यह जानकारी भी दी कि मेरे पुराने मित्र हमीर जत्त और कमा रबारी की ऊँटनियों के टोले भी दस मील दूर पश्चिम में पुनराजपुर गाँव की सीम में डेरे डाले पड़े हैं।

लखपत क़िले के मुख्य-द्वार के बाहर पुलिस क़िले-बंदी करके खड़ी थी। बीसियों पुलिस-कर्मियों के अलावा कई पुलिस-वाहन, अन्य गाड़ियाँ और एंबुलेंस वग़ैरह भी खड़ी थीं। क़िले के बाहर तैनात पुलिस-जवानों से पता करने पर मालूम हुआ कि कच्छ में कोरोना से सबसे पहले संक्रमित मेरे लखपतवासी ही हुए हैं। पास के आशालड़ी गाँव के जो लोग हज-उमराह यात्रा करके लौटे थे, उनमें से एक महिला को कोरोना पॉजिटिव पाया गया। उस कोरोना-संक्रमित महिला के साथ लौटे बाक़ी हाजियों, उनके परिवारवालों और उनके संपर्क में आए सारे लोगों को लखपत क़िले में क्वारंटीन किया गया था जिसके चलते मेडिकल चेक-अप टीमें, आला अधिकारी वर्ग और पुलिस दस्ते यहाँ तैनात थे।

मैंने अब क़िले के भीतर—गाँव में जाना ठीक नहीं समझा और वैसे भी मुझे कुछ दूर खेत में ही डेरा डालना था तो ऊँट को वहाँ से आगे पश्चिम दिशा में साकरिया गाँव की तरफ़ बढ़ा दिया।

लखपत और साकरिया के बीच एक-डेढ़ मील का फ़ासला है। वहाँ ही मेरा खेत है, जहाँ जाकर मैंने अपना डेरा डाल दिया। मेरे खेत में भी रबी-मौसम में सरसों और इसबगोल फ़सल लगाई गई थी जो ‘सबकी जो गति भई मेरी भी वही सही’ के मुहावरे की इज़्ज़त करते हुए ज़मींदोज़ होकर पँचतत्त्व में विलीन होने के लिए अग्रसर थी। मुझे अपने ऊँट के साथ खेत पर आया देखकर मेरा भाग-बँटाईदार जुम्मा दूर से ही रोता-बिलखता हुआ आया और बताया, “रा, मीड़े धूड़धानी थई व्यो, क़िस्मत में ज् कंढा वा जीको पकल धान में पतंग लगो। मालिक तां साव मारे विधे।” (रा, सब कुछ मिट्टी में मिल गया। क़िस्मत में ही काँटे हैं, वरना इस तरह पक्की फ़सल में चिनगारी लगती! ख़ुदा ने तो बिलकुल मार ही दिया।) इतना कहते हुए जुम्मा ज़मीन पर उकड़ूँ बैठ गया और सिर पर हाथ रखकर नज़रें नीचे गड़ा दी। पीछे पीछे जुम्मा की बुड्ढी माँ छाती पिटती हुई आ रही थी, “बावा, चार-चार मेणेंजी मेनत ते पाणी फिरी व्यो। मुँजे भच्चले जों रंज रूली प्यो। रा, असां ग़रीब माड़ूएंजी मों जी मानी झट्टाजी वई।” (ठाकुर, चार-चार महीनों की सारी मेहनत पर पानी फिर गया। मेरे बच्चों की सारी कमाई डूब गई। रा, हम ग़रीबों के मुँह का तो निवाला छीन गया।)

मेरे लिए किसी को भी आश्वासन देना बहुत कठिन काम होता है। मुझ में दुःखी आदमी को दिलासा देना का शऊर नहीं है। मैंने सिर्फ़ बुढ़िया की ओर एक बार देखा और कई बार कई लोगों से सुनी वह सूक्ति ‘अल्लाह वडो अए…’ (अल्लाह बड़ा है…) ही कह पाया।

खेत की बर्बादी देखकर अब वहाँ खड़े रहना और फिर बुढ़िया की आपबीती सुनना मुश्किल था, इसलिए जुम्मा को कहा कि चलो पास के खेतों की ओर चलते हैं और हम दोनों चल पड़े। पता नहीं पीछे खड़ी बुढ़िया मेरे बारे उस समय क्या सोच रही होगी?

पास में अमरसिंघ का खेत था। अमरसिंघ और उनका लड़का जेंध्रा दोनों मिलकर खलिहान में तिरपाल ढकने के बावजूद भी जो कुछ कट्टी फ़सल भीग गई थी, उसे सँवारने में लगे हुए थे। अमरसिंघ ने काम करते हुए अँगोछे की धोती बाँधी थी जो मुश्किल से सिर्फ़ गुप्तांगों ढाक रही थी। फिर भी काम करते, हिलते-डुलते हुए बार-बार आंड़ बाहर निकल आते थे जिसे फिर से वह धोती के भीतर खोंस लेते थे। अपने बाप की इस हरकत पर जेंध्रा शर्मिंदा हो रहा था, पर संकोचवश कुछ कह नहीं पा रहा था।

उनको काम में लगे हुए देखकर हम आगे बढ़कर बल्लजी के खेत जा पहुँचे। बल्लजी, बल्लजी के सौ साल की उम्र के पिता मथरिंग, भैंसों का चरवाहा रघु, पड़ोसी गाँव का किसान पाँचाजी, मेरा मित्र राजूसिंघ तथा और दो-चार लोग वहाँ बैठे थे। बल्लजी सिर झुकाए रो रहा था और बाक़ी लोग उसे हौसला बँधा रहे थे। बल्लजी ने कहीं से सूद पर पैसे लेकर इसबगोल की फ़सल लगाई थी और उसकी सारी फ़सल बिगड़ गई थी। चार-चार महीनों तक जो पसीना और पैसा लगाया था खेत पर वह सब इस बारिश ने मिट्टी में मिला दिया था। बाक़ियों की भी हालत वैसी ही हुई थी, पर वे सब अपनी हिम्मत बाँधे हुए थे। वे जानते थे कि यूँ रोने-धोने से फ़सल लौटने से तो रही।

रोते हुए बल्लजी को रघु ने डपटा, “बापू, मड़द रो डिकरो था। आज शामलिए चार कण डूबाड्या शे तो काल हवारे हौ मण पाशा डेहे। आपण करता ऊपरवाला ने जाजी ख़बर। अने आमेय धरती माथे पाप ओशो शे? भगवान ने ते बधु हरभर करवो वोय न, तो केदी लीला भेरा हुका प बरी जाय। देवावालो दातार मोटो शे, आज लई लेहे तो काल पशा घणुं करी पाशुं करहे। जीणा माणाथी ठाकर ठग्गी न करे, दरबार।” (ठाकुर, मर्द की औलाद बनिए। आज ईश्वर ने चार दाने डुबा दिए हैं तो कल सौ मन वापस करेगा। हम सब लोगों से ऊपरवाला ज़्यादा समझदार है। और यूँ भी धरती पर पाप कम हो रहे हैं क्या? ईश्वर को सब हिसाब-किताब भी बैठाना पड़ता है न, उसमें कभी-कभार सूखों के साथ हरे भी जल जाते हैं। लेकिन आज जो उसने ले लिया है तो कल उसका पचास गुना वापस भी करेगा। ग़रीब लोगों से ईश्वर ठग्गी नहीं करेगा, ठाकुर।)

पिता मथरिंग ने पुत्र को संबल देते हुए कहा, “माड़ू री ख़ेरियत हुवे तो मिलकत पाछी कमाए लीशा।” (आदमी की ख़ैरियत हो तो माल-मिल्कियत बाद में भी कमा ली जाएगी।)

मथरिंग के कथन में राजूसिंघ ने अपनी बात जोड़ी कि दुनिया में सब लोग कोरोना महामारी से मर रहे हैं। सब काम-धंधे बंद हो गए हैं। अमीर लोगों के पास इतना सारा पैसा है फिर भी वे अपने लोगों को बीमारी से बचा नहीं पा रहे। फिर इतनी मिल्कियत का क्या फ़ायदा? हमारे यहाँ सब ख़ैरियत तो है। लखपति-करोड़पति लोगों के सारे धंधे बंद हो गए हैं, उनका रोज़ का करोड़ों का नुक़सान हो रहा है। उनके सामने हमारा नुक़सान क्या चीज़ है?

राजूसिंघ द्वारा प्रभावी ढंग से सुनाए गए इस भाषणनुमा लतीफ़े का सब पर प्रभाव पड़ा। सबने इस पर ‘हाँ-हाँ’ कहकर सिर्फ़ सहमति ही नहीं जताई, बल्कि सभी जनों के चेहरों पर संबल पाने की आश्वस्ति भी झलक रही थी। बल्लजी भी हौसला पाकर कहने लगा कि उन बड़े बड़े अमीरों के करोड़ों के नुक़सान के सामने मेरा तो नुक़सान बस सुई की नोक बराबर है। सभी ज़रा देर में अपने अपने छोटे दुःखों को भूलकर औरों के बड़े-बड़े दुःखों के लिए दुःखी होने लगे। यूँ ही ग्रामीण लोग दूसरों के दुःखों के सामने, अपने दुःख नापकर सुखी हो लेते हैं। इनके दुःख कितने भी बड़े क्यों न हों, वे उन्हें ऐसे छोटे-छोटे सुखों के सहारे काट लेते हैं।

मथरिंग राजूसिंघ के भाषण से बहुत प्रभावित हुए थे। गर्व और आश्चर्यमिश्रित भावों से क्षण भर उसे देखते रहे और फिर उसे अपने अमुलख बोलों से पुरस्कृत करते हुए कहा कि पढ़ा-लिखा लड़का है, कितना कुछ जानता है। टी.वी. देखता है और सारी ख़बर रखता है। बड़ा होशियार लड़का है। राजूसिंघ की बाँछे खिलखिला उठीं।

रघु की चाय पीकर सब खेतों से अपने-अपने घरों की ओर लौटे। दुपहर हो चुकी थी और भोजन का वक़्त भी हो चुका था। राजूसिंघ अपने घर से मेरे लिए टिफ़िन लेने गया। निश्चित हुआ था कि वह आज अपने घर से हम दोनों का टिफ़िन लेकर मेरे खेत पर आएगा और वहाँ साथ में बैठकर खाना खाया जाएगा और फिर लंबी वंतल चलेगी। जुम्मा दुपहरी करने अपने घर चला गया। मैं राजूसिंघ की राह तकते हुए अपने खेत में झाल की छाँव में सुस्ता रहा हूँ।

जारी…

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