सुनहरा और शोर भरा सौंदर्य

7 अप्रैल 2020

राजूसिंघ आकर मेरी नींद का बेरी बना। दुपहर हो चुकी थी। देर रात तक जागता रहा था, इसलिए बहुत देर तक सोता रहा था। राजूसिंह अपने घर से तसला भर विश्नान लाया था मेरे लिए और उसे जल्द खाकर तालाब में नहाने चलने की हिदायत दे रहा था। मैंने अपने नंगे बदन को धड़की से बाहर लाने से पहले एक अँगोछे से धोतीनुमा लपेटा और कुल्ला करके सीधे विश्नान पर झपट पड़ा।

तुलछासर बहुत पुराना तालाब है, जिसे किसी तुलसीदास सेठ ने बनवाया था। पत्थरों की पाल, घाट और पड़थार तो अब टूट चुके हैं, पर उसकी भव्यता के निशान अब भी मौजूद हैं। मैं और राजूसिंघ मोटरसाइकिल से जब तुलछासर पहुँचे तब तक वहाँ अन्य सखा मंडली मौजूद खड़ी थी। भावला था जो राजूसिंघ के चाचा का लड़का है और पूरे गाँव में लड़के-लड़कियों के बीच संदेशवाहक का काम करने में मशहूर है। उम्र में 15-16 साल का होगा पर हरामीपने के हर तजुर्बे में पूरा बीस है। लंबी-चौड़ी क़द-काठीवाला भोजा था जो कुछ गाँ*** का यार होने और काम करने के मामले में मशीन होने की उपाधि से सम्मानित था। डूँगरा था जो मेरी तरह ही पागलों और बार-बार घर छोड़कर भाग जाने वालों में गिना जाता था। सयाना लड़का प्रवीण भी था कि जिसका पिता उसे बारह साल का छोड़कर मर गया था और घर की सारी ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई थी और वह उसे बख़ूबी मेहनत करके निभा रहा था। अघाए साँड़ की तरह अल-मस्त हुआ उसका हरामख़ोर चाचा पेथा सिर्फ़ ठाकुरसुहाती, अय्याशी करता पड़ा रहता था और इस भतीजे की कमाई पर मज़े लूटता रहता। जुड़वा भाइयों की जोड़ हरा-वीका भी थे जो दोनों बहुत सीधे-सादे लड़के थे। उनके पिता लछमणिंग से मेरी अच्छी-ख़ासी जमती है।

डुबकी-तैराकी, पकड़म-पकड़ाई, पाल पर के बड़ के पेड़ से कूदम-कूदाई और पत्थरों को पानी की सतह पर फेंककर टप्पा खिलाने जैसे कई खेल करके थक गए। तीन-चार घंटों की मौज-मस्ती ने थका दिया था। सबकी आँखें पानी में डुबकियाँ लगा-लगाकर लाल हो गई थीं और पेट भूख के मारे गुड़गुड़ाने लगे थे। स्नान-नहान की मस्ती से निपटकर सब अपने अपने घरों की ओर भागे-धँसे हुए जा रहे थे। प्रवीण, भावा और मैं राजूसिंघ के साथ चौना-सवारी होकर अपने डेरे आए। सबने चाय-बिस्किट से थकान और क्षुदा मिटाई।

आज माँ, माँसा और कुछ दोस्तों से बातचीत भी हुई। माँ और माँसा से रोज़, दो-रोज़ बात होती ही रहती है। उन दोनों द्वारा प्रतिदिन डाँट-डपट, सलाह-सूचन, हिदायत-हेत और चिंता-प्रेम की ख़ुराक मिलती रहती है। उन्हें लगता है कि जैसे सारी दुनिया की आफ़तें मुझ अकेले पर ही उतरने वाली हैं। मैं उन दोनों की सारी बातें सुन लेता हूँ। उनसे अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा मुँह चढ़ाए हुए चुप्पी ओढ़ लेता हूँ या वात करते हुए ज़रा-सा अकड़ा हुआ रहता हूँ। वे दोनों तुरंत मेरी नाराज़गी भाँप लेती हैं और मनाने के लिए लाड़-दुलार करती हैं। माँ से कल ही किसी बात पर रूठा था, आज उसने “मुँजो सिंह पुत्तर, मुँजो डाह्यो डिकरो, मुँजो मीठड़ो बच्चो (मेरा शेर बेटा, मेरा अच्छा पुत्र, मेरा मीठा मीठा बच्चा)” कहकर लाड़-प्रेम से मना लिया। माँसा को मेरे लिए बहुत कम समय मिलता है। उसकी और भी संतानें हैं तो सबमें प्रेम बँट जाता है। मुझ तक उसके स्नेह-निवाले बहुत कम पहुँचते हैं। पर माँ की मैं अकेली औलाद हूँ, उसका नेह-स्नेह सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे लिए होता है, किसी से बँटता नहीं। उसका प्रेम सदा और सारा मेरे पर ही बरसता रहता है।

माँ साल में कुछ दिन मेरे पास-साथ रहने आती है। अक्सर जनवरी-फ़रवरी की सर्दियों में वह देश आती है, पर इस साल वह मेरे पास नहीं आ पाई। पहले नानी की बीमारी की चिंता, फिर नानी के पासपोर्ट-वीज़ा का झंझट और फिर कोरोना महामारी के चलते वह न आ पाई। इन दिनों सारी दुनिया की आवाजाही रुक-सी गई हैं। कई लोग अपने प्रियजनों से दूर दुनिया के किसी कोने फँसे रह गए हैं। कई लोग अपने लोगों से मिल नहीं पा रहे हैं। जो भूमंडलीकरण पूरी दुनिया को एक-दूसरे से जोड़ता है और उसी भूमंडलीकरण की बदौलत कोरोना महामारी तुरंत विश्व भर में फैल जाती हैं और लोगों के बीच एक अलगाव-रेखा खींच देती हैं। यह किसने सोचा होगा कि इस तरह का अलगाव भी एक दिन झेलना होगा!

आज एक अहमदाबादी स्त्री-मित्र से बातचीत हुई थी। उसने ताना मारने के लहजे में मुझे छेड़ा कि ‘लव-लाइफ़’ और ‘सेक्स-लाइफ़’ कैसी चल रही तुम्हारी? ‘तुम्हारी तरह मज़े नहीं हैं’ के अलावा और क्या ही जवाब देता? पर सच्च यह है कि मेरी ‘लव-लाइफ़’ कभी पनपी ही नहीं और ‘सेक्स-लाइफ़’ में कभी सुस्ती आई ही नहीं। हालाँकि इन दिनों ‘सेक्स-लाइफ़’ पूरी तरह गड़बड़ा चुकी है। लॉकडाउन की वजह से सभी संभोगी-भोगी-संगी स्त्री-मित्रों के पुरुष घरों में ही पैर जमाए पड़े थे, इसलिए हमें चोरी-छिपे रास-लीला करने का मौक़ा ही नहीं मिल रहा था। सखियों से दूर रस से भरा हुआ भी मैं सूखा जा रहा था। असल में मैं एक विशुद्ध प्रेमी हूँ—स्पर्श, चुंबन और गंध का रसिया। कोई वासनाभोगी लंपट नहीं हूँ, पर जिन्हें प्रेम किया उन्हें कभी पा न सका तो जो मुझसे दिल्लगी करना या देह-सुख पाना चाहती हैं—उन पर ख़र्च हो रहा हूँ। अब यूँ ख़र्च होना भी अच्छा लगता है कि कम से कम किसी के काम तो आ रहा हूँ। कल को यह देह, जीवन सब नष्ट हो जाना है तो क्यों न किसी को मस्त करूँ और मस्त रहूँ!

8 अप्रैल 2020

रात को जल्दी सो जाने का फ़ायदा है कि आप सुबह जल्दी जाग जाते हैं और परोढ़ का सुनहरा और शोर भरा सौंदर्य देख पाते हैं। पंछियों का शोर-कलशोरनुमा प्रातःगान, सीम को चरने जा रहे गाय-भैंस, भेड़-बकरियों के टोलों के धरती पर सामूहिक खुर रगड़न से उठती गो-धुली, लोटों-डिब्बों में जल भरकर ‘वन-भ्रमण’ की क्रिया निपटाने हेतु झाड़ियों की आड़ ढूँढ़ते नर-नारी और मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे के लाउड-स्पीकरों से आती घंटी-आरती, इबादत-अज़ान, कीर्तन-गुरुबानी की आवाज़ें मचान पर बैठे-बैठे देख-सुन रहा था। धर्मस्थलों से उठती ये आवाज़ें कभी-कभी सुरीली लगती हैं तो कभी-कभी सिर-फोड़ू शोर। उनका भाना और सताना तत्काल मनोस्थिति और परिस्थिति पर निर्भर करता है। आज सब कुछ भा रहा था, क्योंकि अच्छी नींद ने मनोस्थितियाँ और परिस्थितियाँ बहुत अनुकूल और ख़ुशनुमा बना दी थी।

एक हाथ में डिब्बा और दूसरे हाथ में अपनी धोती पकड़े भेरजी भोपा भागा-भागा-सा मेरे खेत-डेरे की तरफ़ निपटने आ रहा था जिसे मैंने मचान की ऊँचाई पर बैठे-बैठे दूर से ही देख लिया। मैंने अपनी मूँड़ी झुका ली और मचान पर लेटकर छिप गया। वह सीधा मेरे खेत की बाड़ के पास आकर उकड़ूँ बैठ गया। मैंने तुरंत गोफन अपने हाथ की और उस पर पत्थर चढ़ाकर तान दी। गोफन से निकला पत्थर भेरजी से कुछ दस फ़िट दूर कँटीली बाड़ में फटाक-सी आवाज़ करता धँस गया। भेरजी डरकर चीख़ा, “बचाए पाबू भालालो (बचाना, पाबूजी)।” मैं मचान पर गोफन थामे खड़ा ग़ुर्राया, “भोपा, ताज़ी कुत्ती इत्थ कित्थ ती माँज़ी कंधी मीं कँटा थी खाए (भोपा, तुम्हारी कुतिया यहाँ कहाँ आकर मेरी बाड़ के काँटे खा रही है?)?” भेरजी मुझ पर गालियाँ और अभिशाप बरसाता हुआ अपना गू से लिथड़ा पिछवाड़ा उठाए झाड़ियों की ओर भागा जा रहा था। सुबह सुबह किसी कमीने इंसान को सताकर मनोरंजन लेने से तन-मन तंदुरुस्त हो गया।

चाय-पानी और बाक़ी सारी प्रातःकालीन क्रियाएँ निपटाकर खब्बड़सिंघ की खोज में निकला। परसों रात कमा-हमीर और रामा के डेरों से लौटकर उसे चरने छोड़ दिया था, तबसे उसकी कोई खोज-ख़बर नहीं ली थी। वह उत्तर दिशा की ओर चरने गया था, अंदाज़ है कि समंदर के किनारे या फ़ौज की चौकियों के आसपास कहीं होगा। एक चौकी पर जाकर जवानों से टोह ली तो उन्होंने बताया की कल शाम को वह यहाँ उनके पौधों से भरे बाग़ को नष्ट करके पश्चिम की पोस्टों की ओर गया है। समदंर के किनारे पैरों के निशान, लाणा और चेर के पौधों को दाँतों से ख़रोंच-तोड़कर खाने के चिह्न और हग्गे गए मींगणो के ज़रिए उसका पीछा किया। कुछ ही दूरी पर वह समंदर के किनारे मुलायम रेत में लोटता हुआ मिल गया।

ऊँट लेकर में अपने डेरे को लौटा कि दो लौंडे मेरी राह देखते हुए खड़े थे। एक था पास के गाँव का शराब का बूटलेगर और दूसरा था एक पुलिसवाले का लौंडा। एक अवैध शराब के धंधे से मालदार हुआ था तो दूसरा अपने बाप की हराम की काली कमाई से। उनके हाथों की उँगलियाँ अँगूठियों से और गले चेन से सुनहले हो रखे थे। वे दोनों मुझसे मेरा ऊँट कुछ दिन के लिए चाहते थे जिसके बदले में मुझे प्रति रात एक हज़ार रुपए देने का प्रस्ताव भी लाए थे। बात यह थी कि लॉकडाउन के चलते वाहन-व्यवहार पर सख़्त पाबंदी हो रखी थी और सड़कों व चौराहों पर जगह-जगह पुलिस ने कड़ी पहरेदारी कर रखी थी, इसलिए नव ईजाद हुए तंबाकू, गुटका, बीड़ी-सिगरेट के अवैध व्यापार की आपूर्ति में इन लोगों को दिक़्क़त आ रही थी। उनको इस समस्या के समाधान हेतु वन, सीम, झाड़ियों और पगडंडियों के रास्ते खेप करने के लिए मेरा ऊँट बहुत उपयुक्त युक्ति मालूम हुआ था। मैंने इस प्रस्ताव के बदले दोनों भड़वों को अपनी महत्तम शिष्ट ज़बान से खींकारकर वलामणा किया। वे चमकते, मुस्कुराते उजले चेहरे लेकर आए थे और अपनी काली स्कार्पियो गाड़ी से मुँह बनाकर चले गए।

आज मेरे पास फिर से चाय-पत्ती ख़त्म हो चुकी थी। दुकानदार तो चार-पाँच-गुना मूल्य बढ़ोतरी की वही क़ैंची लिए बैठे थे, पर मैं अपनी जेब कटवाने को राज़ी नहीं था। गुरुद्वारे के व्यवस्थापक और मित्र फ़तहसिंघ से चाय-पत्ती जुटाने का प्रयास किया पर फ़तहसिंघ ने बताया कि गुरुद्वारे का लंगर भी चाय-पत्ती, आटे की कमी से जूझ रहा है। कुछ देर बाद फ़तहसिंघ ने कॉल करके बताया कि ज़रूरी माल-सामान का जुगाड़ हो गया है पर जुटाने में ज़रा-सी मुश्किल हो सकती है। मुश्किल यह थी कि जिस बावाजी दोस्त की चाय की रेहड़ी में चार-पाँच किलो चाय-पत्ती पड़ी थी, वह लॉकडाउन के चलते बंद पड़ी थी और लखपत क़िले के उसी द्वार पर पुलिस का सख़्त पहरा लगा रहता था जहाँ वह रेहड़ी थी। और यहाँ पर ही बहुत सारे लोगों को क्वारंटीन किया जा रहा था जिसके चलते पुलिस, मेडिकल विभाग की टीमों और आला अफ़सरों की दिन भर चहल-पहल लगी रहती थी। बेचारे बाबा जी की हालत यह थी अपनी रेहड़ी चाय-पत्ती से भरी पड़ी थी और उनके घर में चाय-पत्ती न थी। तो तय यह हुआ की देर रात को जब सारी चहल-पहल मंद पड़ जाएगी, तब चोरी-छिपे रेहड़ी खोलकर चाय-पत्ती चुरा ली जाएगी और रातों-रात मेरे ऊँट पर धान लादकर चक्की पर आटा पीसवा लिया जाएगा। बाक़ी सारी सुविधाएँ देख लेना फ़तहसिंघ के ज़िम्मे था।

रात को बड़ी आसानी से हमने अपने मिशन को अंजाम दिया। फ़तहसिंघ ने चक्कीवाले से और पुलिस से बात कर रखी थी, जिन्होंने देर रात के हमारे इस मिशन में सहयोग भी किया। मैंने और बाबा जी ने आधा आधा किलो चाय-पत्ती ली, बाक़ी सब फ़तहसिंघ के हवाले की क्योंकि गुरुद्वारे की रोज़ की खपत बहुत थी। मैंने अपने लिए गुरुद्वारे से कुछ आटा और तेल भी जुटाया। अब कम से कम महीने भर के लिए तो चाय-पत्ती की चिंता से मुक्ति पा ही ली थी।

जारी…

~•~

पिछली किश्तें यहाँ पढ़ें : रात्रि की भयावहता में ही रात्रि का सौंदर्य हैहमारा और उनका नुक़सानप्रकृति का चरित्र और कोरोना-कारावासलहू में आग और खाल में रागमेरी कोई स्त्री नहीं

ट्विटर फ़ीड

फ़ेसबुक फ़ीड