जीवन का पैसेंजर सफ़र

यह नब्बे के दशक की बात है। 1994-95 के आस-पास की। हम राजस्थान विश्वविद्यालय में पढ़ा करते थे। साहित्य में रुचि रखने वाले हम कुछ दोस्तों का एक समूह जैसा बन गया था। इस समूह को हमने ‘वितान’ नाम दिया था।

यह रात भर वर्षा के बाद की भीगी हुई सुबह थी। हिमांशु (पंड्या) बहुत रोमांचित था। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखकर मुझे एक ओर ले जाते हुए गुपचुप तरीक़े से बताया, पता है कल शाम मैं किससे मिला?

”किससे?” मैंने कहा, ”बता-बता।” उसका दिल ख़ुशी के मारे रूसी नायकों की तरह बाहर निकला पड़ रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे अभी-अभी अपने पहले प्रेम में पड़कर आ रहा है। ”तू सोच किससे मिला होऊँगा?” मेरे दिल में गुदगुदी होने लगी ज़रूर कोई जादुई बात है।

‘‘किससे मिला बता?’’ मैंने लगभग उसी के जितना तड़पते हुए पूछा।

‘‘कहानीकार सत्यनारायण से।’’ उसने रहस्य पर से परदा हटाया।

‘‘कौन है ये?” मैंने अभी भी उतनी ही दिलचस्पी बनाए रखते हुए पूछा।

‘‘अरे बहुत बड़े कहानीकार हैं।’’ उसने कहा।

‘‘कहाँ मिले तुझे?’’ मेरी दिलचस्पी अभी भी बनी हुई थी। लेखकों को पढ़ना हम सारे वितानियों का शग़ल था, लेकिन किसी लेखक से मिल ही लेना, यह तो बड़ी बात थी। मुझे हिमांशु से ईर्ष्या होने लगी। उसने शायद मेरी ईर्ष्या पढ़ ली थी। कुछ अधिक ही उत्साहित होकर बताने लगा, ”हुआ क्या कि मैं ‘रचना प्रकाशन’ पर किताबें खरीदने गया था। वहाँ वह मुझे मिल गए। और सुन कल भी मिलेंगे वह हम सबको। मैंने उनसे कह दिया कि सर मेरे कुछ मित्र भी आपसे मिलना चाहेंगे। सही किया ना मैंने?”

”सही किया यार सही किया।” मेरे पास बेवक़ूफ़ की तरह ऐसा बोलने के अलावा कोई चारा नहीं था, क्योंकि अब तो कल वह उनसे मिलाने में हमारा नेतृत्व भी करने वाला था। फ़िलहाल उसने हो चुकी मुलाक़ात के बारे में बताना जारी रखा। ‘‘चलो थोड़ा बाहर टहलते हैं।’’ लेखक सत्यनारायण ने ख़ुद ही मुझसे कहा। और फिर हम फ़ुटपाथों पर टहलते रहे। बूँदे गिरने लगी थीं। हम भीगते रहे, बातें करते रहे और बाद में देर शाम उन्होंने मुझे घर तक छोड़ा।’’

अगले दिन ‘रचना प्रकाशन’ पर हिमांशु ने सच में हमें उनसे मिला दिया। हम कौन-कौन दोस्त थे उस दिन, यह तो याद नहीं, लेकिन हिमांशु के अलावा कम से कम मैं और मनोज तो ज़रूर ही थे। सियाराम, कप्तान, देवयानी, विश्वम्भर में से भी कोई होगा तो पता नहीं। तब मैंने पहली बार डाॅ. सत्यनारायण को देखा था। वह ‘रचना प्रकाशन’ की छोटी-सी दूकान में लकड़ी के एक बेंचनुमा फंटे पर लेटे हुए दूधनाथ सिंह की सद्य:प्रकाशित किताब ‘निराला : एक आत्महंता आस्था’ पढ़ रहे थे।

उस वक़्त हममें से केवल हिमांशु ही यह कल्पना आसानी से कर पा रहा होगा कि जिस तरह से कहानीकार सत्यनारायण यहाँ ‘निराला : एक आत्महंता आस्था’ पढ़ रहे हैं, ठीक इसी तरह से इनके अनेक पाठक इनकी लिखी ‘फटी जेब से एक दिन’, ‘रेत की कोख में’, ‘इस आदमी को पढ़ो’, ‘जहाँ आदमी चुप है’ आदि किताबें पढ़ रहे होंगे। तब तक हममें से हिमांशु ही ऐसा था जो उनकी कहानियाँ पढ़ चुका था। इन किताबों के लेखक के रूप में सत्यनारायण हिंदी साहित्य जगत में चर्चित और स्थापित हो चुके थे। बेरोज़गारी की लंबी भटकनों के बाद अब वह जोधपुर विश्वविद्यालय में प्राध्यापक भी बन चुके थे।

इस पहली मुलाक़ात के बाद वह हमें जयपुर की उन दिनों में होने वाली साहित्यिक गोष्ठियों में दिख जाते तो हम उनसे ऐसे शरमाते हुए नमस्कार करते जैसे किसी प्रेमिका से उसके माता-पिता के सामने मिल जाने पर ‘हलो’ कहना पड़ रहा हो। उन दिनों जयपुर में बड़ी अच्छी साहित्यिक गोष्ठियाँ हुआ करती थीं, फ़ेस्टिवल नहीं। कवि ऋतुराज को ‘पहल सम्मान’ से नवाज़ने के लिए ज्ञानरंजन ख़ुद चलकर जबलपुर से आए थे। उन दिनों कहीं नामवर सिंह का व्याख्यान हो रहा है तो कहीं हरीश भादानी और कृष्ण कल्पित के गीत तो कहीं नंद भारद्वाज का कविता-पाठ। कहीं लवलीन को अंतरीप साहित्य सम्मान मिल रहा है तो कहीं रघुनंदन त्रिवेदी की किताब पर उदय प्रकाश बोल रहे हैं। कहीं मुकुंद लाठ, प्रोफ़ेसर दयाकृष्ण, राजेंद्र भटनागर बोल रहे तो कहीं यशदेव शल्य। ऐसे में कहीं भी डाॅ. सत्यनारायण मिल जाते। वह हमें अन्य साहित्यकारों से मिलवाते। अशोक शास्त्री, अजंता चौधरी, गोविंद माथुर, हरीश करमचंदानी, सवाई सिंह शेखावत, विनोद पदरज, अम्बिका दत्त, संजीव मिश्र, शिव योगी, राजाराम भादू आदि साहित्यकारों से हमें उन्हीं ने मिलवाया। प्रेमचंद गाँधी और ओमेंद्र उन दिनों उभरते हुए सितारे थे। जयपुर में शेखर जी और उनके लोकायत प्रकाशन से न मिलना साहित्य में रुचि रखकर मगर से बैर रखना होता।

डाॅ. सत्यनारायण लोकायत प्रकाशन पर भी जब-तब मिल जाते और अब तक उनसे बाहर ही बाहर इतनी मुलाक़ातें हो गई थीं कि एक दिन हम उन्हें अपने कमरे पर ही ले आए। यह इसीलिए संभव हो पाया कि दोनों तरफ़ थी आग बराबर लगी हुई। हमारे कमरे को यह गौरव हासिल करना था कि वहाँ एक साहित्यकार आ चुके हैं। तब तक हमें पता नहीं था कि डाॅ. सत्यनारायण की तो धुन ही है जीवन को उसके नज़दीकतम जाकर पढ़ना। यह तो बाद में जब हम उनके रिपोर्ताज पढ़ते हैं तब पता चलता है कि जीवन के हाशिए पर गुज़र-बसर कर रहे लोगों के प्रति उनके दिल में किस क़दर प्यार भरा हुआ है। भिखारी (जिन्हें वह भिखारी नहीं फ़क़ीर कहते हैं), मालिन, रिक्शेवाले, मोची, कुम्हार, कफ़न बेचने वाले, नट, बहुरूपिए, ढाबेवाले, चायवाले, पोस्टर चिपकाने वाले, लुहार, अंडरवर्ल्ड के लिए कामों के फँसे युवक, ट्रक-ड्राइवर, ख़लासी, सड़क बनाने वाले, साधु-संन्यासी, साइकिल सुधारने वाले, बाल-मज़दूर आदि किन-किनके जीवन को उनके अँधेरों में उतर उन्होंने नहीं पढ़ा है।

‘केसर क्यारी’ की तलाश में वह चंबल के बीहड़ों में पहुँच जाते हैं, ”उस साँझ मैं डरा हुआ धौलपुर के डाँग क्षेत्र में गया था। एक भय, एक झुरझुरी बराबर मन में तारी थी। लेकिन उत्सुकता भी थी केसर से मिलने की कि आख़िर ऐसा क्या है उसमें जो सातवें घर में सातवें पति के पास थी। …उन दिनों वह एक किंवदंती की तरह थी, इलाक़े में कोई उसकी सुंदरता पर रीझता तो कोई मूँछों के बल पर उसे उठा ले जाता।”

अपने एक दोस्त पंकज के साथ एक रात वह ख़ुद को श्मशान में चिता के पास पाते हैं। वहाँ से बिछुड़ा पंकज उन्हें फिर कभी नहीं मिला। एक रात को रैन-बसेरे में सर्दी से बचने के लिए वह जिस आदमी के बग़ल में सो जाते हैं, सुबह उसके शरीर पर चींटियाँ रेंगती देखते हैं तो पता चलता है कि वह एक मुर्दे के पास सो रहे थे। ऐसी ही एक और सर्दी के रात वह जयपुर में रामनिवास बाग़ के पास से गुज़रते हुए अपने कमरे की तरफ़ जा रहे थे अपने मरणासन्न शिशु को बचाने की ख़ातिर पैसे के बदले शरीर बेचने के लिए निकली हुई एक औरत उन्हें मिलती है। वह आधी रात को सारे ख़तरे मोल लेते हुए उस स्त्री के पीछे-पीछे चल देते हैं। जाकर उस मरणासन्न शिशु को देखते हैं, ‘‘दूध के दाँतों वाली एक काया उसके हाथों में झूल रही थी बे-आवाज़, बे-हरकत।’’ गड़ती रात में उन्हीं क़दमों पुलिस चौकी पहुँचते हैं, ‘‘दीवान जी उठिए… मेरे साथ चलिए। एक ग़रीब औरत का बच्चा नहीं रहा और उसके पास कुछ नहीं है।’’

लेखन के लिए, लेखन में सच्चाई के लिए इतनी क़ीमत चुकाने वाला ऐसा लेखक, मैंने इतने क़रीब से दूसरा नहीं देखा था। सच्चाई की तलाश के लिए दर-दर की ठोकरें खाने वाला एक बीहड़ लेखक होना उन्होंने चुना। इस कारण उनका जीवन किस क़दर बीहड़ रहा है, कई बार लगता है कि इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है।

लेखक अपना समूचा जीवन लगाकर अपनी भाषा अर्जित करता है। डाॅ. सत्यनारायण ने जीवन में बातचीत करने के लिए अलग भाषा अर्जित की थी और लिखने के लिए अलग। ठीक वैसे ही जैसे प्रसिद्ध उपन्यासकार अमृतलाल नागर के पास लिखने के गल्प का ज़ख़ीरा अलग हुआ करता था और सुनाने के गल्प का अलग। तो हम डाॅ.सत्यनारायण की दोनों ही तरह की भाषा के मुरीद। जब कभी वह हम वितानियों के बीच होते तो हम उनसे पूछते डाॅक्टर साब जोधपुर में आपका मकान है या विश्वविद्यालय का आवास है? वह कहते, ”अरे कहाँ यार!”

”तो फिर रहते कहाँ है?”

”अभी तो ऐसे ही है। किराए का मकान कसवा रखा है। और उसी में किराए का पलंग, कुर्सी, रजाई-गद्दा वग़ैरह कसवा रखे है।’’

‘‘रजाई-गद्दा, कुर्सी किराए के!?’’

‘‘हाँ टेंट हाउस वाले से डलवा रखे हैं। एक रुपए रोज़ाना के हिसाब से तीस रूपैये एक साथ ही दे देता हूँ। ऐसे ही है ये तो जीवन है प्यारे लाल। और कट जाएगी रे। अपण को क्या करणा है…। मेरी तो कट गई अब ये वतन तुम्हारे हवाले है साथियो।’’

‘‘तो उस मकान में और भी किराएदार रहते हैं कि आप ही हैं अकेले?’’

‘‘रहते हैं। एक बिल्ली रहती है। दो गिलहरियाँ। कुछ पेड़ है नीबू के। जोधपुर आ जाओ कभी यार दिखाऊँगा तुम्हें। सीधी रेल आती है, उसमें बैठ जाना। स्टेशन पर मैं लेने आ जाऊँगा।’’

हमें उनकी बातों पर शक होता। हम मन ही मन सोचते कि ये कथाकार तो हैं ही सो ऐसे क़िस्से गढ़ने में माहिर है। लेकिन अगर ये क़िस्से हैं, तब भी इनमें जीने का एक तरीक़ा एक विकल्प दिखाई देता है।

जोधपुर में रहते हैं मगर उनका एक पाँव जयपुर में ही रहता है। छुट्टी मिलते ही वह जयपुर की ओर ऐसे भागते जैसे साँझ ढलते ही चरवाहे और गड़रिए गाँव और घरों की ओर भागते हैं। क्या चरवाहों और गड़रियों की तरह जयपुर में उनका घर है? नहीं। तो फिर? तो फिर क्या जितने दिन जयपुर ठहरना होता है होटल चंद्रमहल में किराए का एक सस्ता-सा कमरा कसवा लेते हैं। और जयपुर आने पर किराये का कमरा कसवा कर रहते हुए उन्हें इक्कीसवाँ साल चल रहा है। होटल चंद्रमहल के कमरे में वह एक दो दिन से लेकर पचास दिन तक ठहरते हैं। खाने के लिए रोटियाँ और सब्ज़ी आस-पास के किसी ढाबे से कसवा लेते हैं। अपने इस ग्राहक पर दंग होटल मालिक कभी-कभार वार-त्यौहार को घर से कोई एक सब्ज़ी या पूरा खाना भी भिजवा देते हैं। उनका मान रखने के लिए डाॅ. सत्यनारायण साल में एकाध बार स्वीकार भी कर लेते हैं।

अक्सर शाम से देर रात तक उनके साथ सड़कों पर पैदल या रिक्शों में भटकना होता। मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी उन्होंने मुझे बिना खाना खिलाए लौटने दिया हो। अंधे को क्या चाहिए, दो आँखें। मैं भी खाकर ही आता। सड़क किनारे किसी ढाबे या होटल पर खाते। वह रोटी तोड़ते जाते और कहते जाते कि ‘पास्काॅल दुआर्ते का परिवार’ पढ़ा है? पढ़ना बेटे। मेरे कहने से एक बार पढ़ना। ‘अपराध और दंड’ पढ़ा है? ‘अन्ना कारेनिना’ पढ़ा है? मैं कुछ न बोलूँ, चुप रहूँ तो वह कहेंगे पढ़ना, मेरे कहने से एक बार ज़रूर पढ़ना। और मैं कहूँ कि हाँ पढ़ा है, तो वह कहते कि एक बार और पढ़ना और इस बार मेरी आँख से पढ़ना। मैं मन ही मन सोचता कि यार डाॅक्टर साब की आँख कोई चश्मा तो है नहीं कि एकाध दिन के लिए माँगकर ले जाऊँ। जिस आँख से पढ़ने की ये बात कर रहे हैं, उस आँख को पाने के लिए इन्होंने ज़िंदगी दाँव पर लगा दी है। वह वेटर को आवाज़ लगाते, ”अरे छोरा, बेटा, हॉफ प्लेट दाल और लगा, ये जवान आदमी है यार।” फिर मुझसे मुख़ातिब होते हुए कहते, ”रोटी मिल गई। अब क्या है? फफेड़ देंगे दुनिया को।” मुझे गोरख पांडेय की कविता याद आती, ”हिलेला रूसवा, हिलेला लातिन अमरीकवा, हिलेला झकझोरा दुनिया।”

एक शाम ऐसे ही किसी एक ढाबे वाले से न जाने क्या तो बात हो गई या वो टल्ली था कि पता नहीं क्या? जो भी था उसमें कहने लायक़ बात यह है कि वो भाई सब्ज़ी काटने वाला लंबा छुरा निकालकर मेरी तरफ लपका। डाॅ. साब वैसे ही मेरे आगे आ गए जैसे दो-ढाई हज़ार साल पहले बुद्ध उस हिरण के आगे आ गए थे जिस पर तीर छोड़ा जाने वाला था।

अब हमारा मिलना-जुलना इतना बढ़ गया था कि उनके जयपुर आने का हमें बड़ा आकर्षण रहता। वह हमें कोसते कि कभी कमरों से बाहर भी निकला करो। काॅफ़ी हाउस आ जाओ मैं चार बजे तक यहीं मिलूँगा। मैं और मनोज उन्हीं क़दमों चल पड़ते। वह हमें काॅफ़ी पिलाते। बात से बात निकलती जाती, ‘‘अरे एक ओर ज़ोरदार बात सुनो। पत्रकारिता की क्लास चल रही थी। मेरी एक विद्यार्थी यूनिवर्सिटी खुलने के कोई दो महीने बाद क्लास में आई और वो भी केवल उपस्थिति लगवाने के उद्देश्य से। मैंने कहा कि अरे बावड़ी यहाँ आने का कष्ट क्यों किया। फ़ोन कर देती। मैं उपस्थिति लगा देता। पूरी क्लास धर हँसी। छोरी बिचारी बहुत शर्मिंदा हुई।’’ मैं सोचता एक तो आपने क्लास के सामने उसकी माटी भी कर दी और अब आपको वो बिचारी भी लग रही है!

जो भी याद आता वही बात करने लगते। अभी अपने छात्रों को याद कर रहे थे कि अचानक बोले कि मनोहर श्याम जोशी की किताब ‘कुरु कुरु स्वाहा’ का ‘समर्पण’ पढ़ा है। कितना अच्छा लिखा है, ‘‘समर्पित हजारी प्रसाद द्विवेदी और ऋत्विक घटक, इन दो आचार्यों की पुण्य स्मृति में इस निवेदन के साथ कि सागर थे आप, घड़े में किंतु घड़े जितना ही समाया।” कितनी बड़ी बात है, ”सागर थे आप, घड़े में किंतु घड़े जितना ही समाया।” हम कहते, ”सौदाई पर बहुत अच्छा लिखा है डाॅक्टर साब आपने?” वह सौदाई के बारे में विस्तार से बताने लगते। शैलेश मटियानी उनके प्रिय लेखक हैं। वैसे उनके तो सभी प्रिय लेखक हैं। वह इतना पढ़ते हैं कि उनके पास उधर पुराने से पुराने में से और इधर नए से नए में से बताने को बहुत कुछ रहता है। बोले, ”शैलेश मटियानी की ‘लेखक की हैसियत से’ किताब ज़रूर पढ़ना। कमाल किताब है।” शैलेश मटियानी से मुक्तिबोध पर होते हुए अब वह मलयज पर आ गए कि मलयज की डायरी पढ़ना यार। अरे बड़ी अद्भुत डायरी है। समीक्षा लिखी है मैंने इसकी, ”जीवन का पैसेंजर सफर।” और मुझे लगा कि डाॅक्टर साब के जीवन को एक वाक्य में कहना हो तो कैसा सटीक वाक्य है ये—”जीवन का पैसेंजर सफर।”

दो-तीन बरसों में डाॅ. साब के साथ धीरे-धीरे इतना संवाद होने लगा था कि अब उनसे मिलने की तड़प रहने लगी। उन्हें भी हमारा संग-साथ रास आने लगा था। कई बार जोधपुर से आते तो स्टेशन से मेरे कमरे पर ही आ जाते। पता चलता कि वह आ रहे हैं। मैं फ़ोन पर ज़िद ठान लेता कि सीधे यहीं आना है। मैं जयपुर में बरकत नगर में रहता था। दीपक सैनी के मकान में सामने बड़ा-सा खुला मैदान था। बग़ल में सफ़ेदे के पेड़। उनके आने की बेला थी यह। मैं बाहर फ़ाटक पर जाकर उनका इंतज़ार करने लगा। कुछ ही देर में वह थैला कंधे से लटकाए आते हुए दिखाई पड़ गए। जैसे ही दिखे मुस्कराने और बोलने लगे, ‘‘अरे यार प्रभात! मैं तो मर जाऊँगा यार! मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आता ये संसार। मैं स्टेशन पर रेल से उतरा तो आश्चर्यचकित रह गया। देर तक खड़ा देखता रहा ये इतने सारे लोग। कहाँ से आ रहे हैं ये? कहाँ जा रहे हैं इतने भारी-भारी बोझे उठाए। बीवी-बच्चों के साथ। इतनी बड़ी भीड़ जैसे कोई देश उजड़ गया हो।’’

मेरे पास एक छोटी सी-कोठरी थी—कुल आठ गुणा आठ फ़ीट की, जिसमें एक टुटहा पलंग था। डाॅ. साब आते तो मैं पलंग का गद्दा नीचे उतार कर जमीन पर सोता वे खरैड़े पलंग पर। पलंग की निवार इतनी टूटी हुई थी कि सिरहाने की ओर से उनकी गरदन नीचे लटक जाती थी और पैरों की ओर दोनों पैर नीचे लटक जाते। गद्दे से कुछ सहारा रह जाता था। गद्दा नहीं होने पर उस पर सोना सजा काटने के जैसा होता था। मैं उन्हें यह सजा नहीं देना चाहता था, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि मैं पलंग पर सोऊँ और उन्हें ज़मीन पर सुलाऊँ। वह कई बार कहते, ”अरे यार मैं ज़मीन पर सो जाता हूँ।” मैं कहता, ”ये कैसे हो सकता है!” उन दिनों मैं अख़बारों से नायिकाओं के चित्र काटकर बक्से में रखा करता था। अख़बार आते ही पहला काम यही करता। डाॅ. साब जगते और मुझे अख़बार में से तब्बू, माधुरी दीक्षित, जूही चावला वग़ैरह निकालते देखते तो कहते, ”हे ईश्वर! तूने ही जूही चावला बनाई, तूने ही माधुरी दीक्षित और तूने ही ये प्रभात बनाया।” फिर हम ठहाका लगाकर हँसते। कई बार मेरे जागने से पहले वह जाग जाते तो जिसमें नायिकाएँ होती उस पन्ने को अलग रख देते। जगने पर मुझे देते, ”ये ले काट ले। कई बार रात में कहीं भटकते-भटकाते देर से आते। कमरे में पानी नहीं होता। डाॅ. साब काॅलोनी के मंदिर की प्याऊ पर ख़ुद पी आते और मेरे लिए जग में भर लाते। मेरे पास पीसने के लिए सिलबट्टा नहीं था। सो हरी मिर्ची, प्याज, धनिया वग़ैरह को काटकर चकला-बेलन पर पीसना होता। एक दो बार देखने के बाद ही उन्होंने चकला-बेलन पर हरी मिर्ची, धनिया वग़ैरह पीसना सीख लिया। मेरे पास स्टोव ही था। मैं स्टोव में पंप देता इतने में वह आलू काट लेते और मैं आटा लगाता इतने में वह आलुओं को छौंक डालते। जोधपुर में रहकर उन्होंने कम पानी बरतना सीख लिया था। आधी बाल्टी में ही नहा लेते। मैं इस बात से चकित रह जाता। इस सबके समानांतर दिन भर वह विश्व साहित्य में क्लैसिक्स की चर्चा किया करते। भारतीय साहित्य में भी दूसरी भाषाओं के लेखकों और किताबों के बारे में बातें किया करते। बिज्जी ने एक बार बातचीत में कहा था, ”कण भर लिखो तो मण भर पढ़ो।” डाॅ. साब के लेखन और पठन के बीच बिज्जी का अनुपात खरा बैठता है।

जयपुर में एक समय में उनके समकालीन प्रतिभाशाली लेखक मित्र उनकी अब तक आ चुकी चार-पाँच किताबों का मज़ाक़ जैसा उड़ाते हुए कहते थे कि किताबें आने से क्या होता है हम एक ही बार में क्लैसिक रच देंगे। लेकिन यह जीवन बातें कर लेना जैसा आसान होता नहीं है। यह पर्याप्त क्रूर और निर्मम है। यह जीवन बड़ी-बड़ी प्रतिभाओं को घूँट-घूँट कर करके पी जाता है, और तब आगामी पीढ़ियों के पास नागार्जुन की ये पंक्तियाँ बुदबुदाने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता कि ”जो नहीं हो सके पूर्ण काम, उनको प्रणाम।” लेखक सत्यनारायण अपनी सत्यनारायणीय गति से अनवरत काम करते रहे, जीवन के सुदीर्घ मार्ग में उन्होंने कहीं झपकी नहीं ली। जिस दुनिया के वह लेखक हैं, उस दुनिया को नींद नसीब नहीं तो उसके लेखक को कहाँ से नींद नसीब हो सकती है। उनकी एक किताब का नाम ही है—‘यहीं कहीं नींद थी’, गो कि ‘डासत ही गई बीति निसा सब, कबहुँ न नाथ नींद भरि सोयो।’ यही वजह है कि वह इतना रच सके कि हिंदी साहित्य की धरोहर में सचमुच कुछ सारगर्भित जोड़ सके। अपनी भाषा के ऋण से उऋण होने के लिए कुछ कर सके।

न उनका घर बड़ा, न उनके संपर्क बड़े। उनकी एक मात्र पूँजी शब्द ही थे। अपनी पहली ही किताब में ज्याँ पाॅल सार्त्र के इस उद्धरण को उन्होंने एक आत्मकथ्य की तरह दर्ज किया है, ‘‘मेरी सबसे बड़ी ज़रूरत थी कि मैं ख़ुद को बचा लूँ। मेरे पास कुछ भी नहीं था—न मेरे हाथ में, न मेरी जेब में। मेरे पास केवल मेरा विश्वास और मेरा काम भर था।’’

पिछले दिनों किसी काम से मुझे बाड़मेर जाना था। मैंने उन्हें फ़ोन पर बताया। बोले, ”आजा। सीधी रेल आती है।” इंदौर-जोधपुर इंटरसिटी ने मुझे साँझ ढले जोधपुर के नज़दीक पहुँचा दिया। राई का बाग़ में लेकिन रुक गई। जोधुपर जंक्शन पहुँचते-पहुँचते रात हो गई। वह स्कूटर लेकर लेने आ गए थे। उनका फ़ोन आया। बोले, ”स्टेशन के बाहर सड़क पर घोड़े पर तलवार लेकर आदमी जा रहा है। मैं इसके पीछे खड़ा हूँ।” मुझे ऐसा कोई आदमी नहीं दिखा। पर इस बीच उन्होंने मुझे देख लिया था। वह मेरे पास आ गए। और चौराहे का स्टेच्यू दिखाते हुए बोले कि ये आदमी नहीं दिखा तुम्हें घोड़े पर तलवार लिए…। उनकी ऐसे ही मज़ाक़ करने की आदत है। बात से बात याद आई कि कैसे वह हमें बातों में भुलाकर उल्लू पटा देते। एक बार जयपुर में प्रमोद उनकी किसी बात को चुपचाप सुनते हुए लगातार ‘हाँ-हाँ’ किए जा रहा था। डाॅक्टर साब बोले, ”कभी-कभी तुम्हें नहीं लगता प्रमोद कि मैं पागल हूँ?”

”हाँ।” प्रमोद ने उसी रौ में कहा। तो डाॅक्टर साब ने एक बार फिर पूछा, ”मैं पागल हूँ ना। नहीं?” प्रमोद को जब तक ये समझ आया कि डाॅक्टर साब उससे क्या कहलवा रहे हैं। उसने तुरंत ख़ुद को सुधारते हुए कहा, ”नहीं डाॅक्टर साब।” डाॅक्टर साब बोले, ”नहीं-नहीं, अभी-अभी तुम कह चुके हो।” फिर जो हँसी का फ़व्वारा चला तो दोनों देर तक उसमें भीगते रहे।

इस प्रमोद-प्रसंग का ज़िक्र इसलिए ख़ासतौर से किया कि डाॅक्टर साब के समूचे लेखन में हास्य का रेगिस्तान में पानी की तरह ही अभाव है। उनके ऐसे पाठक जिन्होंने उन्हें केवल पढ़ा है, उनसे कभी मिले नहीं, उन्हें देखा नहीं, उन्हें मालूम हो कि वह इंसान से मिलकर प्रसन्नता से भर जाने वाले विरल इंसानों में से एक हैं… और यही उनकी ज़िंदादिली है कि संताप को अपने भीतर सहेजकर भी बच्चों की तरह खिलखिला पड़ना। उन्हें कहीं ऐसी स्वच्छंद हँसी सुनने को मिल जाए तो वह उसकी तारीफ़ किए बिना नहीं रहते, ”अरे बावड़े या अरी बावड़ी, कैसे बचाकर रखी ये हँसी तूने।” सुखद अनुभवों की तारीफ़ में कहेंगे, ”देखो कैसा अनुपम संसार है।” दुखद अनुभवों पर अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहेंगे, ‘‘कैसा क्रूर संसार है।” कुल मिलाकर कहेंगे, ”एक किताब है यार ‘अनुपम और क्रूर संसार’ ज़रूर पढ़ना उसे।

उनका किराए का घर वैसा ही था—एक पुराने खंडहर को राजमिस्त्रियों के हाथों सुधरवा कर, साफ़-सुथरा करके रहने लायक़ कसवाया हुआ। बिल्ली थी और नीबू के पेड़ थे और टी.वी. के बजाय पाॅकिट ट्रांजिस्टर। भीतर दो कमरे जिनमें एक के दरवाज़े पर किवाड़ के दोनों पल्ले थे और एक के दरवाज़े पर किवाड़ का एक ही पल्ला लगा था। उनके लेखन से लगता है कि वह बड़े ऊटपटाँग तरीक़े से रहते होंगे। तवा यहाँ पड़ा होगा तो चिमटा कहीं और पड़ा होगा तो चूल्हा कहीं और। लेकिन देखा तो पाया वह बहुत सीमित चीज़ों के साथ रहते हैं, पर उन्हें बड़े क़रीने से बिल्कुल साफ़-सुथरा और व्यवस्थित रखते हैं। उनके रहने में मुझे अपरिग्रह दिखाई दिया। किसी को लग सकता है कि वह प्रोफ़ेसर हैं इतना कमाते हैं तो कहाँ जाता है पैसा, जबकि वह तो अकेले वैसे हैं। उन्हें नज़दीक से जानने वाले लोग जानते हैं कि गाँव से आज भी उनके पास दुख और अभावों की चिट्ठियाँ पहुँचती रहती हैं—भाइयों की, बहनों की, बहनों की, बेटियों की और जिस तरह से वह विद्यार्थियों और लोगों की मदद करते रहते हैं, उन्हें देखकर भोपाल के हिंदी कवि नवीन सागर की याद आती है और प्रेमचंद के ‘गोदान’ उपन्यास के मेहता की।

डाॅ. सत्यनारायण कम से कम राजस्थान में अपनी पीढ़ी के अकेले ऐसे लेखक है, जिन पर उनके चाहने वालों ने इतनी कविताएँ लिखी हैं और उन कवियों में विद्यार्थियों से लेकर समकालीन कविता के मज़बूत स्तंभ सवाई सिंह शेखावत जैसे कवि भी शामिल हैं, और इनसे कई गुना अधिक चाहने वाले वे लोग हैं जो उनके लिखे को कभी पढ़ तो नहीं पाते… लेकिन उनसे मिलने के बाद वे कभी उन्हें भूल नहीं पाते। जयपुर में फ़ुटपाथ के एक दाँतों के हकीम ने आज भी उनके लिखे रिपोर्ताज की कटिंग को फ़्रेम करवा कर रखी हुई है। नब्बे के दशक में वह धुँधला फ़्रेम जयपुर के फ़ुटपाथ पर आते-जाते दिख जाता था।

अगली सुबह वह मुझे बाड़मेर की बस में बिठाने आए। बस को जाने में अभी एक घंटा था। मैंने कहा, ”बस मिल गई, सीट मिल गई, टिकट मिल गया। अब आप धूप में खड़े मत रहिए, जाइए।” वह चौराहे के एक सघन छायादार घेर-घुमेर पेड़ को दिखाते हुए बोले, ”देखो कितना सुंदर पेड़ है और इस बहाने फिर बीसेक मिनट रुक गए।” मैंने फिर कहा कि अब आप जाइए। लेकिन उनका दिल गवाही नहीं देता था। उनका ऐसा जी जुड़ रहा था कि जब तक बस आँखों से ओझल नहीं हो गई, तब तक वह अकेले सूने खड़े हुए गर्दन हिलाते रहे, ”अब जाओ। ठीक है।”

जोधपुर से बाड़मेर की तरफ़ बढ़ते हुए बस की खिड़की से रेत के वीरान दृश्य दिखाई पड़ने लगे। जैसे-जैसे बस बाड़मेर की ओर बढ़ती गई रेत के धोरे बढ़ते गए। रेत के टीलों पर बसे कच्चे गोल घर। दूर-दूर तक रेत ही रेत। कहीं-कहीं कोई हरी कोंपल। मेरा मन डाॅ. सत्यनारायण के साथ की सघन याद से भरा था। बहुत सारी बातें एक-एक कर याद आती जा रही थीं। उनका लिखा हुआ, उनके बारे में लिखा हुआ और ‘तारीख़ की खंजड़ी’ तो मेरे हाथ में ही थी।

बस एक ख़ास रफ़्तार से चल रही थी। रेगिस्तान से मेरी नज़र नहीं हट रही थी और मेरे मन में बात आई कि यह महज़ संयोग नहीं है कि डाॅ.साब के दो समकालीनों ने उनके स्वभाव में बच्चों जैसी निश्छलता को दर्ज किया। रघुनंदन त्रिवेदी ने अभी यह ‘धरती’ के फ्लैप पर लिखा है, ”अपनी लगभग सफ़ेद हो चुकी दाढ़ी के बावजूद वह बच्चे की तरह मासूम दिखाई देता है…।” और यही बात रमेश उपाध्याय ने भी लिखी, ”अब, सत्यनारायण इतने प्यारे इंसान हैं और उनकी बच्चों जैसी हँसी सामने वाले को कुछ इस तरह निरस्त्र कर देती है कि वह उनसे बहस नहीं कर सकता।’’ अपने व्यक्तित्व की इसी ख़ासियत के कारण जैसा कि कवि विनोद पदरज उनके बारे में कहते हैं, ”वे अजातशत्रु हैं। उनका कोई शत्रु नहीं है।”

अख़बारों, गोष्ठियों, सेमिनारों के बजाय उनकी लोकप्रियता उसी लोक-जीवन में है जिसके वह लेखक हैं। वहीं उन्हें अपने जीवन में एकाध कदम साथ देने वाले लोग मिलते हैं। या ऐसे कुछ लोग जिन पर उन्हें कुछ विश्वास जागता है। लेकिन वह कभी इस विश्वास की परीक्षा नहीं लेते, इसे जाँचकर नहीं देखते। उन्हें बराबर एक डर लगा रहता है कि कहीं परखने की प्रक्रिया में विश्वास टूट गया तो। इसलिए वह अपने कष्टों में किसी के साथ से डरते हैं और अकेले ही दुख उठाते रहते हैं। उनकी ज़बान पर रचे-बसे, उनके जीवनानुभवों से सृजित और लगभग स्थिर हो चुके मुहावरों में से एक है—भरम बनाए रखना। वह जब-तब कहते हैं, ”भरम बना रहता है, भरम बनाए रखो, भरम बना रहना चाहिए, भरम टूटना नहीं चाहिए।” ऐसा शायद इसलिए है कि वह जानते हैं भरम टूट गया तो बाहर तो कुछ नहीं, लेकिन उनके भीतर ही कुछ और टूट जाएगा जो भरम के कारण अभी साबुत बचा-सा लगता है।”

बस की खिड़की से लगातार दिख रहे अछोर मरुस्थल को देखते हुए मन में यूँ ही एक ख़याल आया कि छोरी, माँ, रोटी, बेरोज़गारी, रेत, अकाल, पलायन, अकेलापन और भरम सत्यनारायण के जीवन और लेखन के बीज शब्द हैं।

समुद्र में उठनेवाली भयावह वेगवान लहरों की तरह ‘छोरी’ शब्द उनके जीवन और लेखन में अनवरत आता है। चाहे वह कुछ भी लिखें—कहानी, रिपोर्ताज, डायरी, कविता कुछ भी, और चाहे वह जीवन के किसी भी पल में हों, धरती पर कहीं भी हों इस शब्द से उन्हें छुटकारा नहीं। गो कि समुद्र कभी थिर नहीं हो सकता, वेगवान लहरों से रहित नहीं हो सकता। उनके कई चरित्र ऐसे हैं कि कोई एक छोटी-सी बात के सहारे पूरा जीवन काट लेते हैं। जैसे वह ख़ुद ‘छोरी’ नाम की पतवार के सहारे संसार के इस समुद्र में जीवन की नाव खे रहे हैं।

कैलाश मनहर ने लिखा है, ”उसकी आँखों में चमकती उदासी के सामने हज़ारों-हज़ार ख़ुशियाँ क़ुर्बान कर देने का मन होता है।” मैं अभी-अभी उनसे बिछुड़कर लौटते हुए सोच रहा हूँ कि यह उदासी क्या है? अंत में यह अकेलापन क्या है? क्या यह जाँ निसार अख़्तर की-सी जिज्ञासा है, ”ऐ दिले-नादाँ आरजू क्या है, जुस्तजू क्या है, हम भटकते हैं, क्यों भटकते है, दश्त-ओ-सहरा में, ऐसा लगता है, मौज प्यासी है, अपने दरिया में, कैसी उलझन है, क्यूँ ये उलझन है, एक साया-सा, रूबरू क्या है।” वही रघुजी कि बात याद आती है, ”स्मृतियों में बसी एक लड़की है जिसे ‘उर्मि’ नाम दिया है सत्यनारायण ने। सत्यनारायण की यह उर्मि जीवनानंददास की वनलता सेन की तरह रहस्यमय है। …जब वह नाम लिए बिना ‘उर्मि’ के बारे में बताता है, तब ‘उर्मि’ अतिमानवीय हो जाती है और मैं हैरान-सा सत्यनारायण का चेहरा देखता रह जाता हूँ।”

ज़िंदगी जैसे,
खोई-खोई है,
हैराँ-हैराँ है
ये ज़मीं चुप है
आसमाँ चुप है
फिर ये धड़कन-सी
चारसू क्या है
ऐ दिले-नादाँ
ऐ दिले-नादाँ…।

इस सवाल का जवाब ढूँढ़ने के लिए एक बार फिर ‘तारीख़ की खंजड़ी’ उलटता-पलटता हूँ। डायरी में दर्ज फ़्रांत्स काफ़्का के इस उद्धरण पर निगाह टिक जाती है, ‘‘ऐसा कहीं कोई नहीं, जो मुझे पूरी तरह अंडरस्टैंड कर सके। ऐसी कोई होती, जो मुझे समझ पाती तो उसका मतलब होता, पाँव जमाकर खड़े होना। उसका मतलब होता—एक ईश्वर को पा लेना।’’

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