कहानी यहाँ से शुरू होती है

‘‘सलाम करके गुज़रता था जिस मज़ार को मैं’’

उसने काग़ज़ पर ये मिसरा लिखा और शाइर का नाम सोचने लगा।

कुछ देर बाद उसने ये वाक्य : ‘‘अंत ही आरंभ है…’’ लिखा और काट दिया। फिर एक लंबी बुत-नुमाई के बाद कुफ़्र टूटा ख़ुदा-ख़ुदा करके… उसने कहानी की शुरुआत इस तरह की—

एक बादशाह था उसने बचपन से ही दीनी तालीम हासिल की। उसे फ़ुज़ूल मज़हबी रस्मो-रिवाज से चिढ़ थी। एक दिन उसने तमाम मज़ारों को तोड़ने का इरादा किया। बादशाह के आलिम दरबारियों ने क़ुरानो-हदीस के हवाले दे-देकर साबित किया कि ये शहीदों की मज़ारें हैं और शहीद चूँकि ज़िंदा होते हैं, उन्हें अल्लाह ता’ला से रिज़्क़ पहुँचता है, इसलिए मज़ारों का तोड़ना गुनाहे-अज़ीम में शामिल होगा। बादशाह ने कुछ देर की चुप्पी के बाद एक इस्लामी दलील पेश करके आलिमे-दीन हज़रात का मुँह बंद करा दिया और वह दलील ये थी :

‘‘इस्लाम के मुताबिक़ अगर कोई शख़्स ज़िंदा है और मुसलमान भी है, चाहे वो दुश्मन ही क्यों न हो तो ज़ियादा से ज़ियादा तीन मर्तबा सलाम करने पर जवाब फ़र्ज़ हो जाता है। सो बात साफ़ हुई अगर ये हज़रात ज़िंदा हैं तो सलाम का जवाब भी देंगे अगर नहीं देते तो मज़ार तोड़ दी जाए…’’

कहा जाता है कि बादशाह एक मज़ार-तोड़क दस्ते को साथ लेकर ख़ुद कई मज़ारों पर गया। उसने हर-एक की ख़िदमत में तीन-तीन मुकम्मल सलाम यानी ‘‘अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाह वबरकातुहू’’ पेश किए। उसे कहीं से भी सलाम का जवाब नहीं मिला और उसने सभी मज़ारों को सिलसिलेवार मिस्मार करवा दिया। आख़िर में वो एक बहुत मशहूर औलिया की मज़ार पर गया। वहाँ से भी सलाम का जवाब न मिलने पर, ज्यों ही मज़ार-तोड़क दस्ता अपने फ़न का मुज़ाहिरा करने आगे बढ़ा था कि बादशाह का नाम लेकर एक गरजती-सी आवाज़ फ़िज़ा में गूँजी—

‘‘अपनी ख़ैरीयत चाहते हो तो यहीं से वापस मुड़ जाओ। बेवक़ूफ़, मैं नमाज़ पढ़ रहा था इसलिए जवाब देने में देरी हुई…।’’

बादशाह घबराकर वापस मुड़ गया। इस तरह वो मज़ार बच गई और अब भी सही-सलामत बल्कि आलीशान है।

लेकिन मेरी कहानी उस बादशाह या उस मज़ार के बारे में थोड़ी है…?

उसने देखा कि पन्ना भर चुका है काटने का कोई फ़ायदा नहीं। अतः उसने पूरा पन्ना ही फाड़कर उसे अच्छी तरह मोड़ा और गेंद की तरह एक कोने में उछाल दिया। उसने आँखें बंद कीं और कुर्सी पर पसरकर सोचने लगा।

कुछ देर बाद ट्यूबलाइट की तरह मिचमिचाकर उसकी आँखें रौशन हुईं और उसने लपक कर क़लम उठाया—

मैं देख रहा हूँ। पूरी दिल्ली में मेट्रो का जाल बिछाने के दरमियान कहीं भी सरकार को इतनी दुश्वारी पेश नहीं आई जितनी इस पाँच सौ मीटर के दायरे में पेश आई है। इस पाँच सौ मीटर के दायरे के लोगों को सरकार कुछ किलोमीटर की दूरी पर अच्छा मकान दे रही है, लेकिन ये लोग जान दे देंगे; ज़मीन नहीं देंगे की ज़िद पकड़े हुए हैं। पिछले कई बरस से इस पाँच सौ मीटर के इधर और उधर बन चुके मेट्रो पिलर एक दूसरे को हसरत भरी निगाहों से देख रहे हैं। धरना-प्रदर्शन कोर्ट-कचहरी की लम्बी प्रक्रिया के बाद आख़िर तय पाया गया है कि बहुत ज़रूरी लगभग डेढ़ सौ मकानों को तोड़कर उसके बदले विकास प्राधिकरण की ख़ाली पड़ी पार्क की ज़मीनों में फ़्लैट बनाकर इन बेघरों को घर दिया जाएगा। समस्या अपने समाधान की तरफ़ रवाना हुई ही थी कि नई समस्या खड़ी हो गई वो ख़ाली पड़ी ज़मीनें जहाँ फ़्लैट बनने हैं, वहाँ एक छोटा-सा मज़ार भी है—उसका क्या करें? कई समुदाय के लोग पक्ष-विपक्ष में खड़े हो गए हैं। एक तरफ़ सार्वजनिक हित में कई धार्मिक स्थलों को तोड़ने या दूसरी जगह शिफ़्ट करने की दलीलें पेश की जा रही हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ धार्मिक आस्था का सवाल खड़ा करके निर्माण के रास्ते की दिशा बदलने की माँग हो रही है। मुआमला दोबारा कोर्ट के दरवाज़े पर पहुँच चुका है। कोर्ट ने कई महीनों की माथा-पच्ची के बाद अपना निर्णय सुना दिया है।

फ़्लैट बन गए हैं। डेढ़ सौ मकान टूट गए मेट्रो पिलर बनने का काम शुरू हो गया है। मगर मज़ार अपनी जगह पर अब भी क़ायम है, फ़्लैटों और मेट्रो पिलर ने अपनी-अपनी दिशा में परिवर्तन कर लिया है। मैं देख रहा हूँ…

इतना लिखने के बाद उसने सोचा कि इस ओर देखना ठीक नहीं और फिर उसने काग़ज़ की गेंद हवा में उछाल दी—और कुर्सी से उठकर कमरे में टहलने लगा। कुछ देर की चहल-क़दमी के बाद वो वापस बैठा और अगला पेज काला करने लगा।

दिल्ली शहर में साठ-सत्तर के दशक में भारत के ग्रामीण इलाक़ों से रोज़गार की तलाश में आए लोगों ने रेलवे लाइन, सड़क, नदी-नालों के किनारे टीन-टप्पर डालकर अपना आशियाना बना लिया। जिसे यहाँ की भाषा में झुग्गी कहा गया। इन मेहनतकशों ने अपनी मेहनतकशी के बूते बिजली विभाग, जलबोर्ड, रेलवे समेत तमाम सरकारी, ग़ैर-सरकारी संस्थानों में अपनी ऐसी जगह बना ली कि अगर किसी दिन ये एक साथ काम पर जाने से इनकार कर दें तो पूरी व्यवस्था फ़ौरन सुपरफ़ास्ट रेलगाड़ी से बैलगाड़ी में परिवर्तित हो जाए। ये कीड़े-मकोड़ों की तरह जीवन-यापन करते लोग बहुत ही आवश्यक लोग थे। इनके रहने और न रहने दोनों से सरकार को समस्याएँ उत्पन्न होने लगीं, इसलिए सरकार ने फ़ैसला किया कि इनके रहने की ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे न इन्हें समस्या हो न हमें अतः इसी परिकल्पना से परियोजना बनी और उसी परियोजना के तहत दिल्ली में पुनर्वास कॉलोनियाँ बनीं। उन पुनर्वास कॉलोनियाँ की उपाधि है—‘‘पुरी’’। दिल्ली में अधिकतर पुरी का संबंध उन्हीं पुनर्वास कॉलोनियाँ से हैं। इन सब घटनाओं को एक युग बीत गया, किंतु आज भी यहाँ के कुछ बुज़ुर्ग निवासी वोट फ़लाने गांधी को ही देते हैं, उनका तर्क ये है कि फ़लाने गांधी ने ही हमारे सिरों पर दो हाथ छत दी है।

मेरी कहानी इसी पुनर्वास कॉलोनी की है, लेकिन वो इस प्रकार नहीं लिखी जानी चाहिए। हटा यार… मैं भी कहाँ फ़लाने गांधी की बात बीच में उठा लाया, कहकर उसने एक बार फिर काग़ज़ का कचूमर निकाल दिया और अगले पन्ने पर क़लम दौड़ा दी।

कल हमारे बचपन के मित्र लछमन दूबे से उम्र के पचपनवें पड़ाव पर भेंट हुई, वो तो हमें पहिचान न पाए पर हमीं कुछ-कुछ पहिचान के परनाम किए। कुशलछेम पूछने पर पहिले तो वो बहुत देर तक हमारा मुँह ताके फिर पहिचानते ही कोंहड़ा के फूल जइसा मुँह बनाके बोले—

‘‘अरे जमशेद…? अल्हम्दुलिल्ला सब बढ़िया कहाँ रहे एतना बरिस… बड़ा जमाने बाद… बुढ़ा गए आंय?’’
हमने सोचा हर क्षण गंगा जल हाथ में लिए राम-राम जपने वाले पंडित जी आज अल्हम्दुलिल्ला पर कइसे आ गए। फिर हम सोचे कि यही तो हिंदुस्तान है, हम राम-राम कहकर मित्र को इज्जत बखसें अउर ऊ अल्ला का नाम लेकर हमारा मान रखें! इससे आपसी प्रेम बढ़ता है।

लेकिन पंडित जी तो गलती से भी अगर अजान कान में पड़ जाए तो गंगाजल से कान धोकर सुद्धिकरन जाप करने वाले आदमी थे। फिर ई चमत्कार कइसे?

कुछ देर की बतकही के बाद माजरा समझ में आया कि कइसे अउलाद पाने के लिए उन्होंने टोना-टोटका दवा-दारू तंत्र-मंत्र माने कि छत्तीसों उपाय किए। लेकिन अउलाद मिली बाबा अम्बर साह की मनउती से। कहिन कि हे बाबा अगर ई बाभन को संतान मिल जाए तो जब तक जिऊँगा हर जुमेरात आपके इहाँ अगरबत्ती जलाने आऊँगा, बस फिर क्या था मनउती मानते ही पत्थर पर दूब जम गई। पंडित जी के इहाँ बुढ़उती में बेटा हो गया। पंडित जी ने उसका नाम बाबा के ही नाम पर अम्बर अली रक्खा है।

लो… मैं भी कहाँ अब पंडित जी की पोथी बाँचने बैठ गया। उसने इस पन्ने को भी फाड़कर उसी स्थान पर पहुँचाया जहाँ पहले वाले पहुँचे थे। उसने इस बार लिखने के बजाय सिलसिलेवार सोचने पर अधिक ध्यान दिया तो कल्पना के चित्रपट पर चलचित्र से उभर आए।

उसकी कल्पना के केंद्र में थी बाबा अम्बर शाह की वो प्रसिद्ध मज़ार जो कि झुग्गी से पुनर्वास कॉलोनी बसने के बाद स्थापित हुई थी और आगे भी स्थापित रहने वाली थी क्योंकि लोगों को अब और अधिक यक़ीन हो गया था कि जिस तरह अल्लाह ता’ला ने अबाबीलों का झुंड भेजकर मक्का को अबरहा के हाथों मिस्मार होने से बचाया था उसी तरह बाबा अम्बर शाह ने कोर्ट का फ़ैसला अपने हक़ में करवाकर अपनी मज़ार को टूटने से बचा लिया है। तभी तो मेट्रो की चपेट में आकर सैकड़ों घर टूटे, लेकिन मज़ार ज्यों की त्यों सलामत है। न सिर्फ़ सलामत है बल्कि लछमन दूबे जैसे संतानहीन लोगों को संतानसुख भी प्रदान कर रही है। ये और बात है कि कुछ संगठनों के आँख की किरकिरी भी है ये मज़ार।

ख़ैर, वो संगठन भी कम दोषी नहीं हैं। देखा जाए तो उन्हीं संगठनों में से एक संगठन ही इस मज़ार के जन्म का कारण भी है।

अभी कितने? मुश्किल से तीस-पैंतीस बरस हुए होंगे जब कॉलोनी में सीवर डालने का काम शुरू हुआ था और इसी काम के दौरान ज़मीन दरकने से चार मज़दूर दब गए थे। प्रशासन और स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें निकाल तो लिया गया, लेकिन अस्पताल तक जाते-जाते दो मज़दूरों की मृत्यु हो गई थी।

इस हादसे के बाद काफ़ी समय तक काम रुका रहा और जब काम दुबारा शुरू हुआ तो ठेकेदार ने कुछ धार्मिक लोगों से सलाह ली कि इस काम को शुरू करने से पहले क्या करना उचित होगा? या ये काम आगे बढ़ाना भी चाहिए अथवा मुझे इस काम से दस्तबरदार हो जाना चाहिए।

कई सारे सुझावों के बाद ये तय पाया गया कि उन मृतक मज़दूरों के नाम से पाँच-पाँच ईंटें यानी कुल दस ईंटें निकालकर कहीं ख़ाली पड़ी ज़मीन में रख दी जाएँ और ऊपर वाले का नाम लेकर काम शुरू कर दिया जाए।

ठेकेदार ने ऐसा ही किया और ऊपर वाले की कृपा से या उन दस ईंटों के प्रताप से काम में पुनः कोई बाधा उत्पन्न नहीं हुई, बल्कि आगे के सभी कार्य द्रुत गति से संपन्न हो गए और समय से पहले ही कॉलोनी के निवासियों को सीवर की सुविधा उपलब्ध हो गई।

इस अवधि में उधर ख़ाली स्थान में पड़ी दसों ईंटों से जड़ें निकलनी शुरू हो गईं और वो जड़ें क़िस्से-कहानियों की शक्ल में दूर-दूर तक फैलने लगीं।

एक-दो मज़दूर परिवार जो निर्माण-कार्य के दौरान वहीं अस्थाई तौर पर टीन-टप्पर घेकर रहते थे। उनमें से एक ने बताया कि रात में वो दोनों मृतक मज़दूर उसके सपने में आते हैं और दोनों गले मिलते हुए एक दाढ़ी वाले बुज़ुर्ग दरवेश बन जाते हैं। दूसरे ने बताया कि ऐसा ही सपना उसे भी आता है। उसने टुकड़ा जोड़ा कि बाबा उसके सर पर हाथ फेरते हुए उसे हुक्म देते हैं कि वो काम ख़त्म होते ही गाँव से अपने बीवी-बच्चों को बुला लाए और यहीं रहे। उसकी रोज़ी-रोटी अब यहीं लिखी है। इसी तरह रफ़्ता-रफ़्ता बाबा बहुत से अन्य मज़दूरों के सपनों में भी आए और वो मज़दूर परिवार टीन-टप्पर से अपना आशियाना बनाते-बनाते एक घनी बस्ती में परिवर्तित हो गए।

बाबा जिस-जिसके सपने में आए वो उसी बस्ती का बाशिंदा हो गया। उन दस की दस ईंटों को लोग अक़ीदत से देखने लगे, बाबा के करम से सब बढ़िया ही तो था; लेकिन अभी कुछ ही बरस बीते थे कि सरकारी बुलडोज़र ने उस बस्ती को अवैध कहकर उजाड़ दिया, हालाँकि इस अवैध क़ब्ज़े के बदले उन्हें सरकार की तरफ़ से रहने के लिए प्लॉट एलॉट किए गए। जिसे सबने ‘बाबा की मेहर’ का नाम दिया।

जहाँ उन मज़दूरों की टीन-टप्पर की बस्ती उजाड़ी गई थी, वहाँ कॉलोनी के लिए एक सामूहिक शौचालय बना दिया गया। कमाल ये है कॉलोनी वालों को भी अब एहसास हो गया था कि बाबा के करम ही से उनकी दैनिक और सबसे बड़ी समस्या का इतना सरल निदान हो गया था।

ईंटें अपनी जगह पड़ी मुस्कुरा रही थीं, लेकिन जल्द ही उनकी मुस्कराहट में दूसरे समुदाय के कुछ लोगों ने ख़लल डाल दिया। हुआ यूँ कि एक रोज़ सुबह-सुबह कुछ कच्छाधारी लोग आए और उस ख़ाली स्थान की सफ़ाई करने लगे। सफ़ाई के दौरान जब उन्होंने ईंटों को हटाना चाहा तो बात बिगड़ गई, केवल बिगड़ ही नहीं बढ़ भी गई और बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक बढ़ी कि दो गुटों में ख़ूनी संघर्ष छिड़ गया। कइयों के हाथ-पाँव टूटे, कइयों के सिर फूटे, कइयों की तो जान जाते-जाते बची।

इस घटना के उपरांत अंततः पुलिस के हस्तक्षेप और गणमान्य लोगों के मशवरे के बाद ये प्रस्ताव पारित हुआ कि चूँकि उन दसों ईंटों से लोगों के एक गुट की आस्था जुड़ी हुई है सो आस्थावान गुट चंदा इकट्ठा करके कृपया उन ईंटों वाले एरिए का घेराव कर ले, ताकि भविष्य में होने वाले किसी भी तरह के विवाद की आशंका को हाथ के हाथ समाप्त कर लिया जाए और दूसरे गुट के लोगों को उनकी गतिविधियों के लिए दूसरे स्थान को चुनने का आग्रह किया गया। ख़ैर, कुछ ना-नुकुर के बाद दोनों गुटों में समझौता हो ही गया।

आस्थावान गुट ने इसे भी बाबा का आदेश समझा। उन्हें यक़ीन था कि बाबा ने स्थान ग्रहण करने के लिए ही ये सारा खेल रचा है। इस यक़ीन को पुख़्ता किया उस मज़दूर के सपने ने जिसे बाबा से संबंधित सपना पहली बार आया था और जो बस्ती उजड़ने के बाद सरकार द्वारा आवंटित प्लॉट में घर बनाकर रहने लगा था। उस मज़दूर ने बताया कि बाबा सपने में आए और उससे बहुत नाराज़ दिखे। उस मज़दूर के मुताबिक़ जो कुछ बाबा ने सपने में कहा वो इस प्रकार था—

‘‘मैं अम्बर शाह बरसों से खुले आसमान के नीचे पड़ा हुआ हूँ और तुम यहाँ हो जबकि मैंने तुमसे कहा था कि तुम मेरे पास रहना…’’

कुल मिलाकर उस मज़दूर के सपने से बाबा के नाम की मालूमात हो गई थी और आगे क्या करना है—इसका इशारा भी मिल चुका था। कॉलोनी वालों ने ‘ईंटों की मज़ार’ बनाई और उसकी देख-रेख का ज़िम्मा उस मज़दूर ने अपने हाथों में ले लिया। कालांतर में यह मज़ार ‘ईंटों की मज़ार’ या ‘बाबा अम्बरशाह की मज़ार’ के नाम से प्रसिद्ध हो गई।

उसकी कल्पना के चित्रपट पर फ़िल्म समाप्त हुई तो उसने आँखें खोलीं और अनायास ही शकील ग्वालियरी साहब का शे’र बुदबुदाया—

सलाम करके गुज़रता था जिस मज़ार को मैं
पता चला कि किसी ने ज़मीन घेरी है

शे’र बुदबुदाने के बाद उसने क़लम उठाई और बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहानी की शुरुआत की—

‘‘कहानी यहाँ से शुरू होती है…’’

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