दुनिया के बंद दरवाज़ों को शब्दों से खोलता साहित्यकार

हर बार जब आरा पहुँचता था, तो रामनिहाल गुंजन जी से ज़रूर मिलता था। इस बार 10 अप्रैल को पहुँचने के बाद उन्हें फ़ोन किया, तो उन्होंने बताया कि घर में कुछ काम लगा रखा है। मुझे लगा कि छत पर कोई कमरा बनवा रहे होंगे। मैंने कहा कि एक-दो दिन में आऊँगा। 13 अप्रैल को उनके घर पहुँचा, तो पता चला कि उन्होंने छत के आधे हिस्से में मज़बूत टीन की चादरों से एक हॉल बनवा दिया है। उन्होंने बताया कि यहीं गोष्ठियाँ आदि होंगी। यह जनसाहित्य और जनसंस्कृति से संबंधित विचार-विमर्श और प्रकाशन का केंद्र होगा। उन्होंने यह भी कहा कि आपको मैंने इसका परामर्शी बनाया है। यह कहते हुए कि इसका नाम विचार-प्रकाशन होगा, अचानक वह रुके और कहा कि कोई दूसरा नाम भी दे सकते हैं। मैंने कहा कि विचार प्रकाशन के नाम से ही आप अपनी पुस्तकें छापते रहे हैं। यही नाम ठीक है।

इसके बाद उन्होंने शहर के एक साहित्यकार और शिक्षक की चर्चा करते हुए कहा कि उनसे मेरे बहुत अच्छे संबंध हैं। वह मुझे बहुत मानते हैं। वह मेरी किताबों का एक सेट ले लेंगे तो एक स्टैंड फ़ैन और कुछ कुर्सियों का इंतज़ाम हो जाएगा। मुझे झटका-सा लगा, पर तुरत उनकी ख़ुद्दारी और जीवटता पर फ़ख़्र भी हुआ। मैंने उनसे कहा कि वह अपनी पुस्तकों का नाम, उसकी क़ीमत और पूरा सेट लेने पर ग्राहक को कितना कमीशन मिलेगा—यह लिखकर दे दें, तो हम लोग सोशल मीडिया और अन्य तरीक़ों से लोगों तक उसकी सूचना पहुँचा देंगे। इधर एकाध बार उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या इलाहाबाद यूनिवर्सिटी या किसी अन्य विश्वविद्यालय में उनकी पुस्तकें सहयोगी पुस्तकों के रूप में लगाई जा सकती हैं?

बेशक छात्रों के लिए भी उनकी पुस्तकें बहुत उपयोगी थीं। एक किताब को पढ़ने का मतलब था, कई किताबों से जुड़ी सूचनाओं का मिल जाना। उसके बाद मैं कवि सिद्धार्थ वल्लभ के घर गया और हम साहित्य के प्रति उनके समर्पण और प्रतिबद्धता के बारे में बातचीत करते रहे। उनकी किताबें नए पाठकों तक कैसे पहुँचे, इसके बारे में हमने विचार किया और यह निर्णय किया कि वह जल्दी से पूरे सेट की पुस्तकों की सूची और कमीशन आदि के बारे में बता दें, तो उसे प्रचारित किया जाएगा। लेकिन महज़ दो दिन बाद ही वज्राघात की तरह सूचना आई कि गई 19 अप्रैल को सुबह पाँच बजे के लगभग वह नहीं रहे। कॉलेज की छुट्टियाँ ख़त्म होने वाली थीं। 18 अप्रैल की शाम को मैं जमशेदपुर पहुँचा था। गुंजन जी की बहुत इच्छा थी कि मुझे आरा में ही कोई काम मिल जाए। बार-बार वीर कुँवर सिंह यूनिवर्सिटी के अतिथि शिक्षक की बहाली के बारे में पूछते थे, जो पिछले कई साल से लंबित है। उसमें मानदेय कम था, पर मैंने वादा किया था, उसमें अगर हो गया तो आ जाऊँगा। लेकिन आज तक वह बहाली नहीं हुई। अब कभी आरा में नौकरी मौक़ा मिला भी तो क्या होगा? गुंजन जी तो साथ नहीं होंगे। क्या उन्होंने साहित्य को जिस तरह ओढ़ना-बिछौना बना रखा था, हम बना पाएँगे? शायद ही कोई दिन ऐसा रहा होगा, जिस दिन उन्होंने कुछ पढ़ा या लिखा न होगा। ऐसा अध्येता और ऐसा श्रमशील लेखक शायद ही कोई होगा?

हिंदी के वरिष्ठ आलोचक, कवि और संपादक रामनिहाल गुंजन इस साल नवंबर में 86 साल के हो जाते। उनका जन्म पटना ज़िले के भरतपुरा गाँव के एक कृषक परिवार में 9 नवंबर 1936 को हुआ था। रामनिहाल गुंजन के दादा आर्थिक कारणों से सपरिवार अपने ससुराल आरा आ गए थे और यहीं मालगुज़ारी पर ज़मीन लेकर खेती करने लगे थे। अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए रामनिहाल गुंजन बताते हैं, ‘‘पहले तो मैं पढ़ने से भागता था और अपने बचपन के दोस्त सादिक़ के साथ घूमा-फिरा करता था, लेकिन जब उसका भी स्कूल में नाम लिखवा दिया गया; तब मुझे भी मजबूरन पढ़ने जाना पड़ा।’’ 1950 में उनका दाख़िला आरा टाउन स्कूल में हुआ। यहीं उनमें हिंदी साहित्य के प्रति अभिरुचि जागृत हुई। स्कूल के बग़ल में ही बाल हिंदी पुस्तकालय था, जहाँ उन्हें पढ़ने के लिए पुस्तकें मिलीं। इसी दौरान उन्होंने साहित्य सृजन की शुरुआत की।

वर्ष 1961 में रामनिहाल गुंजन का विवाह हुआ और उसी साल उन्होंने आरा के दो स्कूलों में अध्यापन-कार्य आरंभ किया। उसी साल उन्हें शाहाबाद हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से ‘जैनेंद्र किशोर जैन : व्यक्तित्व और कृतित्व’ पर एक शोधपरक लेख के लिए प्रथम पुरस्कार मिला। उसके पूर्व उन्होंने प्रो. हरिमोहन झा द्वारा अनूदित कविताओं से प्रेरित होकर वैदिक कविताओं पर एक निबंध लिखा था। दो वर्षों तक अध्यापन के बाद वह रेलवे की नौकरी में धनबाद चले गए, लेकिन वह नौकरी उन्हें रास न आई। कुछ माह बाद ही वह इस्तीफ़ा देकर आरा समाहरणालय में क्लर्क की नौकरी करने आ गए। 1964 से 1976 तक वह आरा समाहरणालय की नौकरी में रहे, उसके बाद 1976 से सचिवालय की नौकरी में पटना चले गए; जहाँ वह 1998 तक कार्यरत रहे। पटना में वह कई लेखकों के संपर्क में आए। जब बिहार में नवजनवादी सांस्कृतिक मोर्चा नाम के एक नए साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठन का गठन हुआ, तो वह उससे जुड़े। आरा की नाट्य संस्था ‘युवानीति’ के तत्कालीन सचिव सुनील सरीन बताते हैं, ‘‘रामनिहाल गुंजन रविवार को या छुट्टियों के दिन ही मिल पाते थे। उनकी व्यस्तताओं के बावजूद हम यही कोशिश करते कि वह हमारी साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का एक अहम हिस्सा बनें। उनके बिना हमारी गोष्ठियाँ अधूरी लगतीं। …जब अरविंद जी के साथ मिलकर हम लोग बनारसी प्रसाद भोजपुरी जी की स्मृति में सम्मान-समारोह की योजनाएँ बनाया करते थे तो गुंजन जी उसमें बढ़-चढ़कर भूमिका निभाते थे।’’

गुंजन जी की पहली कविता 1955 में मासिक पत्रिका ‘नागरिक’ में छपी थी, जिसका शीर्षक ‘कवि’ था। ‘बच्चे जो कविता के बाहर हैं’ (1988), ‘इस संकट काल में’ (1999), ‘समयांतर तथा अन्य कविताएँ’ (2015) और ‘समय के शब्द’ (2018) शीर्षक से उनके चार कविता-संग्रह प्रकाशित हैं। ‘दिल्ली’ को संबोधित उनकी कविताओं का संग्रह भी शायद हाल ही में आया था या आने वाला था। हालाँकि उनकी प्रमुख पहचान आलोचक के रूप में ही रही।

उनकी पहली आलोचनात्मक पुस्तक ‘विश्व कविता की क्रांतिकारी विरासत’ भी 1988 में प्रकाशित हुई थी। ‘विश्व कविता की क्रांतिकारी विरासत’ के अतिरिक्त ‘हिंदी आलोचना और इतिहास दृष्टि’ (1988), ‘रचना और परंपरा’ (1989), ‘राहुल सांकृत्यायन : व्यक्ति और विचार’ (1995), ‘निराला : आत्मसंघर्ष और दृष्टि’ (1998), ‘शमशेर नागार्जुन मुक्तिबोध’ (1999), ‘प्रखर आलोचक रामविलास शर्मा ’ (2000), ‘हिंदी कविता का जनतंत्र’ (2012) ‘कविता और संस्कृति’ (2013), और ‘रामचंद्र शुक्ल और हिंदी नवजागरण’ (2018) शीर्षक से आलोचना की उनकी दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं।

‘आजकल’ के संपादक राकेश रेणु ने बताया कि हाल में उन्होंने फणीश्वरनाथ रेणु पर भी एक किताब का संपादन किया था, जिसके प्रूफ़ में बहुत गड़बड़ी थी, जिसके कारण उसे दूसरे प्रकाशन को दिया गया है। अभी उनके लगभग दो सौ आलोचनात्मक लेख अप्रकाशित या असंकलित हैं। पिछले कई दशक से हिंदी की सारी प्रतिष्ठित, अव्यावसायिक और वैकल्पिक पत्रिकाओं में इनके आलोचनात्मक लेख अनवरत प्रकाशित होते रहे हैं। उन्होंने हिंदी में संभवतः पहली बार अंतोनियो ग्राम्शी के लेखों का अनुवाद और संपादन किया था, जो ‘साहित्य, संस्कृति और विचारधारा’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। उन्होंने जॉर्ज थॉमसन की पुस्तक ‘मार्क्सिज्म एंड पोएट्री’ का अनुवाद और संपादन भी ‘मार्क्सवाद और कविता’ (1985) नाम से किया है।

गार्गी प्रकाशन के संचालक दिगंबर ने बताया कि इन दोनों किताबों को लोगों ने ख़ूब पसंद किया। गार्गी प्रकाशन से ही उनकी दो और पुस्तकें ‘राहुल सांकृत्यायन : व्यक्ति और विचार’ और ‘विश्व कविता की क्रांतिकारी विरासत’ भी फिर से प्रकाशित की गई हैं।

रामवृक्ष बेनीपुरी, आचार्य नलिन विलोचन शर्मा, यशपाल, रांगेय राघव, भीष्म साहनी, सुरेंद्र चौधरी और चंद्रभूषण तिवारी पर ‘नया मानदंड’ पत्रिका के सात महत्त्वपूर्ण अंकों तथा नागार्जुन, वेदनंदन सहाय, भगवती राकेश, रामेश्वर नाथ तिवारी और विजेंद्र अनिल के व्यक्तित्व और रचनाकर्म से संबंधित पुस्तकों का भी गुंजन जी ने संपादन किया। 1970 के आस-पास उन्होंने ‘विचार’ पत्रिका का संपादन और प्रकाशन भी किया था। उन्होंने भोजपुरी की रचनाओं पर भी भोजपुरी भाषा में आलोचनात्मक लेख लिखे और कविताओं का सृजन किया, जो अभी असंकलित हैं।

रामनिहाल गुंजन के लेखन की ओर हिंदी के बड़े प्रकाशकों का ध्यान नहीं गया। उनकी ज़्यादातर किताबें इलाहाबाद के प्रकाशनों से छपी हैं और कुछ पुस्तकें उन्होंने ख़ुद विचार प्रकाशन से प्रकाशित कीं। हिंदी के लघु पत्रिका आंदोलन या वैकल्पिक पत्रिका आंदोलन को उन्होंने अपनी ज़बरदस्त लेखकीय ऊर्जा प्रदान की। साल 1998 में सेवानिवृत्ति के बाद वह पूर्णकालिक तौर पर लेखन करने लगे। अपनी आख़िरी साँस तक वह साहित्य-सृजन में लगे रहे।

रामनिहाल गुंजन मानते हैं कि जब रचनाकार और आलोचक के बीच स्वस्थ संवाद अथवा तर्क-वितर्क होते हैं, तब रचना और आलोचना का सही विकास होता है। उनके अनुसार रचना और आलोचना दोनों में आलोचना-दृष्टि की प्रमुखता होती है। दोनों अपनी संरचना के लिए जीवन-स्थितियों, प्रसंगों, घटनाओं और जीवन के अनुभवों पर निर्भर होते हैं। बिना इनके न तो रचना लिखी जा सकती है और न आलोचना। वह रचनाकार और आलोचक दोनों के लिए सुसंगत इतिहास-दृष्टि को ज़रूरी समझते हैं और मानते हैं कि जब आलोचना ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से रहित होती है, तो कलावाद और रूपवाद का शिकार हो जाती है। प्रगतिशील-जनवादी-नवजनवादी साहित्यिक परंपरा और विरासत के प्रति इनमें गहरी आस्था है। आलोचना की उनकी तीसरी पुस्तक ‘रचना और परंपरा’ में संकलित सात लेख प्रगतिशील-जनवादी हिंदी कविता की वैचारिकी से संबंधित हैं।

मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओत्सेतुंग आदि राजनीतिक चिंतकों ने विचारधारात्मक स्तर पर समकालीन कृतियों और उनके लेखकों की जो आलोचनाएँ कीं, रामनिहाल गुंजन ने उनके महत्त्व को रेखांकित किया है। रैल्फ़ फ़ॉक्स, कॉडवेल, लूकाच, ब्रेष्ट, बेलिंस्की, लूनाचार्स्की, हर्जेन, लुशून, गोर्की के साथ-साथ हिंदी के आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, राहुल सांकृत्यायन, यशपाल, रांगेय राघव, प्रेमचंद, निराला, शमशेर, नागार्जुन, अमृत राय, भीष्म साहनी, मार्कण्डेय, विष्णुचंद्र शर्मा जैसे लेखकों-आलोचकों का नाम भी वे गिनाते हैं, जिन्होंने आलोचना की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने शिवदान सिंह चौहान, प्रकाशचंद्र गुप्त, नामवर सिंह, मलयज, ओमप्रकाश ग्रेवाल, शिवकुमार मिश्र, कुँवरपाल सिंह, विजेंद्र नारायण सिंह और कुमार विमल आदि की आलोचना पर भी लेख लिखे हैं।

कथा-आलोचना से संबंधित रामनिहाल गुंजन की कोई स्वतंत्र पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई। राहुल सांकृत्यायन, निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध, विजेंद्र अनिल पर केंद्रित उनकी पुस्तकों में उनकी कहानियों और उपन्यासों पर लेख ज़रूर संकलित हैं। इनके अतिरिक्त उन्होंने माधवराव सप्रे, प्रेमचंद, जैनेंद्र, यशपाल, रेणु, रांगेय राघव, सत्यजीत रे, अमरकांत, इसराइल, स्वयं प्रकाश, अनिल सिन्हा, कमर मेवाड़ी की कहानियों और उपन्यासों पर कई लेख लिखे, जो हिंदी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। कथा-आलोचना पर भी उनकी पुस्तक प्रकाशित होने वाली थीं।

रामनिहाल गुंजन विश्व कविता की क्रांतिकारी विरासत को हिंदी आलोचना में दर्ज करने वाले आलोचक थे। उनकी काव्यालोचना का दायरा छायावाद की कविता से लेकर जनवादी-नवजनवादी कविता आंदोलन तक का है, हालाँकि उनकी आलोचना-दृष्टि मुख्यतः प्रगतिशील-जनवादी-नवजनवादी कविताओं की वैचारिकी के निरूपण पर ही ज़्यादा केंद्रित रही। वह निराला से लेकर नागार्जुन, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, धूमिल, कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह आदि कवियों की कविताओं में प्रगतिशील दृष्टिकोण को एक विकासमान प्रवृत्ति के तौर पर चिह्नित करते थे। आपातकाल के दौर में जो सत्ता-विरोधी कविताएँ लिखी गईं, उनमें सबको रामनिहाल गुंजन क्रांतिकारी मानने के पक्ष में नहीं थे। उस दौर के कवियों में धूमिल के साथ-साथ विजेंद्र, विष्णुचंद्र शर्मा, आलोकधन्वा, मनमोहन, रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह, वेणु गोपाल, लीलाधर जगूड़ी, पंकज सिंह, कुमार विकल, शलभ श्रीराम सिंह, ऋतुराज आदि की चर्चा उन्होंने अपने लेखों में की है या उन पर लेख लिखे हैं। रामनिहाल गुंजन ने दिनकर, पंत, पाब्लो नेरूदा, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, शील, गोपाल सिंह नेपाली, कैफ़ी आज़मी, राही मासूम रज़ा, रमाकांत द्विवेदी रमता, गोरख पांडेय, दुष्यंत कुमार, विजेंद्र अनिल, सोमदत्त, कुबेर दत्त, कुमार अम्बुज, अदम गोंडवी, कात्यायनी, महेंद्र नेह, रमाशंकर विद्रोही समेत कई प्रगतिशील-जनवादी और क्रांतिकारी कवियों, शाइरों और जनकवियों पर आलोचनात्मक लेख लिखे। उन्होंने नागार्जुन पर सर्वाधिक लिखा। बेनीपुरी की कविताओं की चर्चा कम होती है, लेकिन उनकी कविताओं में व्यक्त क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी विचारों के कारण रामनिहाल गुंजन ने उनकी कविताओं पर लेख लिखना ज़रूरी समझा। ‘पुष्प की अभिलाषा’ कविता के लिए मशहूर माखनलाल चतुर्वेदी उन्हें इसलिए पसंद आते थे कि गांधी जी से प्रभावित होने के बावजूद उन्होंने भगत सिंह और यतींद्र दास जैसे क्रांतिकारियों के ख़िलाफ़ गांधी जी के वक्तव्य को ‘कर्मवीर’ में छापने से इंकार कर दिया था।

एक आलोचक के तौर पर रामनिहाल गुंजन व्यर्थ का वितंडा खड़ा करने में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करते थे। लेकिन कोई साहित्यकार कितना भी महान क्यों न हो, अगर उनकी रचना में कोई वैचारिक कमज़ोरी नज़र आती थी, तो वह उस पर बेहिचक सवाल खड़ा करते थे। जैसे तुलसीदास, रामचंद्र शुक्ल के प्रिय कवि हैं और आचार्य रामचंद्र शुक्ल को रामनिहाल गुंजन बहुत ज्यादा महत्त्व देते थे, फिर भी गुंजन जी यह मानते थे कि तुलसीदास के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल कई असंगतियों के शिकार हुए हैं। वह रामविलास शर्मा द्वारा मुक्तिबोध को अस्तित्ववादी कहे जाने को उचित नहीं मानते थे।

रामनिहाल गुंजन ने व्यक्तिगत प्रयासों या ग़ैर-व्यावसायिक उद्देश्यों से प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं और पुस्तकों का ही संपादन किया। एक संपादक के तौर पर उनकी चयन-दृष्टि उदार और व्यापक थी। वह उन रचनाकारों के प्रति भी संवेदित रहे, जो वामपंथी नहीं थे, पर दुनिया को बेहतर बनाने की उनकी मंशा थी।

रामनिहाल गुंजन की कविताएँ जनपक्षधर कविताएँ हैं। उनकी कविताओं में अँधेरे के विरुद्ध उजाले के संघर्ष का प्रसंग कई बार आता है। उनकी कविता में साधारण जन, मेहनतकश वर्ग और उपेक्षित-वंचित लोगों को जगह मिलती है या उनके जीवन को बेहतर बनाने वाले संघर्षशील लोगों और साहित्यकारों को। उन्होंने सुकांत, निराला, मुक्तिबोध, शमशेर, धूमिल, नवारुण भट्टाचार्य, गोरख पांडेय जैसे क्रांतिकारी कवियों तथा प्रसिद्ध आलोचक रामचंद्र शुक्ल और व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई पर भी कविताएँ लिखीं। उनकी कविताएँ स्त्री-मुक्ति और दलित-मुक्ति से जुड़े प्रसंगों को भी उठाती हैं। अस्सी के दशक में उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर पर कविता लिखी और उन्हें बुद्ध और कबीर की परंपरा से जोड़ा। उनकी कविता में लू शुन स्त्री-मुक्ति की लड़ाई को आगे बढ़ाते हैं। उन्होंने नेल्सन मंडेला और सत्तर-अस्सी के भोजपुर आंदोलन पर भी कविताएँ लिखी हैं। रामनिहाल गुंजन कलावादी कविता-परंपरा का विरोध करने वाले राजनीतिक कवि थे। उनकी कविताओं की सहज-सामान्य संरचना भी इसे प्रमाणित करती है।

गुंजन जी ने अपनी ‘शब्द-यात्रा’ कविता में लिखा है :

‘‘शब्द खोल देते हैं
हमारे लिए
दुनिया के सभी
बंद दरवाज़े’’

‘‘जैसे-जैसे हम शब्दों से रू-ब-रू
होते जाते हैं
खुलता जाता है
हमारे भीतर का
सिमटा हुआ आसमान
जिसमें चमकते हैं
अनगिनत सूर्य और तारे’’

वह अपनी एक कविता में किताबों को साँस की तरह ज़रूरी बताते हैं :

‘‘किताबों की
रंग-बिरंगी दुनिया में वापस होना
हमारे लिए उतना ही जरूरी है
जितना कि
जीने के लिए साँस लेना।’’

‘‘किताबों का होना दरअसल
रोशनी का होना है
जो काटता रहता है
अँधेरे का अंतहीन सिलसिला।’’

अपनी कविता ‘स्वप्न’ में वह अपनी कविता के उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं :

‘‘हमें नहीं चाहिए
किसिम-किसिम के स्वप्न
हमें तो चाहिए
किसी मज़दूर के हाथों से
सँवरकर आने वाले
सुनहरे दिनों के स्वप्न
और वामन डग भरते हुए
किसी बच्चे की आँखों में
तिरता हुआ
एक ममतामयी माँ का
स्नेहिल स्वप्न।’’

उनका मानना है कि राम-रावण युद्ध तो आज भी जारी है, लेकिन यथार्थ कथा से भिन्न है :

‘‘राम की सेना आज
लड़ रही है रावण की तरफ़ से
बेपनाह नफ़रत फैलाने वाले लोग
पैदा हो रहे हैं लगातार।’’

फिर भी उनका इतिहासबोध आश्वस्त करता है :

‘‘वे मिट जाएँगे
पूरी दुनिया से ही
नहीं बच पाएगा उनका नामोनिशान भी
आने वाली शताब्दियों में
घृणा की जगह उपजेगा
एक बार फिर व्यापक मानवीय प्रेम।’’

रामनिहाल गुंजन की कविताओं को पढ़ते हुए महसूस होता है कि जनता का संघर्ष ही नहीं, बल्कि बदलाव के लिए उसके संघर्ष को आवाज़ देने वाली कविता भी भविष्य के जनसंघर्षों और भविष्य की कविता के लिए ऊर्जा का काम कर सकती है।

महत्त्वपूर्ण, परंतु विस्मृत और उपेक्षित कर दिए गए लेखकों पर उन्होंने अपना लेखकीय फ़र्ज़ समझकर लिखा। छिद्रान्वेषण, चरित्रहनन, परनिंदा, आत्मश्लाघा, चमत्कार, उतावलापन या सनसनी की प्रवृत्ति न इनके स्वभाव में थी और न ही लेखन में। घनघोर आत्मप्रचार और पूँजी एवं सत्ता की गोद में बैठ जाने की आतुरता वाले मौजूदा दौर में रामनिहाल गुंजन लेखकीय स्वतंत्रता, स्वाभिमान और संवेदना के पक्ष में मज़बूती से खड़े एक विलक्षण साहित्यकार थे। गुंजन जी के पास बिहार की साहित्यिक पत्रकारिता, आंदोलनों और आयोजनों से जुड़ी बहुत सारी यादें थीं। वह शाहाबाद का साहित्यिक इतिहास लिखना चाहते थे। काश! वह अपने सारे संस्मरणों को लिख पाए होते। वह ग़ज़लें भी कहते थे। उनकी एक ग़ज़ल के दो शे’र याद आ रहे हैं :

‘‘जीस्त को चाहिए इक ढंग उम्र भर के लिए
रात को चाहिए उम्मीद एक सहर के लिए।’’

इस ग़ज़ल का अंतिम शे’र गुंजन के मिज़ाज को ज़्यादा स्पष्ट करता है :

‘‘मिली आज़ाद हवा साँस लेने को मगर
हमें तो चाहिए हर्फ़े-ख़ुदी असर के लिए।’’

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