गांधीजी और उनकी वसीयत

उत्तराधिकार के लिए सबसे बड़ा युद्ध भारतीय इतिहास में मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के बेटों में बताया जाता है। पूरा बयान तो नहीं मिलता, लेकिन इतना पता ज़रूर चलता है कि शाहजहाँ अपने बड़े और विद्वान पुत्र दारा को ही राजगद्दी देना चाहता था। लेकिन उससे बड़ा युद्ध आज दिखाई पड़ता है। बापू अचानक दिवंगत हो गए—‘राम’ को छोड़कर अंतिम समय और कुछ नहीं कह गए। जिन्हें राजगद्दी लेनी थी, उन्होंने तो ले ली; लेकिन उनके दूसरे सपूत भी इस बीच गले के ज़ोर से सिद्ध करते रहे कि बापू के सच्चे उत्तराधिकारी हमीं हैं। शायद ही कोई राजनीतिक दल इस उत्तराधिकार से बचा हो। अब तक तो ‘राम नाम की लूट है, लूट सके सो लूट’ वाली हालत थी। अंत काल तक पछताने के लिए कोई नहीं रहा। लेकिन आज के अख़बार में जब यह ख़बर मैंने देखी तो दंग रह गया—‘‘सरकार चुनाव-बिल पास करके आगामी चुनाव में गांधीजी के नाम का उपयोग अनैतिक घोषित करने जा रही है।’’

अब यह तो वही जाने जो झूठे अपनी दाढ़ी टटोल रहे हैं, लेकिन बात रह-रहकर मेरे मन में उठ रही है बापू की वसीयत की। नेहरूजी ने बापू के स्वर्गारोहण के समय अपने भाषण में शायद कहा था कि ‘अब वह ज्योति हम कोटि-कोटि भारतीयों में बिखर गई है।’ उस दिन इसका अर्थ समझ में नहीं आया, लेकिन आज वह कुछ खुल रही है। यह बात बापू की आत्मा के विषय में नहीं, उनकी वसीयत के बँटवारे के विषय में कही गई थी। उस बँटवारे का पता मुझे विश्वस्त सूत्र से लगा है। वहाँ मुख्य बातों की सूचना दी जा रही है।

गांधीजी के गुरु

गुरु के विषय में चेले अक्सर लड़ते ही हैं, लेकिन गुरु के गुरु के विषय में भी कभी-कभी काफ़ी छीना-झपटी होती है। मशहूर है कि गांधीजी के गुरु तीन बंदर थे। परंतु तीनों को कोई एक आदमी न लूट सका। सुनते हैं कि दो बंदरों को तो सरकार उठा ले गई—एक तो वह जिसने दोनों हाथों कान बंद कर लिए हैं और दूसरा वह जिसने आँखें बंद कर ली हैं। ठीक भी है! आख़िर जो अंधेर हो रहा है, उसे देखने के लिए ये आँखें थोड़े बनी हैं! उससे तो यही अच्छा है कि कुछ न देखें। फिर प्रजा की शिकायतें भी रोज़ पहुँची ही रहती हैं। इतना सुनते-सुनते तो कान बहरे हो जाएँगे। इसलिए सबसे अच्छा यही है कि कान ही बंद कर लें।

अब रह गया वह बंदर जिसने अपने मुँह पर हाथ रखा है। इसे कोई उठाने का नाम ही न ले। अगर सरकार इसे उठाती है तो बिना बोले उसका पेट फूल जाएगा और बिना खाए शरीर सूख जाएगा। इसलिए सरकार ने ज़बरदस्ती उसे उठाकर प्रजा के घर रखवा दिया ताकि न तो वह शोर करे और न भोजन। इससे एक तो देश में शांति रहेगी, दूसरे भाजन की समस्या भी हल्की हो जाएगी।

गांधीजी की धाय

गांधीजी की बकरी भी कम बेशक़ीमती नहीं! पहले तो सुनते हैं पड़ोस की कुछ हरिजन माताएँ ही उसके लिए दौड़ें, परंतु सरकार ने रोक लगा दी कि इतनी बेशक़ीमती चीज़ केवल कुछ बच्चों को दूध पिलाने के लिए नहीं दी जा सकती। दूसरे अभी स्वराज का शिशु बहुत छोटा था। उसकी माँ भी सात समुंदर पार चली गई। ऐसी हालत में उसके लिए बापू की बकरी से बढ़कर स्वस्थ दूध किसी का नहीं हो सकता था। बकरी स्वराज्य के पैताने बाँध दी गई। लोग समझ नहीं पाते हैं कि आख़िर यह स्वराज्य का बच्चा है या ‘राकस’ जन्मा है जो अभी इसी उमर में लोगों को बेकाज ही नोच-खसोट लेता है। मुरौवतन लोग बोलते नहीं और वह पंजे चला देता है!

गांधीजी का चश्मा

कमानी वमानी को देखते हुए तो चश्मा मामूली ही मालूम पड़ता था, इसलिए उसकी ओर बड़े लोगों की निगाह ही नहीं गई। बेचारे देहातियों की आँख यों ही बहुत खुली-खुली रहती हैं, इसलिए वे इस ‘अन्हवट’ को आँखों पर छोपना नहीं चाहते थे। वे भी उससे उदासीन रहे। सत्य को देखने वाली इस दिव्य दृष्टि का महत्त्व समझा तो नेहरूजी ने! उन्होंने उसे उबारा ताकि उसके ज़रिए तमाम दुनिया को राह की बातें दिखाई पड़ें। लेकिन सुनते हैं वह उनकी आँखों पर ठीक तरह से बैठ ही नहीं रहा है, इसलिए वह उसे केंद्रीय संग्रहालय को दे देना चाहते हैं।

गांधीजी की घड़ी

नेताओं में तो घड़ी सबके पास और वह भी बेशक़ीमती! इसलिए बापू की घड़ी के लिए व्यक्तिगत स्वार्थ का सवाल उठा ही नहीं। पार्लियामेंट के स्पीकर ने कहा कि इसे मैं पार्लियामेंट भवन में रखना चाहता हूँ। घड़ी ठहरी काल की टुकड़ी! इसी की वजह से ज़माना गांधीजी की टेंट में था। अब उसी के कारण ज़माना हमारी सरकार की टेंट में होगा। पता नहीं क्या बात है कि वह घड़ी उलटी चल रही है और उसी को देखकर सरकार का नारा है कि हम पुराने युग में लौट चलें। उसी के प्रमाण पर सरकार अक्सर दिन को रात कह बैठती है और सबको अपनी घड़ी उसी से मिलानी पड़ती है। बड़ी अच्छी चीज़ है!

गांधीजी की लाठी

अहिंसा तो लाठी में ही मूर्तिमान हो उठी थी—यही लोगों का कहना है। अँग्रेज़ी ज़माने में सिपाहियों को बंदूक़ें दी गई थीं। जिससे अक्सर ख़ून-ख़राबा हो जाता था। इसलिए सरकार ने गांधीजी की लाठी पुलिस में बँटवा दी, ताकि देश में शांति स्थापित करने के लिए वक़्तन-फवक़्तन उससे काम लिया जा सके। घोषित किया गया है कि गांधीजी की यही इच्छा थी।

गांधीजी का चरख़ा

चरख़ा तो गांधीजी का सुदर्शन चक्र ही ठहरा! औरतें उसे लेने के लिए मार करने लगीं तो बिरला जी ने कहा कि इसका सीधा संबंध मिलों से है। बापू की यही इच्छा थी कि अब मिलों की जगह चरख़ा ही चले। विदेशी कपड़ों का मुक़ाबला इसी के द्वारा संभव है। नेताओं ने भी सिर हिलाया और वह चक्र बिरला जी के हाथ पड़ा। सुनते हैं वह अब उचित हाथ में पड़कर इतना महीन कपड़ा बुनने लगा है कि पहनने पर मालूम ही नहीं पड़ता। बिरला जी की कहना है कि देश में सबके शरीर पर काफ़ी कपड़ा हो गया है, लेकिन यह इतना महीन है कि लोग नंगे दिखाई पड़ते हैं। करामात है चरख़े की! द्रौपदी की लाज वही बुनता है!

गांधीजी की चप्पल

चरण-पादुका लेकर ही तो भरत ने अयोध्या का राज्य किया था। इसलिए माननीय प्रधानमंत्री ने उस पर अपना अधिकार समझा और उसे सिंहासन पर रखकर राज-काज का दुर्वह भार सँभाला। आख़िर यह काम कर ही कौन सकता था! सबने नतमस्तक होकर स्वीकार किया।

इस तरह गांधीजी की सारी वसीयत लोग बाँट चले। वह तो ठहरे साधु-संत, इन सब चीज़ों के सिवा उनकी अपनी कही जाने वाली चीज़ तो कुछ थी नहीं। आश्रम को भी उन्हीं का समझिए, लेकिन धर्मनिरपेक्ष राज्य ने उस पर दख़ल देना उचित न समझा। इसलिए उसके महंत कुछ दूसरे जन हो गए।

लेकिन इन सबसे भी बड़ी—प्राणों से एकदम—उनकी अपनी एक और चीज़ थी। उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया। वह थी भारत की कोटि-कोटि जनता। सौत के बेटे की तरह वह धूल में पड़ी थी और उत्तराधिकारियों में से किसी का ध्यान उस ओर नहीं गया। सबकी आँखें सिंहासन की ओर लगी थीं।

जब बापू की सारी वसीयत लेकर लोग चलने लगे तो धूल से भरी हुई धरती के धड़कते हुए दिल से बापू उठे—‘‘और यह धूल-धूसरित जनता? इसे कौन सँभालेगा?’’ सरकार ने बिना मुँह फेरे जवाब दिया—‘‘हमीं सब कुछ लें। हमने तो इतना लिया ही। अब कुछ दूसरे बेटे भी सँभालें।’’

देखता हूँ तो आज वह वसीयत—सजीव वसीयत—धूल झाड़कर खड़ी हो गई है और कह रही है कि अब अपने को हमीं सँभालेंगे।

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‘प्रारंभिक रचनाएँ : नामवर सिंह (संपादक : भारत यायावर, राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण : 2013) से साभार प्रस्तुत।