भूले-भटके दिन : कुछ रूमानी टुकड़े

मैंने अपने सबसे असुरक्षित क्षणों में जब-जब तुम्हें याद किया है, तब-तब यह सवाल आया कि बीतते समय के साथ मैं तुम्हारे लिए महत्त्वपूर्ण रहूँगा कि नहीं! संभव है, यह प्रश्न तुम्हारे ज़ेहन में भी उठता होगा, क्योंकि जिस तरह से हम बड़े होते हैं; उसमें अपने को किसी के सापेक्ष देखने की ही आदत डाली जाती है। फिर किसी न किसी के सापेक्ष हम कमज़ोर पड़ ही जाते हैं।

अपनी ओर से तुम्हें कहने के लिए मेरे पास बस इतना है कि हमारे आस-पास का समय बदले तो बदले, पर तुम्हारा महत्त्वपूर्ण होना नहीं बदलेगा! मेरे दोस्त घनश्याम कुमार देवांश की एक कविता है—‘अच्छी प्रेमिकाएँ’—उस कविता की आख़िरी दो पंक्तियाँ मुझे याद रह गई हैं :

दरअसल, वे कितनी अच्छी हैं
ये बात सिर्फ़ उनके प्रेमी जानते हैं।

दूर होना, पास होना या एक वक़्त तक रहकर ओझल हो जाना; ये सब अवस्थाएँ हैं। तुम इन सबमें हो सकती हो या फिर इन सबके बाहर, लेकिन तुम्हारा मुझमें होना; चाहे मेरा तुममें रहना इन सबसे अलग है। पास और दूर होना यौन-उत्तेजना के क्षणों में ज़रूरी होता है। उसके इतर जो सब है, वह भावों के अलग रेशों से बुना जाता है।

छोड़कर चले जाने वालों की भी उतनी ही बातें याद रहती हैं, जो प्यारी थीं। रोना वही सब सोचकर तो आता है। जाने के झगड़े लंबी स्मृतियों में नहीं टिकते… कॉफ़ी में कितनी चीनी चाहिए यह सूचना रुकी रहती है… मन के क्लाउड स्टोरेज से डिलीट ही नहीं होती।

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जगमगाते शहर की रानाइयों में क्या न था
ढूँढ़ने निकला था जिसको मैं वही चेहरा न था

अमीर क़ज़लबाश के इस शे’र से शुरू होने वाली ग़ज़ल को चंदन दास की आवाज़ में सुनिए, कमाल की ग़ज़ल और सुनाने वाले का क्या पुरकशिश लहजा है! मुझे नहीं पता किसी और ने भी इसे गाया है या नहीं!

आज सुबह एक सपने से नींद खुली थी। सपने में, अपने विद्यालय के पास की मेरी सबसे पसंदीदा जगह थी। जंगल के बीच में नदी के उमड़ने से भरा पानी। वहाँ नदी जंगल में घुसी हुई मालूम होती है। सपने में मैं उस पानी में तैरने वाला था। मैं घुसता कि मेरी नज़र वहाँ पहले से मौजूद एक चेहरे पर गई। नींद खुली तो मुझे लगा कि कितना सच तो था सपने में, मैं उस चेहरे के साथ उसी पानी में उसी तरह होना चाह रहा था।

सुबह का सपना और उसके सच होने में बहुत से लोग रिश्ता जोड़ते हैं। वक़्त मिला तो मैं निकल गया उस चेहरे को वहीं ढूँढ़ने। चेहरा तो न था पर आस-पास पानी की टप-टप थी। बड़ी वाली रंगीन गिलहरियाँ मुझे देखते ही भागकर पेड़ पर चढ़ने लगीं। एक बंदर भी उनके पीछे हो लिया। पत्तों पर सरसराहट देर तक रही शायद कोई साँप भी भाग पड़ा हो। मैं देर तक उन गिलहरियों को ऊपर इस पेड़ से उस पेड़ कूदते देखता रहा। मेरे पलटते ही एक बड़ी-सी चिड़ियाँ उड़ गई—अपने बड़े-बड़े डैनों से साँय साँय की आवाज़ करते हुए।

वह चेहरा वहाँ होता तो सुनता वे आवाज़ें जो जंगल के सारे नर पक्षी अपने साथी को रिझाने के लिए निकालते हैं। शायद मैं भी उससे कुछ उसी अंदाज़ में कहता, और होता तो यह भी कि पेड़ से गिरे रुई के फाहे उसके दामन में भर देता!

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फ़िल्म ‘लक्ष्य’ में ऋतिक रोशन अपनी जेब से चाभी निकालते हैं और हाथ बाहर निकालते हुए उनका बटुआ गिर जाता है और फ़िल्मी संयोग देखिए कि बटुए में प्रीति जिंटा की तस्वीर होती है जो सुशांत सिंह देख लेते हैं।

–वाइफ़?
–पता नहीं। (ऋतिक यही कहते हैं।)
–गर्लफ़्रेंड?
–पता नहीं। (ऋतिक रोशन फिर से यही कहते हैं।)

इस ‘पता नहीं’ के दुहराव में एक बात कहनी रह जाती है कि सारा इंतिज़ार ही है जो बचा रह गया है। बटुए में जो है उसे या तो गर्लफ़्रेंड होना था या वाइफ़, लेकिन बात उसके बटुए तक होने में ही रह जाती है। पर क्या बात बटुए तक रहती है? बटुए में नहीं भी रहती तो प्रीति ज़िंटा रितिक रोशन के दिल में उसी तरह थीं, जैसे वह छोड़ने से एक दिन पहले रहती होंगी।

उसी फ़िल्म में एक जगह ऋतिक रोशन, प्रीति ज़िंटा को शादी के लिए कहते हैं। ऋतिक कहते तो हैं, लेकिन जिस तरह से कहते हैं; वह प्रीति को कहने जैसा नहीं लगता।

वे दोनों जिस तरह के प्यार में थे, उस तरह के प्यार में कहा कई बार गया होगा और समझा भी कई बार गया होगा। साथ ही ‘हाँ’ भी कई बार की गई होगी। लेकिन प्रेम के रीति-रिवाज के हिसाब से नहीं कहे गए तो कई वर्षों में कई बार कहे गए का कोई अर्थ नहीं रहा होगा। ठीक! ऋतिक से तमाम लड़ाई के बाद प्रीति को कुशल पंजाबी ने प्रोपोज़ किया। प्रीति मान गईं। एक तो ऋतिक दूर थे, दूसरे कुशल का तरीक़ा प्रेम की रीति पर सटीक बैठता था।

फ़िल्म ख़त्म होने को होती है तो अस्पताल के बाहर प्रीति और ऋतिक मिलते हैं। प्रीति पूछती हैं :

–तुमने जो लक्ष्य बनाया था वह तो पा लिया अब?
–अब मेरा एक नया लक्ष्य है।

ऋतिक कहते हैं और प्रीति देखती हैं। प्रीति के देखने में ही सब है। वह थोड़े आश्चर्य के भाव तो लाती हैं, लेकिन उन्हें पता होता है कि अब ऋतिक क्या कहने वाले हैं।

-तुम।

प्रीति को अच्छा लगना चाहिए कि वह ऋतिक के लिए लक्ष्य हैं। कहने को दोनों ने एक दूसरे को बहुत कुछ कहा और एक दूसरे के ख़िलाफ़ किया भी, लेकिन प्रेम के अपराध अलग होते हैं।

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बारिश आजकल उसी पहाड़ी से नीचे उतरती है जिसे मैं रोज़ देखता हूँ। बूँदों का संकुल उसकी हरीतिमा को ठीक उसी तरह ढक लेता है, जैसे शीशे वाले बाथरूम के धुँधलके से झाँकता तुम्हारा झिलमिलाता अक्स! हर ओर एक पारभासी आलस! ज़ाहिर और छिपा हुआ भी।

इन दिनों बिस्तर उस महक को लिए रहता है जो अक्सर बँधे हुए बालों में छिपी रहती थी। याद है, एक बार मैंने मज़ाक़ में कहा था तुम्हें कि इस ओर की स्त्रियाँ अपनी वेणी में फूल इसलिए बाँधती हैं कि बालों में बसी नारियल तेल की गंध बेले के मादक मोह में मिलकर नशे-सी चढ़ जाए!

‘मैला आँचल’ में रेणु एक जगह लिखते हैं कि लड़कियों के गीले बाल नहीं छूने चाहिए पाप लगता है। सोचो, इस बारिश में हम घुस जाते… पानी तुम्हारे बालों के सहारे धार बनकर बहता मन के भीतर दूर-दूर तक फैले गाँवों में लगी आग बुझ जाती। रेणु कहाँ तक पाप लगने का हवाला देकर गीले बालों को छूने से रोक पाते!

हमारा अच्छा है न कि आस-पास कोई अंबिका नहीं! अंबिका को मल्लिका का बारिश में भीगना एक बार को सह्य था, पर जब कालिदास साथ रहे तब ऐसा हो तो घोर कलह का कारण! तुमने मुझे ‘न हन्यते’ पढ़ने को कहा था। अब तक नहीं पढ़ पाया। इसी बहाने किताब और तुम एक साथ दिखती हो, जैसे उसे तुमने ही लिखा हो। किताबों वाला प्रेम पढ़ते हुए उस जगह पर मैं अक्सर ठहर जाता हूँ, जहाँ प्रेमी बिस्तर पर पड़े होते हैं और एक-दूसरे को अगली बार के लिए तैयार करने की जल्दी में प्रवेश किए बिना एक दूसरे को सुनते रहते हैं…! ऐसी किताबें कहाँ मिलती हैं!

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वे पत्थर बस पत्थर थे, घास बस घास थी और हवा सिर्फ़ हवा। उनमें जान होती तो वे हमारे साथ की कहानी कहते। वे पंछी जो लंबे देवदार-सी तुम्हारी छवि के पीछे उड़ते रहते थे, उनका स्मरण है क्या तुम्हें!

ऊँचे पहाड़ पर टिके उस टीले वाले संग-साथ को जितना वक़्त हुआ उतना ही वक़्त हवा के उन झोकों को महसूस किए हुए बीत गया जिनमें अकेले खड़े रहना भी मुश्किल था। मैंने कभी बर्फ़ को गिरते नहीं देखा था। तुम्हारे जैकेट के बालों में उन्हें देखना एक सुकून होता, लेकिन बात केवल बारिश तक आकर थम गई थी।

ऐसा क्यों होता है कि हर बार कहना ही ज़रूरी हो, ऐसा क्यों होता है कि हमारे बीच की हवा कुछ नहीं बोलती… न पत्थर बोलते हैं और न ही वह हरी घास जिन पर हम बैठे थे!

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रात की सैर, अँधेरे के घर में अपना प्रवेश है—ठीक ज़िंदगी की तरह! बहुत पहले से मैंने ज़िंदगी को अँधेरी सुरंग मानना शुरू कर दिया था। हर बात की अनिश्चितता! और एक बार कुछ तय हुआ तो फिर दिन निकलने के बाद जैसे अँधेरे का घर उजड़ता है, ज़िंदगी भी खुल जाती है। तब शायद बिखर जाती है। बिखराव इंसान का हो तो एक बात, लेकिन बिखरी हुई ज़िंदगी को जीना इंसान से बहुत कुछ ले लेता है।

एक कड़क कॉफ़ी की ज़रूरत इसलिए पड़ जाती है, क्योंकि नींद में नहीं जाना। यह भी क्या कि सुबह से शाम तक कोल्हू के बैल बनो और फिर थक कर सो जाओ। थकने के बाद का जागना समय के साथ अपनी लड़ाई को मज़बूत करता है। कॉफ़ी के ऊपर के फेन में जो कॉफ़ी की गर्मी को सहेज रखने की क्षमता है, वह अपने भीतर आ पाती है।

रात किसी स्थान के मायने को बदल देती है। सड़क से उस स्थान की खुली खिड़कियाँ नहीं, बल्कि दुकानों के उदास शटर दिखते हैं। ये वही शटर हैं जिनके खुले होने को चेखव भूखे जबड़ों की संज्ञा देते हैं। रात उन जबड़ों को उदास कर देती है। उन जबड़ों के पार खिड़कियाँ होंगी जिनके पर्दे की झिरी से घर का आनंद दिखता होगा, लेकिन एक यात्री वह आनंद कभी नहीं देख पाता। यात्री जो देखता है, वह बस बाहरी दुनिया है।

बिना बारिश की मेघाच्छन्न रात में एक तारा टिमटिमाता है और उसी के सहारे बाहर निकला व्यक्ति चलता है। दुकान में ऊँघते इंसानों की आँखों में वही तारा कब आकर बैठ जाता है, पता ही नहीं चलता!

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ऐसी रातों में से ही एक रात थी जब चाँद तक को देखने की इच्छा नहीं बची, हवा की ठंडक भी छूने का मन न हुआ। शाम ने जिस तरह की शुरुआत की थी, उस हिसाब से कोई उम्मीद भी नहीं थी। कितनी ही बार हुआ है ऐसा कि वह देर शाम सोकर उठे और उठते ही अपने को उदास पाए। तब पहला काम होता है—उस उदासी के कारण को ढूँढ़ना और हर बार एक से ज़्यादा कारण मिलते हैं। नींद में जाना इतना त्रास देने वाला बन जाता है।

ख़ैर, वह रात!

उन तमाम कामों के बाद जिससे खाना जुड़ा हुआ था, उसके पास करने के लिए कुछ नहीं था। नहीं ऐसा कहना एक झूठ होगा कि उसके पास करने के लिए कुछ नहीं था। चाहे तो वह अधूरी पड़ी हुई कहानियाँ पूरी कर सकता था, नहीं तो अपने धूमिल हो चुके ‘लेखक’ वाले रूप को जगा सकता था। हाँ! कुछ पढ़ने का विकल्प तो था ही। पर यह सब नहीं करना था उसे। नहीं सीखना था कुछ भी, नहीं हासिल करना था कोई नाम। मुक्तिबोध की कविता का वह हिस्सा बार-बार याद आ रहा था जिसमें वह कहते हैं—बजने दो साँकल… मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से! उसे यूँ ही अँधेरी रात में पीठ से लगातार बहते पसीने को कुर्सी के गद्दों में समाते हुए महसूस करना था।

‘‘ज़िंदा हो?’’ तकनीक की दुनिया ने उसे दुनिया से जोड़ रखा है और इस संवाद ने उसे वापस वहाँ लौटा दिया जहाँ अपने को ज़िंदा दिखाने के लिए सवालों के जवाब दिए जाते हैं, उस माहौल में कुछ करना पड़ता है ताकि लोग जान सकें! ‘‘हाँ और तुम?’’ ‘‘मैं भी…’’ ‘‘कॉल करूँ?’’ ‘‘क्यों नहीं?!’’

किसने किससे क्या कहा यह अलग-अलग न कह कर एक साथ भी कह दिया जाए तो कोई अंतर नहीं पड़ेगा। सब अंदाज़ा लगा ही लेंगे कि उसके उत्तर कौन से थे!

‘‘तुममें कोई बुराई है?’’ वह हर बार यही क्यों पूछती है और हर बार वही स्पष्टीकरण भी क्यों देती है—बुराई मतलब जिसे दुनिया बुराई कहती है, जैसे : दारू पीना, सिगरेट पीना। दुनिया यदि बुराई कहती है और तुम उन्हें बुरा नहीं मानती तो बुराई क्यों ही कहती हो कुछ और कह लो! कितनी भी बार पूछ लो वह इतना ही कहेगा कि उसे चाय तक की आदत नहीं है। यही सच भी है कि उसने अपने लिए कभी चाय नहीं बनाई और किसी भी दुकान में अकेले चाय पीने के लिए नहीं घुसा!

‘‘…चलो एक खेल खेलते हैं, हम गाते हैं… तुम शुरू करो मैं साथ दूँगी!’’

‘‘बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे…!’’ उसने इसे अपना पसंदीदा गाना कहा। रात में कुछ हज़ार किलोमीटर से दो आवाज़ें एक धुन पर गा रही थीं। फिर एक गीत, फिर एक और।

‘‘छू लेने दो नाज़ुक होंठों को…’’ कितना सिडक्टिव गीत है न… पूरा सुनाओ पूरा… बहुत बढ़िया गा रहे हो!

वह गाता जा रहा था।

‘‘अब मेरी सुनो… ना उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन / जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन…! तुम्हें पता है मैंने इस गीत को जिया है… तुम हार के दिल अपना… तुम्हें मैं अपने आँसू दिखा सकती! मैं अब नहीं रोती! यह सब ख़त्म होगा तो तुम सबसे पहले क्या करोगे?’’

फिर से एक सवाल!

‘‘मुझे स्पर्श चाहिए… यू नो वॉट आई मीन।’’

‘‘हम्म, आई नो!’’

‘‘आजकल यह इंटरनेट भी बहुत धीमा हो गया है… बहुत ज़्यादा!’’

‘‘क्यों तुम्हारे वे वाले वीडियो नहीं चलते क्या!’’

‘‘न! चलो कोई और गाना सुनाओ…’’

‘‘रात अकेली है बुझ गए दिए… जो भी चाहे कहिए… जो भी चाहे कहिए… कितना बढ़िया लिखा है न…!’’

‘‘सुनो, तुम्हें सो जाना चाहिए… तुम बहकते जा रहे हो!’’

उस रात में रात रह ही नहीं गई थी, थोड़ा-थोड़ा नीला आसमान दिखने लगा था। शमशेर की कविता उषा की तरह : प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे! वह उषा के जादू टूटने के इंतिज़ार में रहे कि सो जाए! उसे नील जल में गौर झिलमिल देह देखनी है!

किसी कर्कश आवाज़ वाले पक्षी को सुनकर सब छिन्न-भिन्न हो जाना देख रहा था वह!

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