रचना में नया क्या

बहुत आसानी से कहा जा सकता है कि रचना में नई अंतर्वस्तु और उसका विन्यास ही नया माना जाएगा। सवाल उठता है कि नई अंतर्वस्तु क्या है? रचना में नई महत्त्वाकांक्षाओं को नया माना जा सकता है, जिसके प्रतिफल नई संरचना और नया रूप-विधान हो सकते हैं—नई कला और नई असहमति और पुराने की नई तरह से पहचान—आविष्कार और उद्भावना।

लेकिन क्या ये परिवर्तन शब्द-सृष्टि में स्वायत्त तौर पर घटित होते हैं या हो सकते हैं? कौन नहीं जानता कि शब्द-सृष्टि की एक सांसारिकता होती है। प्रश्न यह है कि भारतीय संदर्भ में यह सांसारिकता किस तरह की होती है? नकारात्मक और निषेधवादी होने का ख़तरा उठाते हुए कहना पड़ेगा कि यह मलिन और स्याह सांसारिकता है। स्वतंत्रता के अपहरण और विषमता का सृष्टि-बोध रचनाकार को उद्विग्न और उत्प्रेरित करता है। तब वह पुराना प्रश्न फिर से खड़ा हो जाता है कि नए के लिए नई सामाजिक दृष्टि अनिवार्य होती है, जो नई कला-दृष्टि के उन्मेष में बदलती है और तब दोनों का ऐक्य वैसे ही ज़रूरी हो जाता है जैसे कि आस्तित्वक और सामाजिक का अनन्यत्व। इस रचना-दृष्टि के मूल में समानता और स्वतंत्रता के दो बड़े मूल्य होते है। युग कोई भी हो हिंदी का लेखन इन दो स्तंभों पर खड़ा है। इसलिए किसी भी नवता-विमर्श में इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

आज के साहित्यिक भू-दृश्य पर यदि विहग दृष्टि भी डाली जाए तो शारदीय आकाश की तरह यह साफ़ हो जाएगा कि हिंदी-प्रायद्वीप में हो रही उथल-पुथल हिंदी-रचना में गहरे परावर्तित हो रही है। दलित-प्रश्न, स्रीपक्ष और आदिवासी आवाज़ों ने रचनाओं की अंतर्वस्तु को प्रभावित किया है और बदला है। हिंदी में स्त्री-लेखन का व्यापक और विस्मयकारी उभार चकित करता है। जिस फ़ेसबुकिया कविता को बाज़ दफ़ा हिक़ारत सें देखा जाता है, हाल के दशक का स्त्री-लेखन उसी वधस्थल की उपज और उभार है। इस फ़ॉर्मेट ने स्री-लेखन को अकुंठ, साहसिक और स्वायत्त बनाया। यहाँ संपादक के पुरुषवाची नियंत्रण और सेक्सीय कुंठा से निर्धारित होता पाठ नहीं था। स्त्रियाँ अपनी रचनाएँ आप ही प्रकाशित कर सकती थीं। यह आत्म-प्रकाशन स्त्रियों को आत्मकथा की ओर ले गया—ये आत्मवृत्त मर्दवाद, मेल गेज़, पितृसत्ता, घरेलू हिंसा, बेटी बचाने का सत्तात्मक फ्राड, यातना, क़ैद, विषमता की काव्य-वस्तु तो थे ही, इसके आग्रह पुरुष के साथ समकक्षी होने के माँगपत्र भी थे।

फ़ेसबुक कथा-कहानी के प्रदीर्घ को नहीं सँभाल पाता, इसलिए स्त्रीपक्ष कविता के रूप में आता रहा। यौनिकता के कितने ही ढके-छिपे वृत्तांत बाहर आने लगे। हिंदी में यह एक नई इच्छा का प्रकटन था, जो ऐतिहासिक था। यह बात ललकार कर कही जाने लगी कि पुरुष और स्त्री के लिए नैतिकता के दोहरे मानदंड क्यों हैं? श्रम-विभाजन, जननी होने के नाम पर स्त्री का भावात्मक अवशोषण और सौंदर्य के मानकों की पुनरीक्षा स्त्री-काव्य का हिस्सा बनते गए। काव्य का यह असंपादित पाठ संवेग और उद्वेग और शिकायत और पुकारों से बना था; इसलिए कई बार कच्चा होने के बावजूद बेहद विश्वसनीय, सहज, साहसिक और निर्मम था।

यह स्त्री-पक्ष एकाश्मीय और एकस्वरीय नहीं रहा। इसका एकरूपीकरण और एकभाषीकरण नहीं हुआ। अपने उद्भव में ही यह बहुविध और बहुवर्णी और बहुस्वरीय था। स्री की बात स्त्री कर रही हो और साँस रोककर पूरा हिंदी समाज जिसे सुन रहा हो, यह पहली बार हिंदी में हो रहा था। बेडरूम के रोमांस का आश्चर्यसंसार ढह गया। शयनकक्ष कई बार एक हॉरर चेंबर में बदल दिया गया और ठीक ही। तो गुह्य कक्ष के नियंत्रक अनुभवों को विवृत करने के लिए लेखिका ने कलर नोट को अपनी स्लेट बनाया और फ़ेसबुक उसका ऑडिएंस बना। सवर्ण स्त्रियाँ अपने अवर्णीकरण—अब्राह्मणीकरण का उद्बोधन करती रहीं, जबकि आदिवासी स्त्री के पास दैहिक और पर्यावरणीय हिंसा और नस्लवाद के कितने ही संस्करण कविता में आने लगे। हिंदी के पास कहने के ऐसे तौर-तरीक़े पहले नहीं थे। वहाँ अगर था तो शिकायतों का एक बहुत फटा-पुराना काला रजिस्टर जिसमें क्या लिखा जा रहा है, इसे पुरुष नियंत्रित करता था। स्त्री-लेखन अब बोल्ड और बिंदास के बाज़ारू शब्दों से परिभाषित नहीं किया जा सकता। इसको विश्लेषित करने में पश्चिमी नारीवाद के प्रतिमान भी अपर्याप्त जान पड़ते हैं। स्त्री-लेखन नए प्रतिमानों की चुनौतियाँ पेश करता है।

इतना ही नहीं जाति के उत्पीडन और जंगल के प्रश्न हिंदी कविता की नई अंतर्वस्तु को संवर्द्धित कर रहे हैं। इस नए लेखन की आवाज़ ही नहीं इसके पात्र भी बदले हुए हैं और इसका लक्ष्य और महत्त्वाकांक्षाएँ भी। इस कहन के वाक्य विभिन्न हैं। कितने ही सामाजिक संस्तरों की आवाज़ें विकेंद्रित और बिखरी हैं। वे केंद्रीय अखंडता की नहीं, विशृंखलित की विरहित और स्थानीय आवाज़ें हैं—रुँधे हुए कंठों की आवाज़ें। स्री, दलित और आदिवासी भागीदारी के केंद्र में आत्म-गरिमा की केंद्रीयता है; जो लूट से जनित दरिद्रता और उससे पैदा निर्बलीकरण को अलक्षित नहीं रहने देती। हिंदी का लेखन कार्यभार से संपृक्त रहता है। वह दायित्वबोध का लेखन है। इसीलिए नवता की ओर जाता लेखन कला की स्वायत्तता के विभ्रम में नहीं पड़ता, जबकि तकलीफ़ के उत्स से निकली संरचना विन्यास की मौलिकता को संभव बनाती है। हिदी साहित्य की यह संसक्त सांसारिकता उसे गतिशील बताए रखती है और इसीलिए प्रगतिशील भी।

सवाल यह है कि दलित-अस्मिता, स्त्री-अस्मिता और आदिवासी-अस्मिता में आत्मगौरव के आग्रह क्या उन्हें विखंडित द्वीपों में रहने का आग्रह और हठ प्रदत्त करते हैं या वे हिंदुस्तानी सामाजिकता की बड़ी लड़ाइयों का हिस्सा भी बनते हैं और इस तरह उसे एक बृहत् राजनीतिक विज़न से संवलित भी करते हैं, जो एक वैकल्पिक नागरिकता का यूटोपिया भी प्रस्तावित करता हो। ‘हिन्दवी उत्सव’ के कल (30 जुलाई 2022) होने वाले विमर्श में रचना में नए की खोज ज़ाहिर है उत्तेजक और गवेषणा से भरी होगी जिसमें शुभा, श्यौराज सिंह बेचैन, गरिमा श्रीवास्तव के साथ अशोक वाजपेयी हिस्सेदारी करेंगे।

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‘हिन्दवी उत्सव’ के विषय में जानकारी के लिए यहाँ देखिए : हिन्दवी उत्सव

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