साथ निभाने की कला

सम्बन्धों के बिना मानव जीवन कितना शांत और सरल है। लेकिन ऐसी शांति और सरलता किस काम की जिसमें मानव किसी से दो बातें न कह सके। किसी के ऊपर चिल्ला न सके। उससे झगड़ न सके। झापड़ न मार सके या बदले में उससे झापड़ न खा सके। और अगले ही क्षण उसे प्रेम न कर सके।

यह भी कोई जीवन है, जहाँ मानव जब चाहे किसी के गले लगकर रो न सके या कोई उसके गले लगकर रोने में संकोच करे। अकेले रोने में वह आनंद कहाँ, जो किसी से चिपटकर रोने में है। अकेले रोना भी कोई रोना है। उसमें कोई रस नहीं।

जब तक कोई सांत्वना देने वाला न हो, तब तक रोने में कैसा आनंद। ऐसा रोना निरर्थक है। आदमी रोता भी उसी के सामने है जहाँ वह सहज हो—बातचीत में नहीं, लिपटने में।

जहाँ सामने वाला आँसुओं से अपना कंधा गीला होने की परवाह नहीं करता, रोना भी उसी के सामने आता है। हर व्यक्ति के सामने रोना भी नहीं निकलता।

मन भी जानता है कि कौन उसके गीलेपन को सँभाल सकेगा! मन का गीलापन भी बहुत ज़रूरी है। सूखा मन, सूखे पेड़ के समान होता है जिसे कुछ इंतज़ार के बाद काट दिया जाता है या वह ख़ुद सड़कर गिर जाता है।

मन पर सम्बन्धों की छाप होती है। जैसे जल पर लगी छाप देखी नहीं जा सकती, ठीक वैसे ही मन पर लगी छाप देखी नहीं जा सकती। किंतु सम्बन्ध, शिवलिंग पर टपकते जल की तरह सतत मन गीला रखते हैं।

सूखा मन लेकर कौन जी सका है? किसमें अकेले जीने की ताब है? मानव अकेले नहीं जी सकता। भगवान भी नहीं। लक्ष्मण का वियोग राम नहीं सह सके और उनके पीछे सरयू प्रवेश कर गए। अकेले जीवन घसीटा जा सकता है, जिया नहीं जा सकता।

मानव आता भी अकेला है और अंत में जाता भी अकेला है। लेकिन इस आदि और अंत के मध्य ही जीवन है, और जीवन सिर्फ़ क्लाइमैक्स के लिए नहीं जिया जाता।

क्या फ़िल्म सिर्फ़ क्लाइमैक्स के लिए बनाई जाती है? यदि फ़िल्म क्लाइमैक्स के लिए बनाई जाती तो इसे कौन देखता! या जिस फ़िल्म की शुरुआत अच्छी हो और आगे वह बाँधकर न रख सके, तो क्लाइमैक्स से पहले ही दर्शक उठ खड़े होते हैं।

जिस फ़िल्म में बाँधने की कला नहीं वह फ़िल्म अच्छी नहीं मानी जाती। मानव जीवन भी ठीक ऐसा ही है। सहज और स्वीकारे गए बंधनों के बिना जीवन एक असफल और बेकार फ़िल्म है।

जिसमें सामने वाले से बँधने और उसे बाँधने की कला नहीं, ऐसा जीवन दुःख की भारी टोकरी होता है। जो सिर से चिपक जाती है और लाख हटाने से भी नहीं हटती। इसको हटाने के लिए कई हाथों का गर्म स्पर्श लगता है।

स्पर्श में बड़ी शक्ति होती है। यह एक से एक जड़ीले दुःखों को पिघला देता है। जिसने किसी को प्रेम से स्पर्श नहीं किया, या जिसे किसी ने प्रेम से स्पर्श नहीं किया। वे जीवन के सबसे बड़े सुख से वंचित रह गए। स्पर्श, सम्बन्धों का फ़ेवीकोल है। यह उन्हें जोड़कर रखता है। सम्बन्ध में लाख समस्याएँ हों। सिर्फ़ एक प्रेम भरा स्पर्श नई शुरुआत के लिए काफ़ी होता है।

मानव को हर वक़्त दूसरे की ज़रूरत होती है। वह अकेले जीवन के सुखद पहलुओं का आनंद नहीं ले सकता। वह अकेले हँस नहीं सकता। हँसना-हँसाना किसी दूसरे की माँग करता है। और अकेले हँसने में कैसा सुख। आपको कोई हँसता हुआ देखकर ख़ुश न हो सके, ऐसा हँसने में क्या मोद।

हँसाने की एक कला होती है। वैसे ही हँसने की भी एक कला होती है। हर व्यक्ति खुलकर नहीं हँस सकता। हर व्यक्ति मुस्कुरा नहीं सकता। जो दोनों कर सकते हैं, वे भाग्यशाली हैं।

दर्द में हँसना कोई कलाकारी नहीं है। यह बात मानव में समाज जबरदस्ती ठोंक देता है। किंतु प्रसन्नता और सुख में ठहाका मारकर, बिना किसी की परवाह किए हँसना कलाकारी है। ऐसी कलाकारी के लिए साहस चाहिए और यह किसी के साथ होने पर ही आता है।

साथ बहुत महत्त्वपूर्ण है। साथ बने रहना उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण। ख़ासकर ऐसा साथ जहाँ बहस की गुंजाइश हमेशा बनी रहे। जहाँ बहस में संकोच आड़े न आए। ऐसा साथ विकासोन्मुख होता है और आगे बढ़ने में मदद करता है।

आगे बढ़ने के लिए साथ और सम्बन्ध आवश्यक हैं। आगे बढ़ने से तात्पर्य जीवन में आगे बढ़ना। इस काल में जीवन में आगे बढ़ने का एक सबसे बड़ा पैमाना धन है। किंतु धन सम्बन्धों की डोर में तनाव का कारण है। जीवन में आगे बढ़ने से मतलब भावशून्यता, गतिशून्यता और मतिशून्यता का क्षय। जीवन भावपुष्पित हो। उसमें प्रेम की सुगंध आए। मानव संवेदनशील और विनम्र बने।

सम्बन्ध के बिना जीवन सरल हो सकता है, किंतु सुखद नहीं। यदि जीवन संघर्ष है तो सम्बन्ध के बिना संघर्ष और जीवन दोनों अशक्य हैं क्योंकि सम्बन्ध, जीवन में संघर्ष-विराम की पहल हैं।

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