सफ़र में होना क्या होता है?

उस दिन पहाड़ पर बादल तेज़ हवाओं के साथ बह रहे थे। वह बादलों की ओर देखकर शायद कोई प्रार्थना कर रही थी। मैंने कहा, “…सब आसमान की तरफ़ देखकर प्रार्थनाएँ क्यूँ करते हैं?” वह मुस्कुराते हुए बोली, “ताकि प्रार्थनाएँ उड़ सकें।” मैंने पूछा, “वे उड़कर कहाँ जाएँगी?” वह बोली, “अपने सफ़र पर।”

यात्रा के दौरान अक्सर कोई सँकरी-सी गली अचानक किसी फूल की तरह हमारे सामने खुल आती है। हम उस गली के भीतर क़दम नहीं बढ़ाते। बाहर खड़े होकर भीतर तक झाँक लेने की कोशिश करते हैं। ऊँची पहाड़ी पर पहुँचने को उत्सुक आँखें उस छोटी-सी गली को दूर से ही महसूस करती आगे निकल जाती हैं। और जब हम कोई ऊँची पगडंडी चढ़ रहे होते हैं तो सहसा एक एहसास होता है कि हमारा मन तो उस सँकरी गली में कहीं अटका रह गया है। छूटा हुआ मन फिर पहाड़ी पर हमारे साथ नहीं चढ़ता। हम सिर्फ़ उसके लौटने का इंतिज़ार कर सकते हैं।

कई बार यात्राओं से हम बे-मन लौटते हैं। मन बहुत पीछे कहीं ठहर चुका होता है। अक्सर हम यात्राओं से लौट तो आते हैं, पर मन हमारे लौट आने के बहुत बाद में लौट पाता है। लौटते हुए हम पहाड़ों से नीचे उतर रहे होते हैं। लौटते हुए मन को बहुत ऊँची चढ़ाई चढ़नी होती है।

“चाँद देखना…” उसने लौटते वक़्त कहा था। मैं पूरे सफ़र बस की खिड़की से टिक कर बैठा रहा—यह सोचते हुए कि “चाँद देखना…” उसने कहा है। ‘‘चाँद देखना…’’ कहने से पहले उसने चाँद देखा था। मैं सारा सफ़र उसके देखे हुए चाँद को देखता रहा।

उसकी देखी हुई चीज़ों को मैं घंटों अपलक देख सकता हूँ। मैं ऐसे उसकी आँखों में देखता हूँ। हम ऐसे घंटों एक दूसरे से नज़रें मिलाए एक दूसरे की आँखों में देखते रहते हैं।

मैं सफ़र में होता हूँ तो उसके गुनगुनाने की आवाज़ मेरे कानों में बनी रहती है। जैसे वह अब उस दूर शहर में नहीं जिसे मैंने बहुत देर पहले छोड़ दिया, बल्कि यहीं कहीं सफ़र में साथ है। किसी दूसरी बर्थ की दूरी पर गुनगुना रही है। सफ़र की दूसरी सारी आवाज़ें कहाँ खो रही हैं? मैं उन्हें खोने नहीं देना चाहता। उन्हें खोज-खोज कर सुनता हूँ।

रेलगाड़ी के चलने की आवाज़ क्या कोई गीत है? मैंने उसे हमेशा संगीत की तरह सुना है। मैं सफ़र में उसे ध्यान से सुनता हूँ। क्या उसकी आवाज़ भी सफ़र में है मेरे साथ? वह क्या गुनगुनाती है—इस वक़्त—उस शहर के किसी ऑटो में? उसकी गरदन पीछे सीट से टिकी है। चेहरा कहीं खोया है—समय में। आँखों में उसने अभी काजल लगाया था, कमरे से निकलते वक़्त। वे आँखें शहर की दौड़ती सड़कों पर एक जगह ठहरी हैं। ऑटो तेज़ भाग रहा है। मैं रेलगाड़ी की खिड़की के क़रीब हूँ, ताकि गुज़रते वक़्त को देख सकूँ। उसके दोनों हाथ उसकी गोदी में रखे झोले पर हैं। वह इतनी शांति में क्या गुनगुना रही है।

“गुनगुनाओ न कोई गीत पुराना…” कल शाम साथ चाय पीते हुए मैंने कहा था। मैं अपने बिस्तर पर लेटे हुए सुन सकता था कि वह सोते वक़्त कुछ गुनगुना रही है। चाय पर मैंने ज़िद नहीं की। मैंने बस इतना कहा, “तुम न भी गुनगुनाओ तो भी मैं तुम्हारा गुनगुनाना सुन सकता हूँ।”

सफ़र में मैं मोबाइल पर ‘सफ़र’ लिखने के बारे में सोचता हूँ और बार-बार ‘प्रेम’ लिख देता हूँ। एक रोज़ वह बोली, “सफ़र में होना प्रेम में होने की तरह है।” मैंने कहा, “हम हमेशा ही सफ़र में होते हैं, पर फिर भी बार-बार सफ़र में लौटने के बारे सोचते हैं। क्या प्रेम में होते हुए हम प्रेम में लौट सकते हैं?” मैं ऐसे सवाल तेज़ चलती रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर गिरा देता हूँ। वे सारे सवाल किसी टूटे पत्ते की तरह उड़ते हैं।

हवा हमेशा सफ़र में होती है। इसलिए वह प्रेम समझती है। सदियों से हवा ने किसी भी पत्ते को गिरने नहीं दिया। वह उन सवालों को भी नहीं गिरने देती। मैं देखता हूँ कि वह रात भर पागलों-सी रेलगाड़ी की खिड़की से अंदर-बाहर होती उन सवालों के जवाब खोजती रहती है। मैं रात भर सफ़र करता प्रेम में लौट सकने के सारे सवाल रेलगाड़ी की खिड़कियों से गिराता रहता हूँ।

यात्रा मेरे लिए दुनिया के किसी विराट मानचित्र की कल्पना करना है। और फिर उस धुँधली कल्पना में ध्यान से देखना है कि मैं उस मानचित्र में दुनिया के किस छोर पर अपने दोनों हाथ जेब में डाले, शांत खड़ा हूँ। आसमान की तरफ़ देख रहा हूँ। और दुनिया के किसी विराट मानचित्र की कल्पना कर रहा हूँ।

सफ़र में होना क्या सिर्फ़ सफ़र में होना है? मैं जब सफ़र में होता हूँ तो यह सवाल बार-बार ख़ुद से दुहराता हूँ और हर बार किसी नए जवाब के साथ सफ़र का हो जाता हूँ।

कई बार लगता है कि सफ़र कोई ज़िम्मेदारी है बस जिसमें मुझे समय को एक इलास्टिक की तरह खींच कर देखना है। समय का एक छोर कहीं बीते जीवन की खूँटी से बँधा है और दूसरा मेरे हाथ में। मैं लगातार सफ़र करता उसे खींचे जा रहा हूँ बस। इतनी तेज़ी से भाग चुके समय को जब सफ़र के छोर से खींच कर देख रहा हूँ तो गुज़रा हुआ सब कुछ आँखों के सामने फिर से धीमी-धीमी गति से घटता हुआ दिखाई दे रहा है। स्लोमोशन में चलती कोई रील है—पुराने वक़्त की। मैं उस रील को हाथ में लेकर किसी पीले बल्ब की रोशनी के सामने ले जाता हूँ तो मुझे हमारे प्रेम के वे सारे चित्र दिखाई देते हैं जो हम जी चुके पहले कभी। किसी दूसरी रील में ख़ुद को कविताएँ लिखते देखता हूँ। तुम्हारे साथ टहलते, बातें करते, चाय पीते, गीत गुनगुनाते, बारिश में भीगते, आँसू पोंछते, तुम्हें ज़ोर से गले लगाते हुए तुम्हारे कान में कहता हूँ कि मेरे पास एक सवाल है—“सफ़र में होना क्या होता है?” जो सवाल मैं शायद ख़ुद से कर रहा हूँ।

मैं जब सफ़र में होता हूँ तो कभी कोई जवाब नहीं ढूँढ़ता। पिछले मिल चुके सारे जवाबों को एक झोले में बाँध कर साथ लिए चलता रहता हूँ और रास्ते में जब किसी नदी के पुल से गुज़रता हूँ तो चुपचाप वह झोला नदी में किसी सिक्के की तरह उछाल कर बहा देता हूँ।

तुम जब सफ़र में रहो तो बताना मुझे कि सफ़र में होना क्या होता है?

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