एक चारपाई, कुछ चेहरे और टेढ़े मुँह चाँद की ऐयारी उपस्थिति

भीतर एक बड़ी ‘कहानी कहन कार्यशाला’ चल रही थी। बाहर एक चारपाई अकेली बैठी एक कहानी गुनगुना रही थी। चैत्र की धूप की भंगिमा में झुलसाने की तपिश थी। वातावरण नीरव निस्पंद था। गुलाबी नगर के सुदूर एकांत की देह पर श्यामल उदासी के उजाले दमक रहे थे।

मैं भटकाव भरी राहों पर था तो मेरे भीतर के व्यथित अंगार मुझे दाह और आह की अनुभूतियाँ दे रहे थे। मैं जैसे ही वहाँ पहुँचा, मनोहर सुगंध का एक भभका उठा। एक बेचैनी उद्वेलित किए थी। कार्यशाला के संभाषणों और पीपीटी प्रेज़ेंटेशन के बाद मैं बाहर निकला। कुछ और भी निकले।

कई बार कोई उपस्थिति और कई बार कोई अनुपस्थित असहज करती हैं या आश्चर्यलोक बुनती है।

एक ख़ास चारपाई ने अचानक एक साथ सबका ध्यान खींचा। कथाकार-उपन्यासकार ईशमधु तलवार बोले, इसकी दावण देखो! ‘अरे’ जैसे कई शब्द अचानक वहाँ इधर-उधर से गिरे।

चारपाई की दावण दरअस्ल बीच में थी।

हतप्रभ साहित्यप्रेमी कार्तिक ने कहा : ‘‘हैरानी है, आपको पता है कि इसे दावण कहते हैं!’’

तलवार बोले, ‘देख’ ये ईस है। ये सेरू और ये पाए हैं! ये शब्द जैसे ही निकले तो फ़िल्मकार मित्र गजेंद्र श्रोत्रिय की मुस्कान उनकी दाढ़ी से उतरकर चारपाई के सिरहाने जा टिकी।

कवि, कथाकार और संस्कृतिकर्मी तथा कहानी कहन कार्यशाला के एक संयोजक प्रेमचंद गांधी पास ज़रूर थे; लेकिन उनका ध्यान चारपाई से ज़्यादा कुछ चेहरों पर अधिक था। उनके अपने चेहरे पर कहानियों के कुछ क्लाइमेक्स तैर रहे थे।

चारपाइयाँ बचपन से ही मेरा ध्यान खींच लेती हैं। भले वे कैसी ही हों। मेरी उत्ताल स्मृतियों में अचानक कई चारपाइयाँ चली आईं।

मैं दरअस्ल ‘मैं’ नहीं हूँ। मैं तो अमनेशिया का शिकार एक व्यक्ति हूँ, जिसे कभी कुछ याद ही नहीं रहता। कई डॉक्टर कह चुके कि तुम अंटीरोग्रैड के शिकार हो। स्मृतियों को सहेजने के लिए यह मेरा ‘मैं’ मोबाइल फ़ोन का इस्तिमाल करता है। कुछ याद नहीं रहता। हर नाम के साथ कुछ न कुछ संकेत अक्षर जुड़े रहते हैं। ख़ैर…!

चारपाई दरअस्ल चारपाई नहीं होती। उसके साथ एक दर्शन जुड़ा रहता है। उसका अपना इतिहास है और उसकी एक ऐतिहासिक भूमिका है। यह भारत का एक अद्भुत आविष्कार है। यह काष्ठ शिल्पकारों के उस ‘नॉलेज’ की जीवंत और साहस-गाथा है, जिसने ‘सुख’ और ‘ज्ञान’ को ब्राह्मणों के एकाधिकार से मुक्ति दिलाने का ऐतिहासिक काम किया।

यह भारत का वह आविष्कार है, जिसने आक्रमणकारी मुहम्मद बिन क़ासिम, सिकंदर, नादिरशाह और चंगेज़ ख़ान जैसे महान लुटेरों को स्तब्ध कर दिया। इन्होंने भारत की चारपाई को पाया तो लगा कि किसी महाविजय का इससे अधिक सुख और क्या होगा!

वस्तुतः हर चारपाई चाहती है, वह थोड़ा-सा सुख बाँट दे। चारपाई सुखासन की पीठिका है। चारपाई देह सुख की बहती बलखाती नदी है। चारपाई चार दिशाओं, चार वेदों और चार वर्णों का सुख है। चारपाई के चार पाए चार दिशाओं के ही नहीं, हर उस चार के अंक की जीवंत कहानी कहते हैं, जो राजा जनक के दरबार में दंभी बूढ़े विद्वान ऋषि बंदी और निर्मल मनीषा के प्रतिनिधि विद्वान बालक अष्टावक्र के बीच शास्त्रार्थ के दौरान प्रकट हुआ था।

अनदेखे आँसुओं से भरी मेरे हृदय की तगारी में गहरे अवसाद के कुछ टुकड़े थे, जो मुझे चारपाई पर नज़र आए। अचानक याद आया कबीर का पद, ‘’इक झंझर सम सूत खटोला, त्रिस्नाँ बाव चहूँ दिसि डोला।’’

कबीर को चारपाई कभी चारपाई भर नहीं लगी। उन्होंने इस खटोले में कच्चे सूत से बनी मुहब्बत देखी, ज़िंदगी परखी और क्षणभंगुरता पाई और कहा कि यह जीवन ही एक खटोला है। यह खटोला, जो तृष्णाओं की, पिपासाओं की और अनचीन्ही कामनाओं की वायु में हिचकोले खा रहा है।

चारपाई जहाँ रखी थी, वहाँ नीचे घास थी, कुछ पटरियाँ थीं और कुछ बेसबब बरसाती झील के गुस्ताख़ किनारे थे, जिन पर किसी के आगमन की प्रतीक्षा रही होगी। चारपाई को भी रही होगी। लेकिन उसकी उत्कंठा को कौन समझे!

दरअस्ल, यह चारपाई कुछ अलग थी। इस चारपाई का स्वरूप बहुत खंडित था। इसमें दावण बाईं यानी आख़िरी सिरे पर न होकर बीच में थी। यही बात थी, जो बता रही थी कि चारपाई के इस मॉडल को तय करने वाले इंसान की मानसिकता कितनी खंडित रही होगी। इस चारपाई के दो तरफ़ बैठा तो जा सकता है, लेकिन सुकून से सोया, लेटा या लतावेष्टित नहीं हुआ जा सकता।

कुछ सोचकर तलवार जी ने जानकारी दी, इसे ऐसा इसलिए बनाया गया है, ताकि ट्रक ड्राइवर दोनों तरफ़ बैठ जाएँ और बीच में पट्‌टा रखकर खाना खा लें।

परंपरागत चारपाई में एक तरफ़ दावण होती थी। बीच में पट्‌टा रखो तो एक जने को दावण पर बैठना पड़ता है। मैंने अपने ट्रक ड्राइवर दोस्त जगरूपसिंह के सामने यह मसला रखा तो वह बोला, किसी चारपाई में दावण बीच में कैसे हो सकती है! दावण तो दावण की जगह ही होगी। अब दावण को बीच में बनाओगे तो चारपाई नाराज़ न हो जाएगी! कुछ साल ‘कनेडे’ लगाकर आए जगरूपसिंह ने मेरे सहमत नहीं होने पर कहा, वड्‌डे भाई, ओ अंगरेज़ण कहा करदी सी, ‘‘यू विल मेक ए गुड गर्ल क्रेज़ी, इफ़ यू डोंट ट्रीट हर लाइक ए लेडी!’’

मैं चारपाई की बात तो भूल गया और जीवन के इस बेशकीमती सूत्र को लेकर जगरूप से रश्क कर बैठा और उसे कहा, ‘‘साले-तेरे को प्रेम का ये गुप्त स्वर्ण सूत्र मालूम है और हम आज तक इसे ही नहीं जान पाए। लानत है, हमारी शिक्षा पर और गर्व है तुम्हारी ट्रक ड्राइवरी पर!’’

जगरूपसिंह ने अब जो कहा, उसने मेरे सीने में ठीक वैसा ही दर्द पैदा कर दिया, जैसा कि पहली बार मूँज की चारपाई बनाते समय मेरी उँगलियों से लहू टपकते हुआ था। ख़ून से भीगी उँगलियों की वह चबक-चबक आजकल मेरे सपनों में अक्सर प्रतिध्वनित होती है।

जगरूपसिंह ने कहा, ‘‘हाँ, मुझे मालूम है तुम से तारों के चक्कर में चाँद रूठ जाता है।’’

मैंने कहा, ‘‘तू किन तारों की बात करता है।’’

वह कहने लगा, ‘‘हर आँसू एक तारा ही तो होता है। तू रोने बैठ जाता है और चाँद छूट जाता है।’’

मेरी एक लंबी चुप्पी के बाद वह हेलो-हेलो-हेलो करता रहा। मुझे उसकी आवाज़ आ रही थी। वह कह रहा था कि चारपाई पर लेटे रहो पंद्रा दिन। चाँद आ ही जाणा है… लेकिन उम्मीदें हैं कि हृदय में और दृढ़ होकर धड़कती हैं।

वह पंजाबी कहावत है न कि मन हरामी, हुज्जताँ ढेर! मन है, दौड़ता है, हाँफता है और फिर दौड़ता है। और फिर बेचैनी के उल्लास में डूब जाता है।

चारपाई मेरे भीतर कितनी छवियाँ उकेरती है। पब्बी कैसे बैठी थी चारपाई पर उस दिन। हाथ में वह बड़ा आदमक़द गिलास लिए। भरा हुआ हथकढ़ से। और मेरी माँ ने उस पर अपना ओढ़ना डाल दिया जब उसके ‘बापू’ को घर आते देखा। माँ को आशंका थी, पब्बी को पीते देख उसके पिता उसे बहुत मारेंगे।

वह अपनी माँ से बोली थी, मैंनूँ मुंडा छड ग्या। मैं हो:ण मरज्याणा ए! मेरा कलेजा पत्थर हो गया ए! मैं हुण नहर विच डिग पैणा ए! यानी मुझे लड़का छोड़ गया। मैं अब मर ही जाऊँगी! मैं अब नहर में डूब जाऊँगी। पब्बी कोई जवान नहीं थी। सतरह-अठारह की रही होगी। मुझसे कोई तीनेक साल बड़ी!

पब्बी की माँ ने, जो गाँव में सबसे बोल्ड, बिंदास और ब्यूटीफुल थी, कहा : लै फड़ गलास ते पा लै एके वार हेक्क’च। (ले पकड़ गिलास और उलीच ले कंठ में!) और पब्बी ने ऐसा ही किया। पब्बी की माँ ने एक गिलास मुझे भी दिया। मुझे एक तो गिलास के तरल द्रव में बहुत तीखी महक आई और दूसरे होंठों से गिलास छुआया तो मुँह से निकला : ‘‘मासी, ए तां बहोत कौड़ी ए!’’ (मौसी ये तो बहुत ही कड़वी है!)

मौसी ने शरारती भाव से कहा, ‘‘देख, ‘मिट्‌ठी’ किते मिट्‌ठी होंदी ऐ! मिट्ठी हो, चाहे कौड़ी, ए स्वाद दा नहीं, नशे ते सुलगदी मुहब्बताँ दे नाँ हैं।’’ (देखो, ना तो ‘मिट्ठी’ कभी मीठी होती है और न कभी ‘कड़वी’ कड़वी होती है। ये स्वाद के नहीं, नशे और उत्तप्त प्रेम के नाम हैं।)

वह पारदर्शी शाम झीने अँधेरे की गोद में कसमसाते हुए लुढ़क रही थी। पब्बी चारपाई पर बैठी थी। पीले पोमचे से ढकी और हाथ में गिलास। उसकी नशे में डूबी आँखें जो पीले पोमचे में से झाँक रही थी, उसकी अलग ही सुकोमल प्रभा थी। हम सब उसे ‘भैणे’ (बहन) कहते थे। बहन, जो आँसू बीनती और ऊँची बेरियों के बेर, शहतूत या लेहसुए खिलाती! चारपाई को सीढ़ी की तरह सीधा खड़ा करके पेड़ पर चढ़ने का उसका हुनर अविस्मरणीय था।

उत्तप्त प्रेम के नशे में नहाई हुई पब्बी और सण से बुनी चारपाई मुझे कभी नहीं भूलती। मेरे अमनेशिया की तहों को चीर कर ऐसे कई दृश्य फूट पड़ते हैं।

गंगानगर की मिट्‌टी की महक आते ही याद आते हैं जगजीत सिंह, ‘सौण दा महीना यारो, सौण दा महीना।’ यानी सावन का महीना यारो सावन का महीना! आसमान में मानो कोई हसीना अपने गीले केशों को झाड़ती है और इस वजह से सावन में हमें बार-बार कोठे की छत पर से चारपाई को उतारना पड़ता है। और हम कभी अपनी चारपाई की दावण ढीली करते हैं और कभी कसते हैं। बारिश के दिनों में वातावरण गीला रहता है और इस वजह से चारपाई की दावण स्वत: इतनी कस जाती है कि सूत या मूँज की चारपाई पर सोना काठ के पलंग पर सोने जैसा लगता है।

मैंने कई बार गाँव में यह भी देखा कि अँधेरा घिरते ही कुछ युगल अपनी चारपाइयों की दावण निकाल दिया करते थे। यह रहस्य वर्षों बाद समझ आया कि जब किसी के वर्षों तक लड़का नहीं हो तो दावण निकली चारपाई पर ही युगल सोता है। चारपाई जेठ के दिनों में चैत और आषाढ़ की रातों में फाल्गुन के रंग भर देती है। हम जब मुँह अँधेरे उठकर गाँव में दौड़ लगा रहे होते तो कई युगल अपनी दावण कस रहे होते थे। हम देखते तो वे कभी झल्लाते, कभी लजाते और कभी खिलखिलाते!

कई बार जीत की दुकान पर मैंने कसी हुई बनाम ढीली दावण वाली चारपाई की रसवंती चर्चाएँ सुनीं। तरुणाई की फूटती कोंपलों के वे दिन गंगनहर में नहाते या सुलेमान की हैड पर विशालकाय नभस्पर्शी बरगदों और पीपलों की छाया में बीतते। यहाँ चारपाइयों का मेला लगा होता था और सुदूर गाँवों से लोग दुपहर में सोने आते थे। यह सिंचाई विभाग का मुख्यालय था, जहाँ इंजीनियरों और बेलदारों में बहसें हुआ करती थीं।

एक बार एक इंजीनियर ने डबल बेड मँगवाया था तो पूरा गाँव उसे देखने उमड़ पड़ा था। उस दिन सुलेमान की हैड पर बहस का विषय ही था : चारपाई और डबल बेड!

चारपाई कह रही थी कि डबल बेड पूँजीवादी अपसंस्कृति का प्रतीक है और चारपाई शुद्ध सर्वहारा जीवन पद्धति। डबल बेड गुलाम बना लेता है और जो माँ-बाप दहेज में बेटी को चारपाई के बजाय डबल बेड देते हैं, उसके सच्चे सुख को नष्ट कर देते हैं। डबल बेड एक फिसलपट्‌टी है और चारपाई जीवन के सच्चे सुख के लिए सहस्राब्दियों के अनुभव से तैयार एक चरमसुखदायी आसन यंत्र!

पुराने समय में दहेज में चारपाई अवश्य दी जाती थी। एक व्यक्ति बहुत ग़रीब था तो वह दहेज में चारपाई नहीं दे पाया। लड़के के पिता ने बहुत ज़िद की कि चारपाई तो दे! आख़िर लड़की के पिता ने लड़के के पिता यानी बेटी के ससुर को एक पाया दिया और कहा :

‘‘ले पकड़ चारपाई!’’

‘‘ऐंऐंऐं!!! ये तो एक पाया है, चारपाई नहीं!’’

लड़की के पिता ने कहा : ‘‘चारपाई ही तो है। बस दो ईस नहीं, दो सेरू नहीं और तीन नहीं पाए!!!’’

लुधियाना के आलमगीर साहब गाँव में एक बार सिख गुरु गोविंदसिंह एक मंजी (चारपाई) पर कुछ क्षण सुस्ताए और वहाँ उन्हें प्यास लगी तो उन्होंने तीर चलाकर धरती से पानी निकाल दिया। तभी से वहाँ एक गुरुद्वारा बना, जिसे मंजी साहब गुरुद्वारा कहा जाता है। और पंजाब में जो-जो गुरु जहाँ-जहाँ भी चारपाइयों पर सुस्ताए, वे सबकी सब जगहें आज पवित्र घोषित हैं और वहाँ गुरुद्वारा मंजी साहब है।

कभी-कभी लगता है कि चारपाई पर शताब्दियाँ इतिहास की पोटलियाँ लेकर लेटी हैं। मानो रंग मुस्कुरा रहे हों और कलाएँ अपनी टाँगें लटका कर चारपाई पर बैठी हों।

बचपन मैंने चारपाई बुननी सीखी तो ईसरराम नायक मेरे लिए कबीर से कम न थे। उन्होंने ताना-बाना और भरनी के बारे में बताया। यह तक समझाया कि चारपाई में इंगला-पिंगला कहाँ है। वह बताते कि मनुष्य भी एक चारपाई है और यह सुसमन (सुषुम्ना) धागे से बनी है। इसमें आठ कमल दलों का चरख़ा डोलता रहता है और इसे नौ महीने तक ठोक-ठोक कर बनाया जाता है।

ईसरराम बताते कि किसी चारपाई पर कैसे-कैसे फूल उकेरे जा सकते हैं। आप चाहे चारपाई निवार से बुनो, सूत से बुनो या मूँज से या फिर सण से। मूँज की चारपाई गुरबत की निशानी थी। निवार आभिजात्यता की और सूत सुखी-समृद्ध होने की। आपको बताते चलें कि सरकंडों की पतली धारदार लंबी पत्तियों को सुखाकर उसे भिगो-भिगो कर कूटा जाता है और इसके बाद मूँज तैयार होती है। सण एक पौधा है, जिसे पानी गलाकर उसका रेशा निकाला जाता है। चारपाई अगर सूत की बुननी है तो आपको सूत ढेरिए पर कातना होता था। ढेरिए और चारपाई का जन्म जन्मांतर का रिश्ता है।

कहते हैं कि चारपाई न होती तो डबल बेड भी न होता। आज चाहे ट्रेन का स्लीपर हो या विमान की सीट, सब कुछ चारपाई की नक़ल पर ही बना है। चीन हो या जापान, जर्मनी हो या ब्रिटेन, रूस हो या अमेरिका, हर किसी ने भारतीय चारपाई की नक़ल तो की है; लेकिन वे भारतीय चारपाई जैसी चीज़ नहीं बना पाए।

पिछले दिनों एक नई तरह का इरोटिक नृत्य भी ख़बरों के बीच दबा-दबा रहा। दैहिक और भावनात्मक आत्मीयता पर आधारित यह पुरुष युगल नृत्य एक चारपाई पर होता है, जिसे ‘क्वीन साइज़’ नाम दिया गया है। भारतीय दंड संहिता की अवांछित धारा 377 को भी अंतत: एक चारपाई के सहारे अपनी मुक्ति की राह खोजनी पड़ी।

देह अपने आपमें एक स्वरों का एक झरना है। और चारपाई पर यह झरना स्वरों की एक नदी बन जाता है।

चारपाई सिर्फ़ चारपाई नहीं है। वह धागों और काठ से बनी एक सुख पीठिका है। इसके सुख का कोई ठिकाना नहीं है। हमारे गाँव के कई लोग खेत जाते थे तो अपना मंजा सिर पर साथ रखते थे। ठीक वैसे ही जैसे ‘पीकू’ की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन अपनी वैनिटी वैन में अपनी चारपाई सहेजते थे।

चारपाई ‘कहानी कहन’ कार्यशाला के बाहर ही प्रतीक्षातुर नहीं थी, वह आजकल नए पैटियो और कोर्टयार्ड्स में भी सम्मोहन बटोर रही है। चारपाई अब देस की सरहदें लाँघकर ग्लोबल हो गई है। वह अमेरिका, फ़्रांस और यूके में नए आकर्षण का केंद्र है। अभी एक मित्र बता रहे थे कि न्यू मैक्सिको का फ़ाइफ़र स्टूडियो चारपाइयों को डे-बेड के तौर पर ख़ूब बेच रहा है। एक फ़्रेंच कंपनी बन-सै ने तो चारपाइयों के पायों और रेशों को ही सम्मोहक रंगों में रँग दिया है। बेल्जियन वैलेरी बारकोव्स्की और डेनियल ब्लूर जैसे डिज़ाइनरों ने तो चारपाई की क़ीमतें 990 डॉलर तक कर दी हैं।

चारपाई से जुड़े मुहावरे भी कम नहीं हैं। पिछले दिनों शिवसेना के अख़बार ‘सामना’ ने कांग्रेस को एक पुरानी चरमराती चारपाई बताया था तो किसानों ने एलान कर दिया था कि वे मोदी सरकार की खाट खड़ी करके ही घर लौटेंगे/रहेंगे।

कहते हैं कि मुहम्मद बिन तुग़लक़ के समय 14वीं सदी में इब्नबतूता ख़ैबरपास और पेशावर के रास्ते भारत में प्रविष्ट हुआ तो उसे चारपाई ने ही सबसे ज़्यादा चकित किया था। उसने अपनी पुस्तक में लिखा है, काठ के चार पायों और चार डंडों वाली यह अद्भुत रचना गुँथी हुई ख़ूबसूरत चोटियों जैसे रेशमी धागों से ऐसे बुनी जाती है कि इस पर लेटने के बाद दुनिया में कुछ भी सुखकर नहीं है। (‘ट्रेवल्स ऑफ़ इब्नबतूता’ लंदन, पृष्ठ : 185, 317)

चारपाई का यह सुख वाक़ई अदभुत है।

प्रतिपदा के चाँद से झरता सुख कभी गहरी दाह में भी परिवर्तित होता रहता है, लेकिन चारपाई पर चाँद हो तो समूचा जीवनचक्र शीतलता में नहा उठता है।

चारपाई मुझे भ्रमित भी कर रही है कि शासकों के लिए वह कितनी दु:खद और प्रजा के सामान्य लोगों के लिए वह कितनी सुखद रही है।

आप बीकानेर जाएँगे तो पराक्रमी राजा गंगासिंह की चारपाई चौड़ाई में ज़्यादा लंबाई में महज़ पाँच फुट की मिलेगी। यानी महाराजा सोएँ तो पाँव एक फुट बाहर ही रहें! शासकों को डर सताता था कि हो न हो, कभी उनकी संगिनी ही उन्हें रस्सियों के साथ चारपाई पर बाँध दे और शत्रु से मरवा दे। उनका यह वहम बेवजह नहीं था। ऐसा हुआ भी था सच में और तभी से मेवाड़-मारवाड़ के शासकों के यहाँ चारपाइयाँ इतनी ही बड़ी होती हैं कि उनसे पाँव एक फुट बाहर लटके रहें। अब राजा ही ऐसी चारपाई पर सोएगा तो उसके दरबारी कैसे सामान्य चारपाई पर सोएँ!

दरअस्ल, शासक और दुर्निवार योद्धा राणा रणमल की हत्या 1438 में चित्तौड़ के दुर्ग में एक चारपाई पर ही हुई थी। रणमल या रिड़मल जोधपुर के संस्थापक जोधा का पिता था। प्रेमाकुल और सत्ता के नशे में चूर रणमल एक रात अपनी प्रेयसी भारमली से प्रेमालाप करके सो गया तो उसके व्यवहार से क्षुब्ध भारमली ने उसे उसी की पगड़ी से चारपाई पर कस कर बाँध दिया और शत्रुओं को संकेत कर दिया। महपा पंवार, इक्का और कुछ लोग चारपाई पर बँधे रणमल पर टूट पड़े; लेकिन रणमल इस चारपाई के साथ ही खड़े होने की कोशिश करने लगा। उसके सिरहाने पीने के पानी के लिए ताँबे का बड़ा लोटा रखा था, जिससे उसने इन तीनों हमलावरों को मार तो गिराया, लेकिन ख़ुद भी मारा गया। उसी से क़िले में मौजूद एक प्रहरी ने क़िले की दक्षिणी दीवार पर चढ़कर हाँक लगाई, ‘’ज्याँका रणमल मारिया, जोधा भाज सके तो भाज!’’ और क़िले के भीतर अंत:कक्षों में सुरक्षित सो रहे जोधा भाग निकले!

आप कह सकते हैं कि चारपाई पर बँधा न होता तो रणमल जैसा योद्धा मारा न जाता और रणमल जीवित रहते तो उनके बेटे जोधा को मंडोर न भागना पड़ता यानी चारपाई न होती तो आज जोधपुर न होता! आख़िर राव जोधा ही ने तो यह सूर्यनगरी बसाई थी।

शासकों, उनकी प्रेयसियों और चारपाइयों के क़िस्से शताब्दियों पुराने हैं। चोल देश के राजा ने चारपाई की ईसों को अपनी भुजाओं से कसकर प्रेयसी चित्रसेना को ऐसे आलिंगन में बाँधा था कि उसके प्राणपखेरू ही उड़ गए।

कुंतल देश में शतकर्ण का पुत्र शातवाहन अपनी प्रेयसी मालवंती के साथ विपरीत रति में था तो प्रेमाकुलता की लहरों और आनंदातिरेक में वह चारपाई पर असहज हो उठा। ऐसे में उसने एक हाथ में पास पड़ी क़ैंची को कसकर थाम लिया। और हिलोरें लेती मालवंती की तरबतर देह क़ैंची की नोंक पर इतनी तेज़ी से उतरी कि क़ैंची उसके कोमलांगों में पैठ गई। पुलकित और कामाकुल मालवंती श्लथ शातवाहन की देह पर ही चिरनिद्रा में लीन हो गई। और इसके बाद शातवाहन जीवन भर हा-मालवंती हा-मालवंती कहकर रोता रहा!

चारपाई का एक क़िस्सा मुझे कुछ साल पहले भाजपा नेता जसवंत सिंह ने सुनाया था। उन्होंने डिंगल कवि ईसरदास के एक प्रसिद्ध दोहे की क्या अद्भुत व्यख्या की थी :

सेल घमोड़ा किम सह्या, किम सहिया गजदंत।
कठिन पयोहर लागतां, कसमसतौ तूं कंत।।

युद्ध से लौटे वीर पति के बरछों, भालों और तलवारों से बुरी तरह घायल शव से पत्नी प्रश्न कर रही है कि तुमने ये प्रहार कैसे झेले! तुम हाथी के दाँतों के प्रहार को अपनी देह पर कैसे सह पाए! जबकि चारपाई पर तो तू मेरे उरोजों के स्पर्श भर से ही कसमसा उठता था। वीरता और शृंगार का ऐसा अनूठा समन्वय दुर्लभतम नहीं तो क्या है!

चारपाई दरअस्ल चारपाई भर नहीं होती। उसका एक साउंडट्रैक भी होता है। उसकी स्वरावली से जानकार को अंदाज़ा हो जाता है कि उस पर कमज़ोर बैठा है, ताक़तवर या सामान्य। कौन किस मुद्रा में किस कारण से, क्यों और किस भाव-भंगिमा के साथ बैठा या लेटा है या क्रीड़ा या फिर व्रीड़ारत है।

चारपाई का साउंडट्रैक पीड़ा और क्रीड़ा के भेद भी बता देता है। पीड़ा सुख की हो, दु:ख की हो, वेदना, शोक या कष्ट की हो। वह स्त्री है या पुरुष, वह स्त्री है तो किशोरी है, तरुणी है, युवती है या प्रौढ़ा! सुख के सुर अलग हैं तो चरमसुख के अलग। चारपाई की स्वरावली बूढ़े, प्रौढ़, जवान और बचपने को साफ़ पहचान लेती है।

यह चारपाई का पाया ही है, जो सशक्त और विश्वसनीय शासन के लिए पाएदार शब्द देता है। इन पायों की अपनी पाएदारी है। चारपाई आनंद, जीवंतता और प्रेमाकुलता की चीज़ है। इसीलिए यह मान्यता है कि मनुष्य को कभी चारपाई पर नहीं मरना चाहिए। उसे जिजीविषा के साथ जीते हुए जीवन के रणांगन में जूझते हुए प्राण छोड़ने चाहिए। तभी तो कोई चारपाई पर मरता है तो उसके घर के बाहर दावण वाला हिस्सा ऊपर करके चारपाई खड़ी की जाती है। चारपाई है तो चार दिशाएँ हैं। चार वर्ण हैं। उसकी आवाज़ में हृस्व स्वर भी निकलते हैं, दीर्घ, प्लुत और हल् भी। उसकी अपनी वाणी है। उसका एक पाया परा है तो दूसरा पश्यंती है, तीसरा मध्यमा है तो चौथा वैखरी।

सतलुत, चनाब, व्यास और रावी न होतीं तो शायद चारपाई का नामोनिशान नहीं होता। इसलिए चारपाई में सतलुत की कलकल भी सुनाई देती है और चनाब की चहक भी, व्यास की सुवासित धारा भी और रावी का अपार अनूठा प्रेम भी। चारपाई मेरे लिए एक सपना है—वह सपना—जिसमें से सपना निकाल दो तो सपना बचा रहे और सपना जोड़ दो तो सपने अगणित हो जाएँ।

कुछ समय से मुझे सपने बहुत आते हैं। बाजरे के सिट्‌टे का सपना भी आएगा तो वह सिट्टा उसी के हाथ में दिखाई देगा और पार्श्व से एक रूठी हँसी का झरना फूट रहा होगा।

‘कहानी कहन कार्यशाला’ के प्रवेश द्वार पर कुछ आधुनिकाओं ने अत्याधुनिक वस्त्र और ख़ूबसूरत कप सजा रखे हैं। मैं सोच रहा था, चारपाई पर मैं अपने पास सहेजे ढेर सारे सपनों की पोटलियाँ सजा दूँ और अगले दिन चाँद को सौंपकर अंतर्धान हो जाऊँ!

उस रात सपना आया तो लगा कि मेरे अछोर तक पसरे तपते मरुस्थल में कोई झील है और उसके किनारे एक चारपाई रखी है। चंद्रमा काले लिबास में चारपाई पर सो रहा है और समस्त स्त्री-पुरुष कवि कथाकार उस चारपाई पर अपनी टाँगें रखे सबके सब नीचे सो रहे हैं। आख़िर एक चारपाई पर इतने सारे लोग तो एक साथ सो नहीं सकते। और वह भी एक ख़ूबसूरत चारपाई पर एक ऐसे चंद्रमा की सम्मोहक उपस्थिति के होते हुए, जो जगमगाते अंधकार में काले वस्त्र पहने अपनी ऐयारी उपस्थिति से आसमान की बिद्ध और भीगी आँखों पर अंगार अगोरता है।

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