दिल्ली एक हृदयविदारक नगर है

‘कविता का जीवन’ असद ज़ैदी का दूसरा कविता-संग्रह है। पहला सात वर्ष हुए ‘बहनें और अन्य कविताएँ’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। इसमें 48 कविताएँ थीं। ‘कविता का जीवन’ किंचित छोटा, परंतु अधिक संगठित संग्रह है। इसमें 35 रचनाएँ हैं (पर ‘दिल्ली दर्शन’ नामक रचना छह अलग-अलग कविताओं से मिलकर बनी है और ‘कला-दर्शन’ नामक रचना के अंतर्गत तीन कविताएँ हैं)।

जिस दौर में असद ज़ैदी इस वक़्त लिख रहे हैं, उसमें कुछ और अच्छे कवि भी लगभग उसी तरह के काव्य-संघर्ष से गुज़र रहे हैं। पर इन सबमें अपनी-अपनी मौलिकता है। यह मौलिकता भाषा और शिल्प की विशिष्टता में भी दिखती है, पर भाषा-शिल्प से अधिक अर्थमय विशिष्टता इन कवियों की संसार को बदलने की आस्था में झलकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी भावना के संसार एक दूसरे से नितांत भिन्न हैं, बल्कि यह है कि ये एक दूसरे से बहुत अलग-अलग क़िस्म के जागरूक व्यक्ति हैं; जिनकी परस्पर भिन्नता उनकी आशा की झंकारों में है। उनकी दृष्टियाँ जीवन को एक ठोस मूर्ति की तरह देखने की नहीं हैं। वे निश्चित तयशुदा हलों को नहीं देखतीं; शंकाओं, अनिश्चयों और उन्हीं के बीच में गुँथी हुई आस्थाओं को, अलबत्ता कभी-कभी लहूलुहान भी, पहचानती हैं और उन्हीं से अपने प्रतिरूप मनुष्य से नाता जोड़ती हैं। इसी भेद के अनुसार उनके आत्मरूपों में भी वैसे ही ख़फ़ीफ़ भेद हैं, जैसे लोकतंत्र में उन जीवित मनुष्यों के बीच होते हैं जो एक से साँचों में ढालकर नहीं बनवाए जाते हैं। यही अंतर हम इनकी पंक्तियों में छिपी लयों में भी सुन सकते हैं, यद्यपि सरल निष्कर्षों के प्रेमी पाठक-आलोचक कहेंगे कि इनकी भाषा एक सी है।

असद ज़ैदी इस बात का बहुत सटीक उदाहरण हैं कि जैसे सभी इंसान एक से नहीं होते और सभी ख़ुशियाँ या सभी दर्द एक से नहीं होते, वैसे ही कविता में सभी सरल भाषाएँ एक सी नहीं होतीं।

असद ज़ैदी बहुत साफ़-सुथरी बोलचाल में लिखते हैं, पर उनके पात्रों के जीवन में न जाने कितने काँटे हैं जिनके कोई नाम नहीं हैं। कोई विश्लेषणवादी समीक्षक उनकी सूची बनाना चाहें तो जाने-माने दुखों की परिभाषा-दर-परिभाषा करते हुए बना लेंगे, पर इस हरकत से वे कविता की प्रतीति को उसी तरह नष्ट कर देंगे जैसे रूप-रस-गंध की प्रतीति को कोई ठस आदमी गोरा, मीठा या भीना कहकर नष्ट कर देता है। वह कभी जान भी नहीं पाता कि हर प्रतीति के साथ-साथ चलती हुई उसकी आत्मा भी है, जो बहुधा स्वाद के अंत में अनुभूत उनकी विशिष्टता की तरह अपनी पहचान करा जाती है और बहुधा उस स्वाद से उत्पन्न कही जा सकने पर भी ठीक वह नहीं; बल्कि उससे बहुत भिन्न कोई स्वाद होती है।

असद ज़ैदी के यहाँ प्रेम एक ऐसा ही अनुभव है। चाहे वह दो व्यक्तियों के बीच हो चाहे एक व्यक्ति और उसके परिवेश के बीच, इन कविताओं में हम उसे सच्चाई से अनुभव करते हैं, मगर उतना मनोहर और गोद में बिठा रखने या बनयाइन पर छाप रखने लायक़ वह नहीं है; जितना घटिया कविता में और बनावटी जीवन में मारा-मारा फिरता दीखता है। हाँ, आजिज़ी खुरदरापन उसमें है जिसे असद ज़ैदी की कविता पहली बार पढ़ने वाला नौसिखिया शायद ऊबड़खाबड़ भी कह दे; मगर वह इतना सघन, मानवीय और अद्वितीय है कि बेहतर हो कि ऐसा पाठक उसे प्रेम ही न माने।

जब मैं असद ज़ैदी के समकालीन कवियों की असहायता में उनकी आशाओं की विशिष्टता की याद दिला रहा था तो प्रकट था कि उनकी अनुभूतियों की विविधता की याद भी दिला रहा था। असद ज़ैदी की कविता में अपनापे की पहचान भी है, अकेलेपन की भी। वहाँ एक स्पंदित जीवन है, जिसमें से दोनों अनुभूतियाँ एक अनुपात में मिलजुल गई हैं, जैसे ‘कविता-पाठ’ रचना में।

माशा-माशा भर फ़र्क़ के साथ यह अनुपात, ‘कविता का सवाल’ और ‘हमारी लाचारी’ शीर्षक कविताओं से भी मिलता है और हम इन्हें पढ़कर किताब बंद कर देने के बाद सोचने लगते हैं कि अनुभूति के जिस सुथरेपन को हमने पाया है; वह क्या सुथरी सिर्फ़ इस वजह से है कि वह बारीक है और ईमानदार है, या इस वजह से भी कि उसमें दूसरे व्यक्ति के लिए सम्मान है और अपने लिए आत्मदया का निषेध। फिर यह ख़याल आता है कि ये तीनों उदाहरण कविता के संप्रेषण के अनुभवों के उदाहरण हैं और फ़ौरन यह समझ में आने लगता है कि इस कवि की आत्मदया-विहीन आत्म-चेतना कविता रचने की प्रक्रिया से एक दर्जा भिन्न कोई चीज़ है, वह कविता को दूसरे तक पहुँचाने की प्रक्रिया अथवा दूसरे में कविता पैदा करने की प्रक्रिया की सचेतता की ख़बर देती है। इस संप्रेषण के बारे में सजग होते ही पाठक असद ज़ैदी के संसार में सहजभाव से देख सकता है कि वह किन मूल्य-बोधों से बना है।

इस संग्रह की सभी कविताएँ बार-बार यह एहसास कराती हैं कि यथार्थ में से गुज़रते हुए हम अंत में जिस आस्था तक पहुँचते हैं; वह निश्चय ही मूल्यवान है, पर वह यात्रा कम मूल्यवान नहीं। कविता में मूल्य उस यात्रा के साधनों ने ही तय किए हैं—पर उन्हें जीवन के सत्य से कुछ अधिक अर्थ का एक आयाम दे दिया है। वह अधिक अर्थ उन सत्यों को कविता बनाता है, नहीं तो वे निरे मूल्य हैं।

असद ज़ैदी की ‘बहनें’ नामक कविता की याद (वह पिछले संग्रह की विशिष्ट रचना थी) ‘कविता का जीवन’ नामक संग्रह को पढ़ते हुए बार-बार आती है। ‘बहनें’ नामक संग्रह में ‘बहनें’, ‘आकाश के उसी रंग के नीचे’, ‘उद्यम’, ‘विस्मृत आवास’ और ‘मुझे यक़ीन है’ जैसी कुछ कविताओं को छोड़कर अधिकांश में एक प्रच्छन्न गीत्यात्मकता भी थी और इससे मुक्त होने की छटपटाहट भी : दोनों मिलकर उनको एक बेहतर काव्यानुभव निभाने की शक्ति देती थी।

प्रस्तुत संग्रह में ऊपर बताई पिछली कविताओं का खड़ापन अपने साथ एक विशेषता लेकर आया है—वह हर अनुभूति को इर्द-गिर्द की वस्तुस्थिति से लपेट लेता है और फिर भी खड़ा रहता है। यह ‘कविता का जीवन’ की प्रायः कविताओं में कवि ने किया है और इसी बहाने यथार्थ को आत्मसात करने का प्रामाणिक शिल्प प्रस्तुत कर दिखाया है।

असद ज़ैदी के पास निराशा, अकेलापन, ऊब, लालसा, उत्कंठा, दर्द में से कोई चीज़ शुद्ध रूप में वह चीज़ नहीं है, इसीलिए हम उनकी कविता में ये सब चीज़ें पाते हैं; मगर इनसे जो अनुभूतियाँ आज तक स्वीकृत और मान्य होती रही हैं, उनसे अधिक नई किसी अनुभूति को अपने अंदर जानते हुए पाते हैं। पाठक का उनसे बचने की कोशिश करना कविता को जानबूझकर अस्वीकार करना है।

तो क्या असद ज़ैदी कोई चालाक शिल्पी हैं और उनका उद्देश्य अपने अनुभवों के बहाने कुछ मूल्यों को समाज में स्वीकृत करा लेना है जो अन्यथा मानवविरोधी या समाजविरोधी माने जाते? इस प्रश्न का दो टूक उत्तर है : नहीं। सच तो यह है कि जब ‘दोपहर’, ‘मनुष्य की परिभाषा’, ‘मकान’ और ‘रात मैंने देखा’ जैसी कविताओं को पढ़कर किताब बंद करते हैं तो मनुष्य से अपने रिश्ते की एक समझ हमारे मन में उपजती है जो इतने संश्लिष्ट तरीक़े से समाजिक चेतना के शास्त्री नहीं समझा सकते और हम अपने को स्वाधीनता, लोकतंत्र और विश्वबंधुत्व की प्रतिज्ञा करते हुए पाते हैं; क्योंकि अपने जिस प्रतिरूप को हमने इन कविताओं में पाया है, उसका अस्तित्व इन मूल्यों से निर्मित संसार में ही संभव है। कविता के द्वारा एक नया समाज बनाने का यही मतलब और यही तरीक़ा है। इस संग्रह की उपरोक्त कविताएँ और वे कविता-संबंधी कविताएँ जिनका ज़िक्र शुरू में आया था, आपको ज़रूर पढ़ने की सलाह दूँगा और फिर आप पूरे संग्रह में यों ही खोजते और या खोते या पाते चले जा सकते हैं।

असद ज़ैदी की कविताओं के बनने की प्रक्रिया एकतरफ़ा नहीं है। आप उसे जितनी बार पढ़ेंगे, वह आपके अंदर फिर से बनेगी और अपनी ही सामग्री में से हर बार कुछ नई चीज़ों की आपको याद दिलाएगी कि आप उन्हें अपने यहाँ खोजें—और वे आपके यहाँ पहले से मौजूद या तुरंत तैयार मिलेंगी। कविता को कवि-सम्मेलन के गीतों या ग़ज़लों की तरह पढ़ने की बुरी आदत छुड़ाने के लिए असद ज़ैदी की कविताएँ पढ़ना अच्छा उपाय है।

एक और विशेष अर्थ में असद ज़ैदी के प्रयोग आधुनिक कविता को समझने के कारगर साधन हैं। असद ने छायावादोत्तर नई कविता के उस तत्त्व को अपने दोनों संग्रहों में क्रमशः अस्वीकृत कर दिया है जिसके अंतर्गत हर अनुभव का आदि, मध्य और अंत होना कविता की बुनियादी शर्त माना जाता था। निश्चय ही उस तरह भी कविता होती थी, पर शिल्प की वह बाध्यता निर्णयवादी अनुभावन की ज़रूरत थी और समाज से सरोकार की एकआयामी समझ से पैदा थी। आधुनिक कविता तब से अब तक आगे बढ़ी है तो इसीलिए कि मनुष्य के मनुष्य से रिश्ते की वह सपाट, ठस समझ अब कविता की खोजों को अपने उत्तर देने के लिए नाकाफ़ी मालूम होने लगी है और कवि ने इस समझ का और उस समझ से पैदा खोज का अनुसंधान कविता रचने वाली सामग्री के माध्यम से यानी कविता की रचना के माध्यम से करना सीख लिया है। यही कारण है कि असद ज़ैदी और उनके अधिकांश समकालीनों की कविता में से पंक्तियों के उद्धरण देना, उनकी कविता को जबरन न समझने पर ही संभव हो सकता है।

— रघुवीर सहाय

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असद ज़ैदी के दूसरे कविता-संग्रह ‘कविता का जीवन’ (राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण : 1988, पृष्ठ : 75, मूल्य : 30 रुपए) की यहाँ प्रस्तुत रघुवीर सहाय कृत यह समीक्षा ‘प्रतिपक्ष’ (सितंबर 1988) से साभार है। असद ज़ैदी का परिचय और उनकी कविताएँ यहाँ पढ़ें : असद ज़ैदी का रचना-संसार

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