मंगलेशियत का पुनर्पाठ

एक

वह अनंत यात्रा पर निकल गए हैं। यह अचानक हुआ है। हिंदी ने और कविता ने अभी उन्हें विदा करने की तैयारी नहीं कर रखी थी। अभी मृत्यु पर इधर-उधर की संस्कृतियों के कुछ फ़लसफ़े पढ़ हमारे मनों को मज़बूत किया जाना शेष था। अभी हमारी तात्कालिक चिंता एक आकस्मिक बीमारी में उपचार के लिए आर्थिक संसाधनों के किसी संधान तक सीमित रही थी। पर शायद (और शायद एक शिद्दत से बार-बार लौटता रहता है—हम तमाम लोगों के पास) वह घटित यात्राओं का रत्ती भर भेद नहीं रखना चाहते थे। वह शून्य से शुरू हुई यात्रा हो या अनंत की ओर आगे बढ़ जाना हो। यात्रा की उनकी अंतिम कविता एक आकस्मिकता के एक सिरे को पकड़ ही घटित होनी थी। वह डायरी में लिख गए—‘‘जो भी सचमुच की यात्राएँ मैंने अब तक की हैं, वे सब आकस्मिक थीं। क़रीब पच्चीस वर्ष पहले अकस्मात दिल्ली चला आया था और यहाँ से जहाँ-जहाँ गया उसमें इस ‘अकस्मात’ की काफ़ी भूमिका रही है।’’

दो

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1 दिसंबर को फ़ेसबुक पर लिखा आख़िरी कुछ। मैं गूगल सर्च पर इन शब्दों को रख इन्हें डिकोड करने की कोशिश करता हूँ। यह ऊब थी जो रह गई है—पत्थर पर कुरेदे गए नामों में दर्ज? यह पता है—पहाड़ की पगडंडी से नीचे उतरते गाँव को जाते घर का पता? यह एक आख़िरी सलाम है—बुख़ार की भाषा का दसविदानिया? नीचे लोगों की शुभकामनाएँ हैं। कवि शीघ्र स्वस्थ हो लौट आओ—कविता के घर!

तीन

दो वर्ष पूर्व की स्मृति का एक झोंका लहका है। यह स्मृति को रोज़मर्रा में बनाए रखने का फ़ेसबुकी इंतज़ाम है। खिड़की झाँकती है, अतीत का एक दृश्य खुलता है, हर्ष-विषाद-तटस्थता की एक लहर गूँजती है, अगले क्षण हम फिर अपने वर्तमान में लौट आएँगे।

क्या संयोग भर है कि मैं स्मृति से खिड़की का साम्य बिंब लेकर आया हूँ और अभी ही ‘स्मृति : एक’ शीर्षक कविता में वह स्मृति में उतर जाएँगे जहाँ ‘खिड़की की सलाख़ों से बाहर आती हुई लालटेन की रोशनी पीले फूलों जैसी’ होगी।

उन्हें फ़ेसबुक ने याद दिलाया है कि दो वर्ष पूर्व के कोलकाता में वह के. सच्चिदानंदन, अरुण कमल, राजेश जोशी के साथ कविता पढ़ लौटे हैं।

चार

वह माराडोना को विदा कहेंगे, अलविदा! माराडोना को हर उस बात से घृणा है जो अमेरिका का है, कवि के पास घृणा नहीं है, प्रेम है और प्रतिरोध है। उनके लिए वाशिंगटन आकाश से धरती पर देखी गई सबसे सुंदर जगह है। अमेरिका की धूप उन्हें काफलपानी की धूप की याद दिलाती है।

पाँच

यह नवंबर का आख़िरी हफ़्ता है। वह पलायन और प्रवास पर एक कविता संकलन तैयार करेंगे। वह कुछ और पीछे लौटेंगे तो मज़दूरिन दुर्गा के सारे चित्र साझा करेंगे। संकलन के आवरण पर फबिनी दे कुआसा रियेरा का आर्ट वर्क लेंगे। रेत और कैनवस पर बिखरे पाँवों-हथेलियों से हम पलायन और प्रवास की कविताओं में प्रवेश करेंगे, यों कहें कूद पड़ेंगे। और वह फिर ठीक दो वर्ष पीछे लौटेंगे, रात में गंगा-विहार करेंगे।

चूँकि गंगा में बहुत पानी बह चुका है, अरुंधति रॉय ‘एरोगेंट’ नहीं रह गई हैं (यह क़िस्सा बाद में अभिषेक श्रीवास्तव सुनाएँगे), चूँकि रॉय संवाद, प्रतिरोध, प्रतिबद्धता की साथी हैं—उनके जन्मदिवस पर आत्मीयता जताएँगे।

मृतकों से बातचीत का एक पोर्टल होता तो मैं पूछ लेता, सच कहिए, अरुंधति कहीं आपका भी ‘क्रश’ तो नहीं।

छह

एक दिन ज़िक्र में ज्ञानरंजन, वीरेन (डंगवाल), नीलाभ के साथ विश्व मोहन बडोला को सहेजेंगे, फिर वीएम को अपना आख़िरी सलाम भेजेंगे—‘‘वीएम यानी विश्व मोहन बडोला भी चले गए। रंगमंच, शास्त्रीय संगीत, अँग्रेज़ी पत्रकारिता और यारबाशी—उनके जीवन के ये चार स्तंभ थे। दिल्ली रंगमंच के आरंभिक दौर को गढ़ने-सँवारने में ओम शिवपुरी, सुधा शिवपुरी, सुषमा सेठ के साथ उनका बड़ा योगदान था और वीएम को जिन्होंने ‘घासीराम कोतवाल’, ‘हयवदन’, ‘अलीबाबा’ और ‘बाड़ा चिरेबंदी’ में देखा होगा, वे उनके अभिनय और गायन को भूले नहीं होंगे। …वीरेन डंगवाल तो उन्हें ‘बढ्डो’ कहता था और ज्ञानरंजन जब भी दिल्ली आते, अड्डा उनके ही घर में जमाते। दुनिया से जाना सभी को होता है, लेकिन अफ़सोस यह है कि उनके विलक्षण सुरीले गायन की रिकॉर्डिंग हम लोग नहीं कर पाए।’’

इससे कुछ पहले नेरूदा आएँगे मृत्यु की एक कविता के साथ और हमारा कवि आएगा एक अलविदा के साथ—‘‘कवि विष्णुचंद्र शर्मा, चित्रकार विनोद वर्मा, पत्रकार श्रीशचंद्र मिश्र, गुरुचरन। एक हफ़्ते के भीतर इतने आकस्मिक और दुखद निधन। अलविदा नेक इंसानो!’’

मृत्यु आती है उन सभी ध्वनियों के बीच
जैसे कोई जूता जिसमें कोई पाँव नहीं है,
जैसे कोई कपड़ा जिसमें कोई आदमी नहीं है
आता है और दरवाज़ा खटखटाता है एक ऐसी अंगूठी से,
जिसमें कोई पत्थर नहीं है,
जिसमें कोई ऊँगली नहीं है
आता है और आवाज़ लगाता है बिना मुँह के,
बिना जीभ के,
बिना किसी कंठ के।

वह इससे और बहुत पीछे अतीत में लौटेंगे तो कवि के अकेलेपन की डायरी में यह लिख छोड़ेंगे : ‘‘क्या यह सिर्फ़ संयोग है कि इधर मैंने जितनी कविताएँ लिखी हैं, उनमें से कई मृतकों के बारे में हैं—भुला दिए गए नामों को संबोधित, उनसे संवाद या उनके प्रति श्रद्धांजलि या फिर उनकी ओर से कोई वक्तव्य? …क्या जीवितों की तुलना में मृतकों से संवाद आज ज़्यादा संभव और ज़्यादा सार्थक हो गया है? …इस तरह मृतक मेरे, Conscience keeper हैं। मृतकों का अपना जीवन है जो शायद हम जीवितों से कहीं ज़्यादा सुंदर, उद्दात और मानवीय है। इतने अद्भुत लोग, और ज़िंदगी में उन्होंने कितना कुछ झेला और वह भी बिना कोई शिकायत किए। जो नहीं हैं, मैं उनकी जगह लेना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि वे मेरे मुँह से बोलें।’’

सात

सैंटोरिनी ईजियन सागर का एक द्वीप होगा जो अपनी सुंदरता में लुभाएगा एक कवि को, पुकारेगा यात्रा-वृत्तांत लेखक को।

आठ

हम आशंका की अशुभ आहट को एक सुंदर गद्य की तरह पढ़ जाएँगे। यह भी होगा कि संसार के कुछ कवि लिखेंगे—अपनी ही—मृत्यु की कुछ सबसे सुंदर कविताएँ।

‘‘बुख़ार की दुनिया भी बहुत अजीब है। वह यथार्थ से शुरू होती है और सीधे स्वप्न में चली जाती है। वह आपको इस तरह झपोड़ती है जैसे एक तीखी-तेज़ हवा आहिस्ते से पतझड़ में पेड़ के पत्तों को गिरा रही हो : वह पत्ते गिराती है और उनके गिरने का पता नहीं चलता। जब भी बुख़ार आता है, मैं अपने बचपन में चला जाता हूँ। हर बदलते मौसम के साथ बुख़ार भी बदलता था : बारिश है तो बुख़ार आ जाता था, धूप अपने साथ देह के बढ़े हुए तापमान को ले आती और जब बर्फ़ गिरती तो माँ के मुँह से यह ज़रूर निकलता, ‘अरे भाई, बर्फ़ गिरने लगी है, अब इसे ज़रूर बुख़ार आएगा…’ एक बार सर्दियों में मेरा बुख़ार इतना तेज़ हो गया कि पड़ोस की एक चाची ने कहा, ‘अरे च्छोरा, तेरा बदन तो इतना गर्म है कि मैं उस पर रोटी सेंक लूँ!’ चाची को सुनकर लोग हँस देते और मेरा बुख़ार भी हल्का होने लगता। उधर, मेरे पिता मुझे अपनी बनाई बुख़ार की कारगर दवा ज्वरांकुश देते जिसका कड़वापन लगभग असह्य था। वह गिलोय की गोली थी, लेकिन पता नहीं क्या-क्या पुट देकर इस तरह बनाई जाती थी कि और भी ज़हर बन जाती और बुख़ार उसके आगे टिक नहीं पाता था। एक बार गाँव में बुख़ार लगभग महामारी की तरह फैलने लगा तो पिता ने मरीजों को ज्वरांकुश देकर ही उसे पराजित किया। अपनी ज्वरांकुश और हाज़मा चूर्ण पर उन्हें बहुत नाज़ था जिसकी परंपरा मेरे दादा जी या उनसे भी पहले से चली आती थी। पिता कहते थे कि जड़ी-बूटियों को घोटते वक़्त असल चीज़ यह है कि उन्हें कौन सा पुट—दूध, शहद, घी, अदरक, पारा, चाँदी, सोने का—दिया जाता है। उसके अनुसार उसकी तासीर और इस्तेमाल बदल जाते हैं। बहरहाल, जब मेरा बुख़ार उतरने लगता तो मुझे उसकी आहट सुनाई देती। वह सरसरा कर उतर रहा है, बहुत आहिस्ते, जैसे साँप अपनी केंचुल उतारता है। केंचुल उतरने के बाद लगता कि शरीर बहुत हल्का हो गया है और आने वाले बुख़ारों को झेलने में समर्थ है। बुख़ार के बाद त्वचा में एक अजीब पतलापन आ जाता था और हाथ की शिराओं का नीला रंग उभर आता जिसे देर तक देखना अच्छा लगता।’’

नौ

इसके ठीक पूर्व पहाड़ से उतरती भाषा गंगा मैदान की स्त्रियों को गाती हुई सुनेगी तो एक तीसरी भाषा में सारी स्त्रियों के दुःख दर्ज करने लगेगी।

…स्त्रियाँ मीठे स्वरों में बाँचती हैं अपनी व्यथा
अपने अभागेपन की कथा
उसके भयानक शब्दों को सजाती-सँवारती हैं…

दस

मल्लिका अमर शेख़ सहेज लेंगी अपने लिए प्रशंसा का एक सरल वाक्य—‘‘मल्लिका, कभी लगता है तुम अपने पति नामदेव (ढसाळ) से भी बड़ी कवि हो।’’

ग्यारह

…और जैसे जाने की ज़रूरी तैयारियों के तहत वह फिर भी चले जाएँगे :

पिछली सर्दियों में चली गयी थी मेरी माँ
मुझसे एक प्रेमपत्र खो गया था एक नौकरी छूट गई थी
रातों को पता नहीं कहाँ-कहाँ भटकता रहा
कहाँ-कहाँ करता रहा टेलीफ़ोन

पिछली सर्दियों में
मेरी ही चीज़ें गिरती थीं मुझ पर

इन सर्दियोँ में पिछली सर्दियों के कपड़े निकालता हूँ
कंबल टोपी मोज़े मफ़लर
उन्हें ग़ौर से देखता हूँ
सोचता हुआ पिछला समय बीत गया है
ये सर्दियाँ क्यों होगी मेरे लिए पहले जैसी कठोर।

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