‘भाषा से प्रेम अब कम हुआ है’

अशोक वाजपेयी से अविनाश मिश्र की बातचीत

कवि-आलोचक-संस्कृतिकर्मी… यह अशोक वाजपेयी का एक सामान्य-सा परिचय है। अव्वल तो उन्हें किसी परिचय की दरकार नहीं है, वह अपना आप परिचय हैं। लेकिन फिर भी एक कला-कार्यकर्ता के उनके व्यक्तित्व और योगदान को अब तक हिंदी में कवि-आलोचक-संस्कृतिकर्मी कहकर संक्षिप्त किया जाता रहा है। इधर उन्हें कला-प्रशासक भी कहा जाने लगा है और ‘हिंदी सेवी’ भी। यह अब बहुत ज़ाहिर है कि उन्होंने कई संस्थाओं के निर्माण और कार्यान्वयन की बहुत नवाचार से भरी हुईं अनूठी शैलियाँ विकसित और संभव की हैं। उनकी उपस्थिति और उपलब्धियाँ भारतीय साहित्य संसार में अब कुछ इस क़दर व्याप्त हैं कि उन्हें चाहकर भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

इस संसार में—साहित्य और कलाओं के संसार में—एक बहुत सक्रिय और संपन्न आयु जी चुके अशोक वाजपेयी के साक्षात्कारों की हिंदी में कोई कमी नहीं है। वे पुस्तकों के रूप में, संकलनों और पत्रिकाओं में हद से ज़्यादा फैले हुए हैं। बावजूद इसके उनसे बात करने की आकांक्षाएँ बराबर बनी हुई हैं—तमाम असहमतियों के रहते। इस प्रकार के व्यक्तित्व हिंदी के सांस्कृतिक इलाक़े में पहले भी कम ही थे, अब भी कम ही हैं और लगातार कम होते जा रहे हैं।

यहाँ प्रस्तुत साक्षात्कार (रिकॉर्डेड) ‘पहल’ के 109वें अंक में प्रकाशित बातचीत का अत्यंत संपादित रूप है। यह जून-2017 की दो दुपहरों में मुमकिन हुआ। एक दुपहर बहुत उमस से और दूसरी वर्षा की संभावनाओं से भरी हुई थी। इस साक्षात्कार का शीर्षक ‘यह मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ’ न हो जाए, इसके लिए पर्याप्त तैयारी और सावधानी बरती गई है। उत्तर दे रहे व्यक्तित्व के चेहरे के भाव यहाँ कोष्ठक में बंद नहीं किए गए हैं, इस उम्मीद में कि उत्तर देते समय चेहरे पर चले आए दुःख और क्रोध को, चिंता और करुणा को, हास्य और व्यंग्य को, अवसाद और असहायताबोध को, प्रायश्चित और ज़िद को, मुखरता और मौन को पढ़ने वाले वैसे ही पहचान लेंगे, जैसे ‘लोगों के बीच से एक यात्रा’ करते हुए स्वयं अशोक वाजपेयी ने अपनी एक शुरुआती कविता में पहचाना था।

अशोक वाजपेयी के तमाम साक्षात्कारों के साथ-साथ उनके विपुल कविता-संसार और आलोचनात्मक काम से इस साक्षात्कार की तैयारी के दौरान गुज़रते हुए मैंने पाया कि एक अरसे से मैं अशोक वाजपेयी की काव्य-भाषा और आलोचना में आए कुछ शब्दों और मुहावरों को अनायास ही अपने कार्य-व्यवहार में बरतता आया हूँ। इस जगह आकर मैं यह सोचता हूँ कि उनसे असहमति आयु के साथ-साथ बढ़ती-घटती रही है, लेकिन उस असर का मैं क्या करूँ जो कृतज्ञ होने का अवकाश दिए बग़ैर मुझे माँजता रहा है। हिंदी की दुनिया में संभवत: बहुतों के ऐसे अनुभव होंगे, उन्हें उजागर करना या न करना उनकी राजनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इस तथ्य से भला कौन इनकार करेगा कि सहित्य की विभ्राट परंपराओं में कुछ बड़े व्यक्तित्व यों भी निर्मित होते हैं—एक बहस के लिए दूर तक मजबूर करते और सवाल-जवाब के लिए उकसाते हुए। यहाँ जो मैं कह रहा हूँ, उसे शायद पूरी तरह नहीं कह पा रहा हूँ, कहने योग्य बहुत कुछ पंक्तियों के बीच भी बस रहा है। पढ़ने वाले शायद उसे पढ़ पाएँगे और यह बात इस बातचीत में भी नज़र आएगी।

— अविनाश मिश्र

अशोक वाजपेयी का स्केच │ रफ़ीक़ शाह

आपने अब तक कई साक्षात्कार दिए और लिए हैं, आपका सबसे मुश्किल साक्षात्कार कौन-सा रहा है?

मुझे याद आता है कि मैंने पोलिश कवि चेस्वाव मिवोश का एक साक्षात्कार लिया था। मैंने सारे प्रश्न उन्हें साक्षात्कार से पहले भेज दिए थे, क्योंकि वह ऐसा चाहते थे। उन्होंने जो समय तय किया था, उसमें वह बहुत तैयारी से बैठे थे। लेकिन साक्षात्कार के दरमियान उन्होंने बहुत सारे प्रश्नों के लगभग उत्तर ही नहीं दिए, या ऐसे उत्तर दिए जिनका पूछे गए प्रश्नों से कोई विशेष संबंध नहीं था। नब्बे वर्ष से ऊपर की उनकी आयु थी…

आपकी क्या आयु थी तब? यह कितने वर्ष पहले की बात है?

यह आज से क़रीब दस बरस पहले की बात है। मैंने उनके कई साक्षात्कार और कविताएँ पढ़कर कुछ प्रश्न तैयार किए थे, लेकिन वह उस रोज़ अपनी रौ में थे। मैं उनकी कविताओं का हिंदी में अनुवाद कर रहा था। यह साक्षात्कार उनकी हिंदी में अनूदित कविताओं की किताब में ही जाना था, लेकिन बात बनी नहीं। मैंने यह साक्षात्कार लिखकर उन्हें ई-मेल कर दिया था। इसके कुछ दिनों बाद ख़बर मिली कि उनकी मृत्यु हो गई। यह उनका अंतिम साक्षात्कार था। मुझे लगा कि इसे बचाना चाहिए। यह साक्षात्कार अंततः अँग्रेज़ी में प्रकाशित हुआ। यही एक मुश्किल साक्षात्कार था।

आपके कई रूप हैं और आपके कई साक्षात्कार पढ़ने के बाद मैंने यह ग़ौर किया कि आपके किसी भी रूप पर बात की जाए, बात एक आरोप की शक्ल ले लेती है और बाद इसके आपकी बात का एक बहुत बड़ा हिस्सा सफ़ाई देने में चला जाता है। मैं चाहता हूँ कि इस प्रकार की सफ़ाइयों से प्रस्तुत साक्षात्कार बिल्कुल मुक्त रहे। क्या इसके लिए आप मुझे कोई सुझाव देना चाहेंगे?

देखिए, मैं बहुत लक्षित व्यक्ति और अलक्षित कवि हूँ। मेरे विचार पर ज़्यादा बात की जाती है, मेरी कविता से उसे जोड़कर कम देखा जाता है और मेरी अब इसमें कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। एक ज़माना था जब मैं सुबह से शाम तक सिर्फ़ सफ़ाई ही देता रहता था। मैंने मध्य प्रदेश सरकार में रहते और अपने निर्णयों का बचाव करते हुए क़रीब तीन हज़ार नोट-शीट्स लिखी होंगी। मेरी बहुत सारी शक्ति, बहुत सारा श्रम सफ़ाई देने में गुज़रा है। जबकि ग़लतियाँ कौन नहीं करता, मैंने भी की ही होंगी। लेकिन मैंने ऐसी कोई ग़लती सार्वजनिक क्षेत्र में कभी नहीं की जिससे दूसरों का अहित हुआ हो या जिसे पतन या नैतिक चूक कहा जा सके। हाँ, कई बार रुचि का फेर ज़रूर हो जाता है।

कृष्ण बलदेव वैद ने अपनी डायरी में एक जगह आपका ज़िक्र लाते हुए कहा है कि आप जिस दौड़-भाग—अफ़सराना मसरूफ़ियत, सामाजिक और साहित्यिक सरगर्मियों और स्वभावगत उलझनों—के बीचों-बीच इतने क़िस्म के काम कर लेते हैं कि आपसे ईर्ष्या होती है। इस बयान की रौशनी में मैं आपसे यह पूछना चाहता हूँ कि आप ईर्ष्या की वजह इस परिदृश्य को कैसे दे पाते हैं?

अव्वल तो मुझे इसका कोई ख़ास इल्म नहीं है। मुझे नहीं मालूम कि लोग मुझसे ईर्ष्या करते हैं, लेकिन आप कह रहे हैं तो मान लेते हैं कि करते होंगे। शायद इसलिए करते होंगे कि उन्हें मेरी सक्रियता रास नहीं आती होगी। जबकि सच यह है कि हिंदी के अधिकांश लेखकों-पाठकों को मेरी दूसरी सक्रियताओं के बारे में न तो कुछ पता है और न ही पता करने में उनकी कोई दिलचस्पी है।

ऐसा क्यों लगता है आपको?

मसलन शास्त्रीय संगीत की जो दुनिया है, नृत्य और ललित कलाओं की जो दुनिया है… उसमें मेरी काफ़ी पैठ और पूछ-परख है। भक्तिकाल के कवियों को छोड़ दें तो छायावाद के कवियों से लेकर आधुनिक हिंदी के कवियों-लेखकों तक इस दुनिया में इतनी घुसपैठ कोई नहीं कर पाया, जितनी मैंने की। यह भी ध्यान दीजिए कि यह घुसपैठ केवल आयोजनों के स्तर तक नहीं है, बल्कि समझ के स्तर पर भी है। जबकि मुझे संगीत की तकनीक की कोई ख़ास समझ नहीं रही, ड्राइंग में मैं बहुत ख़राब रहा, नाचना मुझे आया नहीं… लेकिन सतत आस्वाद से मैंने इन सबमें अपनी समझ विकसित की और इससे मुझे एक बड़ा लाभ यह हुआ कि साहित्य की जो एक टुच्ची दुनिया है, उससे मैं बच पाया। हालाँकि ऐसा नहीं है कि बाक़ी कलाओं में ऐसी दुनियाएँ नहीं हैं, लेकिन कम से कम मुझे वहाँ उसका हिस्सा नहीं बनना पड़ा। यह सब तब है, जब मैं बहुत सारे कलाकारों का विश्वासपात्र भी रहा हूँ।

आत्मकथा लिखेंगे आप?

इसका दबाव तो बहुत है मुझ पर। कई प्रकाशक पीछे पड़े हुए हैं,लेकिन अभी तक मैंने ऐसा सोचा नहीं है। यह सोचना कि मेरे जीवन के बारे में दूसरों को जानना चाहिए, इसमें थोड़ा अहंकार है। दूसरी तरफ़ यह भी है कि पिछले पचास बरसों में भारत और भारत से बाहर मैं इतने ज़्यादा महत्त्वपूर्ण और मूर्द्धन्य महानुभावों के संपर्क में और उनमें से बहुतों के इतना क़रीब रहा हूँ कि इस वृतांत को न लिखना भी उचित न होगा। लेकिन अभी मुझे इस लिखत का कोई रूपाकार स्पष्ट नहीं है। एक ज़माने में जब मैं साठ का होने जा रहा था, तब ज़रूर मैंने ‘साठ पर साठ’ शीर्षक से एक आत्मकथात्मक पुस्तक लिखने की सोची थी। पर वह काम हो नहीं पाया।

आपको ईर्ष्या है?

मैंने इसकी कभी कोई विशेष फ़िक्र नहीं की। मेरे पास ईर्ष्या करने के लिए समय नहीं है। अगर आप कुछ और न कर रहे हों, तब ज़रूर ईर्ष्या करते रह सकते हैं।

आपको शिकायत है?

देखा जाए तो नहीं है। पहले होती थी। अब मैं सोचता हूँ कि शिकायत करने से होगा क्या? आख़िर हमारे समय के बहुत बड़े लेखकों-कलाकारों का आप उदाहरण लें : मुक्तिबोध, शमशेर, रज़ा, कुमार गंधर्व, मल्लिकार्जुन मंसूर, स्वामीनाथन… इनमें से किसी को शिकायत नहीं थी।

आपको अफ़सोस है?

अफ़सोस तो बहुत हैं। मैंने जितना किया वह मेरे लक्ष्य के आधे से भी कम है—लगभग हर क्षेत्र में। एक अफ़सोस तो सबसे व्यापक यह भी है कि हिंदी समाज में साहित्य और कलाओं के प्रति जो रुचि और लगाव पैदा करने का अभियान मैंने शुरू किया, वह पूरी तरह विफल हो गया। जब-तब उसका थोड़ा-बहुत असर पड़ता रहा, लेकिन इस समय का हिंदी समाज सर्वाधिक धर्मांध, सांप्रदायिक, घृणाप्रेरित और हिंसक समाज बन चुका है। इसमें लेखकों-कलाकारों की कोई अहमियत नहीं। शास्त्रीय संगीत के वे सारे घराने जो ज़्यादातर उत्तर भारत के हिंदी प्रदेशों में थे, अब वहाँ से उजड़ चुके हैं। अफ़सोस यही है कि मैं अकेला पड़ गया और मैं अकेले क्या-क्या कर सकता था?

आपको शौक़ है?

शौक़ तो कई हैं। एक तो यही है कि इस कथा-युग में एक भी कथा मैं नहीं लिख पाया।

आपको भय है?

भय तो कोई नहीं है, कुछ आशंकाएँ ज़रूर हैं कि जिस तरह की शक्तियाँ आज सत्तारूढ़ हैं, जैसी स्थितियाँ आज बन गई हैं उनमें लिखने की आज़ादी और अवसर तेज़ी से घटेंगे। हम लोग अपने को भाग्यशाली मानेंगे कि हमारा वक़्त इस मायने में ठीक-ठाक गुज़र गया।

आपको प्रेम है?

प्रेम तो मुझे अपार है—जीवन से, मित्रों से, पुस्तकों से, साहित्य से, कलाओं से और कुछ स्त्रियों से भी। लेकिन प्रेम जो मुझे आज घटता दीखता है, वह भाषा और दृष्टि से एक साहित्यकार का है। भाषा से प्रेम अब कम हुआ है। साहित्य हम भाषा से भाषा में भाषा के लिए लिखते हैं, लेकिन भाषा के प्रति लापरवाही आज बहुत बढ़ गई है। इन दिनों भाषा में तमाम तरह की अभद्रताएँ और असावधानियाँ हो रही हैं।

‘प्रेम खो जाएगा’ शीर्षक से प्रकाशित आपकी एक कविता प्रेम के खो जाने को उसकी नियति की तरह प्रस्तावित करती है। क्या आप मानते हैं कि प्रेम खो चुका है? इस प्रसंग में आपकी एक कविता की पंक्तियाँ ‘प्रेम आसान नहीं है/ फिर भी वही एक उम्मीद है’ भी याद आती हैं।

मेरा मानना है कि कुछ चीज़ों की अनिवार्य नियति है… वे समाप्त हो जाएँगी। जैसे जीवन की भी यह अनिवार्य नियति है कि वह ख़त्म हो जाएगा। लेकिन इस डर से आप जीना तो नहीं छोड़ देते। प्रेम के साथ भी यही है। वह क्षीण पड़ जाएगा, बदल जाएगा, खो जाएगा, ख़त्म हो जाएगा… इस डर से प्रेम करना बंद नहीं करना चाहिए। इसकी एक जुगत यह भी है कि अपने प्रेम को किसी एक चीज़ पर ही एकाग्र न किया जाए।

एक साक्षात्कार में आपने स्वयं को बहुत निर्लज्ज प्रेम-कवि कहा है? क्या आप बता सकते हैं कि हिंदी में प्रेम-कविता लिखने को निर्लज्जता समझने की शुरुआत कबसे हुई?

अगर आप हिंदी कविता के साठ के दशक को थोड़ा ध्यान से देखें, जिसमें एक तरह से मैंने काव्य-प्रवेश किया, उसमें सामाजिकता का बड़ा आतंक था। यह सामाजिकता पहले की सामाजिकता की तुलना में बहुत अलग थी और इसका ज़ोर इतना ज़्यादा था कि उसमें निजता का कोई पक्ष ही नहीं था। मैं इससे बहुत त्रस्त हुआ कि यह क्या बात हुई? दो चीज़ें एक साथ ही होती हैं। एक सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक संसार हैं जिसमें बहुत सारे घपले, घमासान, विडंबनाएँ जारी रहती हैं… दूसरी तरफ़ एक सामान्य जीवन का संसार है जिसमें आसक्ति, अभाव, कोमलता, लालित्य और ललक है। ये दोनों संसार साथ चलते हैं। कविता अगर एक को भूलकर दूसरे का वरण करे तो यह मानवीय सच्चाई को सरलीकृत करना है, क्योंकि मानवीय सच्चाई इन दोनों संसारों को मिलाने से ही बनती है।

हिंदी के सामूहिक विवेक पर आपको कितना यक़ीन है, क्या अब तक उसने आपकी उस कविता-सृष्टि के साथ न्याय किया है जिसमें ‘कहीं और’ के प्रति आग्रह और उपस्थित के प्रति अस्वीकार बहुधा झलकता है?

देखिए, अंततः तो विवेक स्थिर नहीं होता है। विवेक कई चीज़ों को कभी स्वीकार करता है, कभी नहीं भी करता है। कई चीज़ों को वह एकदम से स्वीकार कर लेता है, कई चीज़ों को वह धीरे-धीरे स्वीकार करता है। कई व्यक्तियों का यह सौभाग्य होता है कि समकालीन विवेक उन्हें स्वीकार कर लेता है, कई व्यक्तियों का यह दुर्भाग्य होता है कि समकालीन विवेक उन्हें स्वीकार नहीं कर पाता है।

आपकी कविताओं की पहली किताब प्रकाशित हुए पचास बरस से ऊपर हो गए हैं, क्या आपको लगता है कि ‘शहर अब भी संभावना है’?

अब मैं इसे इस तरह कहना चाहूँगा कि अब उम्मीद असंभव लगती है। लेकिन इसलिए ही क्योंकि वह असंभव लगती है, उसे कविता में करते रहना ज़रूरी है। यह कुछ-कुछ ऐसा ही है कि सच है हमारी आवाज़ कोई नहीं सुनता, लेकिन इसलिए हम अपनी आवाज़ उठाने से चूक तो नहीं सकते। मैं यह मानता रहा हूँ कि कविता तो प्रथमतः और अंततः उम्मीद की ही विधा है। वह संभावना और स्वप्न की विधा है। वह कल्पना और विकल्प की विधा है। इसलिए उसे कभी पूरी तरह से नष्ट नहीं किया जा सकता।

आपमें ऊब है?

बहुत है। कुछ चीज़ों से मुझे बहुत ऊब होती है। अब लगभग सभी राजनेताओं से मुझे बहुत ऊब होती है। कोई भी राजनेता मुझे अब सुनने के क़ाबिल नहीं लगता। मुझे टेलीविज़न से भी बहुत ऊब होती है। वह चार-पाँच साल हो गए मेरे घर में लगभग बंद है। हिंदी की साठ प्रतिशत पत्रिकाओं से भी मुझे बहुत ऊब होती है। वे कूड़ा हैं, लेकिन बहुत मनोयोग से निकलती हैं। वे बहुत मूर्खतापूर्ण ढंग से संपादित होती हैं और उससे भी ज़्यादा मूर्खतापूर्ण ढंग से भेजी जाती हैं। मुझे इससे भी बहुत ऊब होती है कि हिंदी में कभी कोई बहस हुई मानी ही नहीं जाती है। हम घूम-फिरकर उन्हीं चीज़ों पर, उन्हीं अवधारणाओं के साथ, वैसी ही शब्दावली में बार-बार बहस करने लगते हैं, जिन पर पहले भी कई बार बहस कर चुके हैं। बौद्धिक रिगर के अभाव से भी मुझे बहुत ऊब होती है, जैसा कि एक ज़माने में मुझे कलावादी मान लिया गया। इसके पीछे क्या अवधारणा थी, क्या साक्ष्य थे… आज तक इस पर कोई बात नहीं हुई। क्योंकि मुझे शत्रु मानना था तो मैं कलावादी हो गया। अब जब पिछले दस-बारह साल में जो कुछ हुआ, उसका प्रतिरोध करने की बारी आई तब वे कलावादी ही सबसे आगे थे जिन्हें समाजविरोधी और राजनीति में दिलचस्पी न लेने वाला कहा गया। निंदा में मिलने वाले रस से भी अब मुझे बहुत ऊब होती है और विचारों में बहुत कम दिलचस्पी और अफ़वाहों में बहुत गहरी रुचि रखने वालों से भी।

आपमें तृष्णा हैं?

‘तृष्णा तू न गई मेरे मन से।’ लेकिन मुझमें टुच्ची तृष्णाएँ नहीं हैं। पुस्तकों की तृष्णा कम नहीं होती, लेकिन यह तृष्णा नहीं होती कि उन्हें सँभालने-रखने के लिए एक बहुत बड़ा घर हो जाए।

आपमें क्रोध है?

मेरे पिता में क्रोध बहुत था। हम लोग उनसे बहुत बचते थे। कहा जाता था कि वह जिसे गाली दे दें, उसका काम होकर रहता था। उनकी डाँट के लोग बहुत आकांक्षी रहते थे। उनमें विट भी बहुत था। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है। मुझे भी आता है ग़ुस्सा। कभी-कभी बहुत ज़ोर से आता है। कभी-कभी बहुत मामूली बातों पर भी आता है।

स्थायी ग़ुस्सा है किसी बात को लेकर?

हाँ है कि इतनी कोशिशों के बावजूद यह दुनिया सुंदर, न्यायसंगत और समतापूर्ण क्यों नहीं बन सकी। इसे लेकर मेरी कविता में भी इधर काफ़ी ग़ुस्सा बढ़ा है।

आपमें ग्रंथियाँ हैं?

पता नहीं, लेकिन लोगों को लगता है कि मुझे सत्ता के निकट बने रहने का कॉम्प्लेक्स है। अव्वल तो मैंने इसके लिए कोई प्रयत्न नहीं किए। एक परीक्षा दी और उसमें उत्तीर्ण हुआ। कोई चुनाव तो कभी लड़ा नहीं। ‘बहुवचन’ के एक अंक में नामवर सिंह पर लिखते हुए मैंने सत्ता के प्रति उनकी आसक्ति का ज़िक्र किया तो किसी ने कहा कि आप तो ख़ुद सत्ता के निकट रहे हैं। लेकिन मैं तो सत्ता का अधिकारी था और मैंने इसे कभी छुपाया तो नहीं। मैंने कभी किसी राजनेता की सार्वजानिक प्रशंसा नहीं की। अर्जुन सिंह हमारे मुख्यमंत्री और संस्कृति मंत्री थे, लेकिन मैं कार्यक्रमों में कभी उन्हें धन्यवाद तक नहीं देता था। मैंने कभी किसी मंत्री को माला नहीं पहनाई। कभी अपने किसी कार्यक्रम में किसी मंत्री को आमंत्रित नहीं किया। कभी किसी राजनेता के हाथों सम्मानित नहीं हुआ।

आपने शायद कभी किसी राजनेता या मंत्री की किताब का लोकार्पण भी नहीं किया?

सवाल ही नहीं उठता।

क्या आप आत्मरत हैं?

बिल्कुल नहीं हूँ, ऐसा तो नहीं कह सकता। हर लेखक को थोड़ी आत्मरति तो चाहिए ही। लेखक बने रहने के लिए यह ज़रूरी है, लेकिन बस इतनी ही… इससे ज़्यादा नहीं। मैं अपनी बात करूँ तो कह सकता हूँ कि मैं जिन परिस्थितियों में लेखक बना रहा, ज़्यादातर लोगों को उन परिस्थितियों में लेखक बने रहना ज़रूरी नहीं लगता। मैं पैंतीस बरस भारतीय प्राशासनिक सेवा में रहा और इन पैंतीस बरसों में मैंने इस सरोकार से कभी अपने को दूर नहीं किया कि मेरा बुनियादी सरोकार साहित्य ही है। यह धीमे-धीमे हुआ कि मेरे जीवन का साहित्य के सिवाय और कोई अर्थ रह ही नहीं गया। जीवन तो भौतिक है… पैर सूज गए हैं… रात को नींद नहीं आती है… यह सब ठीक है, लेकिन मेरे लिए जीवन तो वही है जो साहित्य से साहित्य में मुझे मिला है। यह एक दूसरा जीवन है—भौतिक जीवन से अलग। मैं इस जीवन को न तो कभी भूला और न ही इसके प्रति अपार कृतज्ञता मेरे मन में कभी कम हुई। मैं जो भी हूँ साहित्य की संतान हूँ, अपने माता-पिता की संतान होने के अलावा।

क्या आप आनंदवादी हैं?

आनंदवाद का तो एक पूरा दर्शन है। मैं उस अर्थ में आनंदवादी नहीं हूँ जिस अर्थ में जयशंकर प्रसाद थे, लेकिन आनंद में मेरी दिलचस्पी है और मेरी उत्सवप्रियता को लेकर मेरा आखेट भी होता रहा है। मुझे लगता है कि जीवन उत्सव मनाने के लिए ही है और साहित्य का काम भी जीवन का उत्सव मनाना है।

आपको दो में एक चुनना पसंद नहीं है, आपने अज्ञेय और मुक्तिबोध दोनों को चुना है। आपका कृतित्व इसका साक्षी है कि आपका काम एक से नहीं चलता है, लेकिन फिर भी अगर शब्दाधिक्य या शब्दसंकोच में से कोई एक चुनना हो तो आपका चयन क्या होगा?

चुनना तो शब्दसंकोच चाहिए, पर कभी-कभी शब्दाधिक्य भी ज़रूरी होता है।

उपस्थिति या अनुपस्थिति में से कोई एक चुनना हो तो?

उपस्थिति।

और अंतर्ध्वनि या पूर्वग्रह में?

अंतर्ध्वनि।

स्तुति या क्रांति में?

दोनों नहीं, लेकिन अगर चुनना ही हो तो क्रांति।

गरिमा या आभिजात्य में?

गरिमा।

इन दिनों आपका प्रिय शब्द कौन-सा है?

साहस।

क्या कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके बारे में आप सोचते हैं कि आपसे पूछे जाएँ, लेकिन आपसे कभी पूछे नहीं गए?

मुझसे जो प्रश्न नहीं पूछे गए उनकी सूची बनाना कठिन है, लेकिन कुछ अभी सूझते हैं :

• आप कविता में विचारधारा के विरोधी रहे हैं, पर क्या उनके बिना संगत विचार संभव है?
• आप पिछले चालीस बरसों से अज्ञेय-शमशेर-मुक्तिबोध की वृहत्त्रयी पर ज़िद कर अड़े रहे हैं, यह आपकी आलोचना-दृष्टि की जड़ता या गतिहीनता का प्रमाण नहीं है?
• हिंदी आलोचना की भाषा और शैलियाँ हिंदी रचना की तुलना में कम परिवर्तित कम नवाचारी रही हैं, आप इसका क्या कारण मानते हैं?
• आपका कलाओं के प्रति रुझान और उनमें गहरी पैठ की कोशिश क्या आपको साहित्य से दूर ले गई है?
• बावजूद आपकी पैरवी के तथाकथित सृजनात्मक आलोचना की हिंदी जगत में जगह नहीं बन पाई तो आपको इसका क्या कारण लगता है?
• आपको रूपवादी माना जाता रहा है, लेकिन आपने अपनी आलोचना में रूप-विश्लेषण कम किया है? यह विपर्यास क्यों?
• आप बरसों कांग्रेसी सत्ता के साथ रहे हैं और अब भारतीय जनता पार्टी की सत्ता के घोर-मुखर विरोधी हैं। क्या इसके पीछे मुख्य तत्त्व कांग्रेस-प्रेम रहा है?
• आपने लगभग आक्रामक होकर कविता और कला में जटिलता और अमूर्तन की वकालत की है, लेकिन आपकी कविता की आलोचना में इन्हें प्रधान-तत्त्व नहीं कहा जा सकता। ऐसा क्यों?
• साहित्य में रहस्य और विस्मय क्या आपको इस समय भी प्रासंगिक लगते हैं, जबकि इनके नाम पर भयानक अत्याचार हो रहे हैं?
• इधर बढ़ी आपकी सामाजिक सक्रियता और मुखरता आपकी कविता से मेल खाती नहीं लगती, क्या आपकी कविता और सामाजिक आचरण में द्वैध है?
• आपने विधिवत आलोचना लिखने के बजाय बीस बरसों से लगातार एक अख़बारी स्तंभ लिखना तय किया, क्या इसने आपको व्यवस्थित आलोचना के मार्ग से विरत किया है?

अगर यहाँ थोड़ी जगह, थोड़ा समय और थोड़ा धीरज और होता तो इन प्रश्नों को पूछा गया मानकर इनके उत्तर ज़रूर देता… लेकिन यह साक्षात्कार पहले ही कुछ लंबा हो गया है!

इन प्रश्नों और उत्तरों के बाद भी आपसे पूछने को बहुत कुछ है… आपकी देह और गेह में रेड्यूस की गई कविता के बारे में, आपकी पूर्वग्रहयुक्त आलोचना के बारे में, आपके मददगार-उदार-लोकतांत्रिक व्यक्तित्व के बारे में, आपके संस्कृतिकर्म के बारे में, फ़ाशीवाद के इस दौर में आपके प्रतिरोध के बारे में और आपके प्रिय कवियों-लेखकों-कलाकारोंके बारे में… लेकिन मैं जो कुछ भी अब आपसे पूछूँगा वह सब आपसे अब तक कई बार पूछा जा चुका है और उसके जवाब आपकी ओर से कई बार पाए जा चुके हैं। कोई भी इस दुहराव को व्यर्थ नहीं कहेगा, लेकिन मुझे लगता है कि आपको बहुत कहना पड़ा है। बहुत लिखने के बावजूद आप भी ख़ुद को बुनियादी तौर पर एक बोलता हुआ और एक बातूनी आदमी मानते हैं। क्या आपको कभी यह नहीं लगता कि आपने कुछ कम कविता की होती, कुछ कम आलोचना की होती, कुछ कम संस्कृतिकर्म किया होता, कुछ कम कला की होती, कुछ कम संवाद किया होता तो यह आपके लिए ज़्यादा बेहतर होता?

नहीं। कम से मेरा काम नहीं चलता है, बल्कि मुझे उल्टा लगता है कि मुझे और बहुत करना चाहिए था। कम करने से काम बेहतर होता है, यह मुझे नहीं लगता है। रघुवीर सहाय की कविता-पंक्ति है : ‘कम से कम’ वाली बात न हमसे कहिए।

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