एक उपन्यास लिखने के बाद

पाकिस्तानी शिक्षाविद् आरफ़ा सईदा ज़ेहरा एक बैठक में एक विशेष प्रकार की मछली का ज़िक्र करती हैं। यह मछली सिर्फ़ पाकिस्तान के दरिया-ए-सिंध में पाई जाती है। …और दरिया-ए-सिंध के भी उस हिस्से में जहाँ उसकी रफ़्तार बहुत तेज़ होती है और वह समंदर के क़रीब हो रहा होता है, जब पानी ढलान पर होता है; यानी समंदर में गिरने-मिलने को होता है। इस मछली का नाम है—पल्ला मछली। इस मछली की ख़ासियत है कि यह पानी की मौज के ख़िलाफ़ तैरती है। पानी इसे उस तरफ़ ले जाना चाहता है, लेकिन यह इस तरफ़ आती रहती है। ज़ाहिर है कि इस प्रक्रिया में यह बेहद जिद्द-ओ-जहद से गुज़रती है और इस वजह से इसके गोश्त से ज़्यादा लज़ीज़ और कोई गोश्त नहीं होता है।

दरअस्ल, यहाँ कहने का आशय यह है कि मौज के साथ तैरने में कुछ नहीं लगता; टिकने वाला काम-ओ-नाम तब ही प्रकट और संभव होता है, जब तैरने वाले मौज के ख़िलाफ़ तैरते हैं; यानी पल्ला मछली होते-बनते हैं। हिंदी कथा-साहित्य में गए कुछ वर्षों से पल्ला मछलियाँ सिरे से ग़ायब हैं। इस युग के कथाकार—चंदेक अपवादों को छोड़ दें तो—जानते ही नहीं कि पल्ला मछली होना-बनना क्या है! वे इसमें दिमाग़ ही नहीं लगाते हैं। वे बस स्वयं को ढीला छोड़ देते हैं और एक बेस्वाद या कामचलाऊ मछली होते-बनते जाते हैं—ढीली-ढाली कथाओं का चालू गोश्त लिए हुए।

इस दृश्यशास्त्र में एक उपन्यास लिखने के बाद मैं ख़ुद से पूछता हूँ : क्या मैं पल्ला मछली हूँ?

मेरे पास इसका जवाब नहीं है। इसका जवाब मेरे गोश्त से गुज़रने वाले ही—देंगे—दे सकते हैं। लेकिन मेरे पास कुछ विचारणाएँ, कुछ विफलताएँ, कुछ विकलताएँ हैं। मैं इन्हें व्यक्त करना चाहता हूँ।

मैं जब प्रथम प्रारूप में था, मैंने महसूस किया कि अब मेरा काम रोने और धोने यानी अवसाद और आक्रोश यानी व्यर्थताबोध और व्यंग्य से नहीं चलने वाला है। मैं पहचान की माँग, उसकी राजनीति और उसके उग्रवाद से भी त्रस्त था। शक्तिवाद की निरंतरता और उसकी भ्रमपूर्ण समझ ने मेरे लिए सब तरफ़ एक खीझ उत्पन्न कर दी। मैं संसार और साहित्य के संसार में खो जाने और न पहचाने जाने की अभिव्यक्तियाँ चाहने लगा। मैं इस आत्मदायित्व में इस पुराने उद्धरण से अत्यंत सहमत रहा आया कि पहचान लिए जाने के बाद आप अपनी छवि के ग़ुलाम बनते जाते हैं। यह सब इस क़दर होता है कि आप स्वयं को तोड़ना और बदलना बंद कर देते हैं। आप अपने प्रकाशित में अपने आस-पास की घटनाओं का बदतरीन इस्तेमाल करने लगते हैं। चीज़ें क्या हैं, यह बताने की तात्कालिकता में—वे क्या हो सकती थीं या क्या हो सकती हैं; यह बताना छूटता जाता है। आप एक रचनाकार की निगाह और धैर्य खोते जाते हैं, और उसकी भाषा और कल्पनाशीलता भी… यह सब जब आपके पास होता है, तब ही आप अपने वृत्तांत में अपने आस-पास घट रहे बदतरीन का बेहतरीन इस्तेमाल कर पाते हैं।

…यह सब कुछ प्रवचन-सा लग सकता है, लेकिन ये नुस्ख़े मैंने दूसरे प्रारूप तक आते-आते सिर्फ़ अपने लिए दर्ज किए थे।

एक उपन्यासकार का मस्तिष्क बहुत हाल के नहीं अपने पूर्वज उपन्यासकारों के पाठ और कथा-विवेक से बनता है। यहाँ एक सुविधा के लिए मान लीजिए कि अब तक हुए सुप्रतिष्ठित उपन्यासकारों के मार्ग विविध-विभिन्न सही, पर उनका केंद्रीय लक्ष्य एक ही रहा होगा—उपन्यास की अब तक प्रस्तुत-प्रचलित परिभाषाओं, कथाओं और संरचनाओं से बाहर चले जाना। इसमें सफलता या असफलता भविष्य का कष्ट है, लेकिन सार्वजनिक होने के बिल्कुल अंतिम क्षणों तक इस प्रयत्न और प्रक्रिया में बने रहना एक महत्त्वपूर्ण विचार-अनुभव है।

मेरी पीढ़ी जिसने ख़ाली बैठना बंद कर दिया है, ऊबना और अकेले होना भी; वह इन अनुभवों से अगर कुछ अनुभव श्रेणी-स्वरूपबद्ध करे, तब वह यह जान पाएगी कि ध्यान बँटाने वाली तकनीक समय के साथ और से और ताक़तवर होती गई है। इसने कलात्मक स्वतंत्रताएँ छीन ली हैं और दे दिए गए विमर्श व हल्ले से बाहर जाना बहुत दुष्कर बना दिया है। इसने ऐसे-ऐसे प्रलोभन सामने रख दिए हैं कि सारे रचनात्मक अवकाश और लक्ष्य तिथिबाह्य और तिरोहित हो गए हैं। हिंदी में आ चुकी और आ रही पीढ़ी ने हिसाब-किताब में कमज़ोर होना छोड़ दिया है। वह ‘गणितज्ञ’ हो गई है। उसने ठग लिए जाने की सारी आशंकाएँ नष्ट कर दी हैं। वह एक-एक पल का ‘सदुपयोग’ कर रही है।

ख़ैर, खुले रास्तों का मतलब तब ही समझ में आता है; जब उन पर भीड़-भसड़ न हो, वे एकदम साफ़ हों।

…मैं उपन्यास के अब तक प्रस्तुत रूप से बग़ावत की चाह में चलने लगा। मेरे उपन्यास के तीसरे प्रारूप के एक पूर्व-समीक्षक ने कहा कि इसका पूर्ववर्ती ढूँढ़ना मुश्किल है और परवर्ती ढूँढ़ना भी मुश्किल होगा। इस कथन ने मुझे राहत दी, क्योंकि मेरे नज़दीक उपस्थित कथाओं में सिर्फ़ और सिर्फ़ आँखों देखा हाल बिखरा हुआ था। यहाँ यह समझने की ज़रूरत है कि एक कथाकार का काम आँखों देखा हाल लिखना नहीं है और न ही जो आप देखना-दिखाना चाहते हैं, उसे आँखों देखे हाल सरीखा बना-लिख देना।

संसार समाचार से बीमार है। मैं चौथे प्रारूप तक आते-आते समाचार सुनाने वालों से मुक्ति चाहने लगा। मैं ध्यान में उतर गया। मैं आत्मदीप के प्रकाश में विहार करने लगा। मैं हज़ारों वर्ष पीछे पहुँच चुका था। मैं चाहने लगा कि मुझे एक पिछड़ा हुआ और नादान लेखक माना जाए। मुझे राजनीतिक सहीपन एक छल लगने लगा।

मुझे यों लगा कि मैं दीवार से सिर फोड़ रहा हूँ। इस-इस तरह के अहल-ए-क़लम इस दौर में सक्रिय हैं कि अगर कोई उनका लिखा पढ़ने जाए तो उसे सब तरफ़ दीवारें ही दीवारें नज़र आएँ। ये दीवारें एक रचनाकार की सबसे बड़ी शत्रु हैं, और अचरज यह है कि इन्हें उसने ख़ुद खड़ा किया है और इनके आस-पास प्रतिबद्धता का घटिया फ़र्नीचर भी लगा लिया है। यहाँ सब कुछ प्रत्याशित है। रचना में प्रत्याशित बुरा तत्त्व है। रचना के शुरू में अगर बंदूक़ दिखाओ, तो उसे आख़िर तक आते-आते चलना ज़रूर चाहिए… यह एक रचनाकार कह गया है; लेकिन वह कैसे चलेगी, यह चलने से पहले पता मत चलने दो… यह भी एक रचनाकार ने ही कहा है।

लेकिन मैंने जीवन में ऐसी बहुत सारी बंदूक़ें देखी हैं जो दीवार पर टँगी ही रह गईं, वे कभी कहीं किसी पर नहीं चलीं।

इस जीवन में सिर्फ़ एक बार टकराने वाले सैकड़ों चेहरे होते हैं, उनकी कोई पृष्ठभूमि और उनसे संबद्ध कोई पूर्व-विवरण पास नहीं होता; लेकिन उनसे टकराना और उन्हें भूल जाना याद में बना रहता है। मैं उपन्यास में कुछ ऐसे ही चेहरे चाहता था, लेकिन यह मेरा शिल्प था कि मैं उन्हें ज़्यादा चाह/ला नहीं पाया। मैं एक ऐसा उपन्यास चाहता था जिसके लगभग प्रत्येक वाक्य पर काम किया गया हो, जबकि उपन्यास में प्राय: काम किए गए वाक्य बहुत सारे काम न किए गए वाक्यों के बीच यहाँ-वहाँ प्रकट होते हैं।

उपन्यास के बारे में वैसे अब तक इतना कुछ कहा जा चुका है कि जब उसका—अपनी सीमा भर—मैंने अध्ययन किया, तब पाया कि सब कुछ बहुत विरोधाभासग्रस्त है। मैंने शोर के कंकड़-पत्थर, अल्फ़ाज़ की चाँदी और ख़ामोशी के स्वर्ण से भरे हुए कितने ही उपन्यास देखे-पलटे-पढ़े। उन्होंने सामान्य और विशेष दोनों ही रूपों में मुझे प्रभावित और अंतर्विरोधयुक्त किया।

एक बड़े उपन्यासकार ने अपने वक्तव्य में कई दशक पहले यह कहा कि उपन्यास में अब सब कुछ कहा जा चुका है, उसमें अब कहने के लिए कुछ नहीं है; इसलिए उपन्यास अब बस मूलतः प्रयोग है। लेकिन कलावाद और यथार्थवाद और प्रयोगवाद के कई-कई-कई संस्करणों से परिचित होने के बाद मैंने पाया कि सारी बहस कहीं और है। उपन्यास को उपन्यास में ही बचाया जा सकता है। उपन्यास जो गपोड़ भी हैं और गल्पहीन भी, सरस भी हैं और रूखे भी, सड़ चुकी भाषा में भी हैं और न सड़ने वाली भाषा में भी…

एक आलोचक ने रचना में अनावश्यकतारहित होने पर बहुत बल दिया है। मुझे इसके प्रमाण-स्वरूप कुछ सुंदर उपन्यास नज़र आए, लेकिन मैं अनावश्यकतारहित होने से सहमत हो पाता कि तभी मुझे अनावश्यक ब्योरों से भरे हुए कई आवश्यक उपन्यास भी नज़र आए।

एक कवि-लेखक ने कहा कि यह उपन्यास की एक ज़रूरी माँग है कि उसमें बहुत सारा आना-जाना, उठना-बैठना, खाना-पीना, जानना-समझना, खोना-पाना शामिल हो। मुझे इसके प्रमाण-स्वरूप भी उपन्यास की शक्ल में बहुत कुछ मिला; लेकिन इसका द्वंद्व रचने वाले भी बहुत सारे उपन्यास सामने आए।

एक बहुत सम्मानित उपन्यासकार को पढ़ते हुए मैंने जाना कि उपन्यास दो मील के भीतर ही होता है। मुझे इसके प्रमाण-स्वरूप कई महान् उपन्यास पढ़ने पड़े। लेकिन मैं इस तथ्य से सहमत हो पाता कि कई-कई मील तक फैले हुए उपन्यासों ने मेरा रास्ता छेक लिया।

मैंने एक जगह पढ़ा कि उपन्यास और उसकी भाषा को लगभग कविताविहीन होना चाहिए। मुझे इसके प्रमाण-स्वरूप भी कई उम्दा उपन्यास मिले। लेकिन मैं इस तथ्य से भी सहमत हो पाता कि बहुत-बहुत काव्यात्मक उपन्यासों ने… पढ़ने वाले जान ही गए होंगे…

इन बयानों का बटोर मेरे लिए कहीं बाधक नहीं हुआ, पर मैं पाँचवें प्रारूप तक आते-आते बयानों से आज़ाद हो चुका था। यह मेरे प्रशिक्षण का दोष है कि मैं वस्तुओं, स्थितियों और समयों को गड्डमड्ड कर देता हूँ। इस देश-काल में ही हुए एक रचनाकार के लिए इससे ज़्यादा अफ़सोसजनक और कुछ नहीं है कि उसके बारे में यह कहना पड़े कि उसकी रचना को उसके देश-काल का ध्यान रखते हुए पढ़ें। समय की गति अब सचमुच तेज़ है। वह अब लगभग नहीं सचमुच रेत है। एक समय से मैं ख़ुद को बहुत वृद्ध महसूस करता आया हूँ। यह सोचकर कि समय बहुत कम है, मैं इस मरणशील संसार में चयनशील होना चाहता रहा हूँ।

मैंने अपने उपन्यास के लिए जो प्रकाशन-वर्ष चुना है, वह संयोग से हिंदी उपन्यास के लिए एक ऐतिहासिक वर्ष है। मैं यहाँ तथ्यपरक विवरणों और नामोल्लेख में नहीं गया हूँ, नहीं जाऊँगा। मैं पढ़ने वालों को हमेशा लिखने वालों से ज़्यादा बुद्धिमय मानता हूँ। इस ऐतिहासिक वर्ष में लिखने वाले ने कहा कि उसने नए वाक्य गढ़े हैं, पढ़ने वालों ने कहा कि वाक्य पढ़े नहीं जा रहे हैं। इस ऐतिहासिक वर्ष में लिखने वाले ने कहा कि उसने बोलचाल के गद्य में कुछ कहा है, पढ़ने वालों ने कहा कि हम ऐसे नहीं बोलते हैं। इस ऐतिहासिक वर्ष में लिखने वाले ने कहा कि आप मत पढ़िए, पढ़ने वालों ने कहा कि नहीं हम आपको ख़रीद तो सकते ही हैं।

यहाँ यह कह सकते हैं कि दोनों तरफ़ आस्वाद की कमी है।

मैं कम नमक की शिकायत करता हूँ और पल्ला मछली बनने का आग्रह… धन्यवाद!

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