सफलता एक निरर्थक शब्द है दोस्त

एक बहुत ही निजी, मासूम और पवित्र भाषा के लिए बधाई! काफ़ी दिनों बाद इतना निजी और अल्हड़ गद्य पढ़ा। सोचने लगा कि बहुत सारी समझदारी ने कहीं हमारी भाषा को ज़रूरत से ज़्यादा सार्वजनिक तो नहीं कर दिया… पता नहीं!

हमने चाहा था एक देश

समाज में उत्पन्न त्रुटियों का बड़ा ही वैज्ञानिक विकास हुआ है और इसे समझ लेने पर ही हम अपनी ओर से अपने मानव बंधुओं की मानसिकता को समझने में कामयाब हो सकते हैं, क्योंकि हमारी बुर्जुआ व्यवस्था हमें इस आर्थिक तंगी से निकाल नहीं सकती; इसीलिए इसे कोई हक़ नहीं है कि अपनी राजनैतिक व्यवस्था क़ायम रखे।

शब्द प्रतीक्षा कर सकते हैं

रिल्के के लिखे पत्रों में प्रेषित करने वाले का ‘धैर्य’ और पाने वाले की ‘प्रतीक्षा’ का शिल्प एकाकार हो गया है। दो भौगोलिक दूरियों पर रहते हुए भी पति-पत्नी के बीच ये पत्र-संवाद कला के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण के दुर्लभ दस्तावेज़ हैं, इसलिए प्रेम-पत्र के सामान्य अर्थों से पार चले जाते हैं।

जो हमें प्यारा लगता है

नवीन सागर (1948-2000) हिंदी के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कवि-कथाकार हैं। यहाँ प्रस्तुत पत्र उन्होंने अपने पुत्र अनिरुद्ध सागर को 28 अक्टूबर 1996 को भोपाल से लिखा था। अनिरुद्ध उन दिनों (1995-96) दिल्ली में सेरेमिक कलाकार पांडू रंगैया दरोज़ के पास बतौर प्रशिक्षु काम कर रहे थे। अनिरुद्ध अभी दिल्ली में ही रहते हैं और सिरेमिक माध्यम में ही काम कर रहे हैं।

‘लेखक होने का अर्थ जानना है’

शैलेश मटियानी (14 अक्टूबर 1931–24 अप्रैल 2001) हिंदी के अनूठे कथाकार हैं। उनका महत्त्व इसमें भी है कि वह सिर्फ़ कथा-कहानी-उपन्यास तक ही सीमित रहकर अपने लेखकीय कर्तव्यों की इति नहीं मानते रहे, बल्कि एक लेखक होने की ज़िम्मेदारियाँ समाज में क्या हैं, इसे भी समय-समय पर दर्ज करते रहे। उनका कथेतर गद्य इस प्रसंग में हिंदी का अप्रतिम कथेतर गद्य है। इस गद्य से ही 10 बातें यहाँ प्रस्तुत हैं :

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