कविता सीढ़ियों नहीं, छलाँगों की राह है

कविता अगर यह व्रत ले ले कि वह केवल शुद्ध होकर जिएगी, तो उस व्रत का प्रभाव कविता के अर्थ पर भी पड़ेगा, कवि की सामाजिक स्थिति पर भी पड़ेगा, साहित्य के प्रयोजन पर भी पड़ेगा।

सत्य की व्याख्या साहित्य की निष्ठा है

मेरे हृदय और मस्तिष्क में भावों और विचारों की जो आधी शताब्दी की अर्जित प्रज्ञा-पूँजी थी, उस सबको मैंने ‘वयं रक्षामः’ में झोंक दिया है। अब मेरे पास कुछ नहीं है। लुटा-पिटा-सा, ठगा-सा श्रांत-क्लांत बैठा हूँ। चाहता हूँ—अब विश्राम मिले। चिर न सही, अचिर ही। परंतु यह हवा में उड़ने का युग है।

‘मुझे सुलझे विचारों ने बार-बार मारा है’

हरिशंकर परसाई (1924–1995) का रचना-संसार समुद्र की तरह है, यह कहते हुए समादृत कथाकार-संपादक ज्ञानरंजन ने इसमें यह भी जोड़ा है कि यह कभी घटने वाला संसार नहीं है। भारतीय समय में अगस्त का महत्त्व कुछ अविस्मरणीय घटनाओं की वजह से बहुत है। इस महीने में ही भारत स्वतंत्र हुआ और इस महीने में ही स्वतंत्र भारत के एक असली चेहरे हरिशंकर परसाई का जन्म हुआ और मृत्यु भी। यहाँ हम उनके रचना-संसार से उनकी कहन का एक चयन प्रस्तुत कर रहे हैं :

डरपोक प्राणियों में सत्य भी गूँगा हो जाता है

प्रेमचंद (1880–1936) हिंदी-उर्दू एकता के हामी अप्रतिम भारतीय कथाकार हैं। यहाँ प्रस्तुत हैं उनके वृहत रचना-संसार से चुने गए उद्धरण…

रचना की महानता से ही आलोचना महान होती है

आज भी आलोचना, आलोचना के प्रत्ययों, अवधारणाओं और पारंपरिक भाषा से इतनी जकड़ी हुई है कि वह नई बन ही नहीं सकती।

जीवन का पैसेंजर सफ़र

यह नब्बे के दशक की बात है। 1994-95 के आस-पास की। हम राजस्थान विश्वविद्यालय में पढ़ा करते थे। साहित्य में रुचि रखने वाले हम कुछ दोस्तों का एक समूह जैसा बन गया था। इस समूह को हमने ‘वितान’ नाम दिया था।

लोग सिर्फ़ दिल से ही अच्छी तरह देख सकते हैं

दोस्त को भूल जाना दुःख की बात है।

मेरा संपूर्ण जीवन इच्छा का मात्र एक क्षण है

हम नफ़रत करते हुए भी, प्यार करते हैं। हम प्यार करते हुए भी सच को, गंदगी को, अँधेरे को, पाप को भूल नहीं पाते हैं। कविता हमारे लिए भावनाओं का मायाजाल नहीं है। जिनके लिए कविता ऐसी थी, वे लोग बीत चुके हैं।

उत्साह में व्यवस्था की परवाह नहीं होती

जब कोई लेखक लिखता है कि ‘वह गली को पड़ोसी नहीं कह सकता’ तब स्पष्ट लगता है कि वह कविता का मुहावरा चुराकर बोल रहा है। जासूस आलोचक के लिए यहाँ काफ़ी मसाला है, वह कहानी के ऐसे मुहावरों की जासूसी करता हुआ असली अपराधी की खोज कर सकता है।

वायरल से कविता का तापमान नापने वालों के लिए

यह पुस्तक विधिवत् लिखी गई पुस्तक नहीं है। यह पिछले छह दशकों से अशोक वाजपेयी के द्वारा कविता के बारे में समय-समय पर जो सोचा-गुना-लिखा गया, उसका पीयूष दईया द्वारा सुरुचि और सावधानी से किया गया संचयन है।

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