इलाहाबाद मेरे लिए यूटोपिया में तब्दील होता जा रहा है

इलाहाबाद मेरे लिए यूटोपिया में तब्दील होता जा रहा है। वह गड्ढों-दुचकों भरा ढचर-ढूँ शहर जहाँ ढंग की कोई जीविका तक नहीं जुटा पाए हम; आज मुझे अपने स्पर्श, रूप, रस, गंध और स्वाद में सराबोर कर रहा है।

‘कितना संक्षिप्त है प्रेम और भूलने का अरसा कितना लंबा’

तुम कविता की दुनिया में एक चमकता सितारा हो, जिसे एक युवा दूर पृथ्वी से हमेशा निहारता रहता है। उसकी इच्छा है कि उसके घर की दीवारें तुम्हारी तस्वीरों से भरी हों। भविष्य की उसकी यात्राओं में चिली का पराल शहर शामिल है, जहाँ तुम जन्मे। वह सैंटियागो की गलियों में इसलिए घूमना चाहता है, क्योंकि उसका महबूब कवि अपने अंतिम दिनों में यहाँ भटका था। वह उन दीवारों को कान लगाकर सुनना चाहता है, जहाँ तुमने अपनी प्रेमिका माटिल्डा का नाम पुकारा होगा।

गद्य की स्वरलिपि का संधान

हिंदी के काव्य-पाठ को लेकर आम राय शायद यह है कि वह काफ़ी लद्धड़ होता है जो वह है; वह निष्प्रभ होता है, जो वह है, और वह किसी काव्य-परंपरा की आख़िरी साँस गोया दम-ए-रुख़सत की निरुपायता होता है। आख़िरी बात में थोड़ा संदेह हो भी तो यह मानने में क्यों कोई मुश्किल हो कि मनहूसियत उसमें निबद्ध होती है। वह डार्क और स्याह होता है। इसकी वजह क्या यह है कि हिंदी में कविताएँ ही अक्सर डार्क होती हैं।

मैं लेखकों की तरह नहीं लिख सकता

यात्रा का कोई सिरा नहीं होता, जैसे जीवन का—यह बात उस समय और अधिक साफ़ हो जाती है, जब हम उन रास्तों से गुज़रते हैं, जो देहरादून के पहाड़ों के बदन को चीर कर बनाए गए हैं। ये रास्ते पहाड़ों की नस जान पड़ते हैं और उन पर रेंगने वाली दुनिया—उन नसों में दौड़ता ख़ून। यहाँ चारों दिशाएँ एक दिशा की तरफ़ जाती हुई प्रतीत होती हैं। कहीं खड़े हो जाओ तो समूची प्रकृति आपके मुक़ाबले में खड़ी नज़र आती है और मन में कोई आतंक-सा जन्म लेता है—ख़ुद को ‘एलियनेट’ पाने का आतंक।

‘रेशमा हमारी क़ौम को गाती हैं, किसी एक मुल्क को नहीं’

थळी से बहावलपुर, बहावलपुर से सिंध और फिर वापिस वहाँ से अपने देस तक घोड़े, ऊँट आदि का व्यापार करना जिन जिप्सी परिवारों का कामकाज था; उन्हीं में से एक परिवार में रेशमा का जन्म हुआ। ये जिप्सी परिवार क़बीलाई ढंग से अपना सामान लादे आवाजाही करते और इस आवाजाही में साथ देता उनकी ज़मीन का गीत। उन्हीं परिवारों में से एक परिवार में जन्मी ख्यात कलाकार रेशमा।

बोंगा हाथी की रचना और कालिपद कुम्भकार

यदि कालिपद कुम्भकार को किसी जादू के ज़ोर से आई.आई.टी. कानपुर में पढ़ाने का मौक़ा मिला होता तो बहुत सम्भव है कि आज हमारे देश में कुम्हारों के काम को, एक नई दिशा मिल गई होती। हो सकता है कि घर-घर में फिर से मिट्टी के पात्र इस्तेमाल में आ जाते। या कि हम दुनिया के सबसे बड़े टेराकोटा एक्सपोर्टर होते, कुछ भी सम्भव हो सकता था यदि कालिपद कुम्भकार जैसे खाँटी दिमाग़ को एक ज़्यादा बड़ी दुनिया, ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी से दो- चार होने का मौक़ा मिलता।

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