ग्रामदेवता

यह गाँव मेरा संपूर्ण भूगोल है, मेरी संपूर्ण पृथ्वी है। मैं इस पर हर जगह, हर क़दम नृत्य करना चाहता हूँ। मैं इस घर की परिक्रमा करूँगा कहकर—वह घर की परिक्रमा करने लगे। जब दरवाज़े से थोड़ा नीचे उतरते तो नाली के पास आकर ठिठक जाते। ज़मीन से कुछ उठाते-से और दूर फेंक देते फिर आगे बढ़ जाते। बच्चे उनके पीछे हो-हो करके जाते, वह घुड़ककर पीछे देखते तो वे वापस लौट आते फिर वह आगे बढ़ जाते। उनकी परिक्रमा संपूर्ण थी, ठीक दरवाज़े से निकलते, नाली पर करके पीछे की गली में घुसते बग़ीचे में पहुँचकर कुछ पल रुकते और ऊपर पेड़ों की डालियों-पत्तों-फलों को ध्यान से देखते और बंकिम मुस्कान छोड़ देते।

कोशिश मत करो

बेहतर ज़िंदगी का नुस्ख़ा ज़्यादा की चिंता में नहीं है; फ़ालतू चीज़ों पर ध्यान देने में है, सिर्फ़ वास्तविक और उस समय के लिए ज़रूरी बात पर ही ध्यान दिया जाना चाहिए।

लोक के जीवन का मर्म

एक तरफ़ ऐसी सभ्यता बनाई जा रही है, जहाँ एकल परिवार का आदर्श भी अब बीते समय की बात हो चुकी है। परिवारमात्र की धारणा टूट रही है, अब व्यक्ति के अपने उपभोग-कामनाओं में आत्मेतर व्यक्ति भार सरीखा है। दूसरी ओर मिथिलेश का परिवार बहुत बड़ा है। वह परिवार की धारणा व उसके सौंदर्य को और विस्तार दे रहे हैं। इसमें पति-पत्नी-बच्चों की कौन कहे; नानी-नाना, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे तक शामिल हैं। मिथिलेश का यह घर संसार का सबसे आत्मीय वृत्त है। यह संसार से ख़ुद को काटने वाली चहारदीवारी नहीं, बल्कि अपने गिर्द संसार से संश्रय का आत्मीय अवकाश है।

कहीं जाने की इच्छा (के) लिए

मैं बहुत दिनों से एक जगह जाना चाहता हूँ। इन दिनों मेरे पास इतना अवकाश नहीं रहता कि कुछ ज़रूरी कामों के अलावा भी मैं कुछ और कर सकूँ, लेकिन उस जगह का आकर्षण ऐसा दुर्निवार है कि किसी अन्य काम में मेरा मन एकदम नहीं लगता। आलम यह है कि मैं सो नहीं पाता जब मुझे याद आती है कि मुझे वहाँ जाना है।

हमारी इच्छाएँ हमारा परिचय हैं

यह सोचकर कितना सुकून मिलता है कि जिसे हम अपनी अस्ल ज़िंदगी में नहीं पा सके उसे एक दिन भाषा में पा लेंगे या भाषा में जी लेंगे या उसे एक दिन भाषा में जीने का मौक़ा ज़रूर मिलेगा। मुझे लगता है कि भाषा एक तरह से अंतिम विकल्प है। अंतिम समाधान। अंतिम शरणस्थल। भाषा एक तिजोरी है, जहाँ हम अपनी तमाम इच्छाओं, सपनों और कामनाओं को सुरक्षित रख सकते हैं।

सात युवाओं का नज़रिया

नई पीढ़ी के लेखन से ही हिंदी साहित्य और समाज को नई ऊर्जा मिलेगी। उसे पता है कि बाजार के लिए लिखना बाज़ारू होना नहीं है। विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय युवा अपनी न केवल अपनी अस्मिता को लेकर सजग हैं, बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी को भी बख़ूबी समझ रहे हैं। वे उन ख़तरों से भी गहरे वाक़िफ़ हैं जिनको खत्म किए बिना समाज लोकतांत्रिक और समावेशी नहीं हो सकता।

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