सफलता एक निरर्थक शब्द है दोस्त

शशिभूषण द्विवेदी के पत्र मनोज कुमार पांडेय के नाम

एक बहुत ही निजी, मासूम और पवित्र भाषा के लिए बधाई! काफ़ी दिनों बाद इतना निजी और अल्हड़ गद्य पढ़ा। सोचने लगा कि बहुत सारी समझदारी ने कहीं हमारी भाषा को ज़रूरत से ज़्यादा सार्वजनिक तो नहीं कर दिया… पता नहीं!

कवित्व का निराला विवेक

भावुक कविताएँ चिल्लर संवेदना की अपेक्षा रखती हैं : दाता मुक्त, याचक ख़ुश। दोनों की अवस्थिति यथास्थिति बनी रहती है।

हमारा और उनका नुक़सान

भीगी मिट्टी की मादक ख़ुशबू ने नासिका-द्वार से घ्राणेंद्रिय पर और पक्षियों के कलहनुमा कलशोर ने कानों के परदों के मार्फ़त श्रवणेंद्रिय पर दस्तक देकर सुबह-सुबह हमें नींद-मुक्त किया। रात भर मेह बरसा था और नभ अब भी मेघाच्छादित था।

हिंदी साहित्य का मतलब

स्कूल और कॉलेज तक मैंने हिंदी को सिर्फ़ उतना ही पढ़ा जितना हमें पढ़ाया गया और जितने की ज़रूरत उस समय महूसस होती थी या यूँ कह लीजिए पेपर में लिखने मात्र के लिए जितने की ज़रूरत पड़ती थी।

रहिमन दाबे ना दबैं जानत सकल जहान

रहीम की कविता समय की कलादीर्घा में लगी हुई एक अद्भुत कला-प्रदर्शनी है। उनकी कविता में चार सौ साल पुराने भारतीय जीवन के क्लैसिक चित्र मिलते हैं। वे चित्र कलात्मक ढंग से जीवन की मर्मस्पर्शी सच्चाइयों का बयान करते हैं।

पेट, प्यार और पल्प

इस तरह की बातें मैंने कई लोगों से कई लोगों को पूछते-करते देखा है। यह एक रस्मी बात है। अगर साहित्य और लेखन के धंधे का आदमी मिलेगा तो इस तरह की बातें पूछ सकता है।

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