सफलता एक निरर्थक शब्द है दोस्त

शशिभूषण द्विवेदी के पत्र मनोज कुमार पांडेय के नाम

एक बहुत ही निजी, मासूम और पवित्र भाषा के लिए बधाई! काफ़ी दिनों बाद इतना निजी और अल्हड़ गद्य पढ़ा। सोचने लगा कि बहुत सारी समझदारी ने कहीं हमारी भाषा को ज़रूरत से ज़्यादा सार्वजनिक तो नहीं कर दिया… पता नहीं!

हिंदी साहित्य के इतिहास की क्लास

ज़िंदगी हमारी सोच के परे चलती है, यह बात हम जितनी जल्दी समझ लेते हैं, उतना ही हमारे लिए अच्छा होता है। हर बार आपकी बनाई हुई योजना काम कर जाए ऐसा नहीं होता… कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ।

उदासी जिनकी मातृभाषा है

कविताओं का सौंदर्यात्मक उद्भास दुनिया से हमारे नए संबंध-संयोजन को जन्म देता चलता है। अवलोकन बाह्य जगत के साथ अपनी अनुभूतियों और वृत्तियों का भी होता है। बाह्य जगत का अवलोकन फिर भी आसान है, आत्मावलोकन सबसे कठिन है। हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति में ही इच्छाओं की सार्थकता समझते हैं।

लिखने के बारे में

मध्यमवर्गीय आदमी की कविता और मासिक बिल में हमेशा एक अतिरिक्त उभर आता है या छूट जाता है। कवि का एक संसार होता है, आदमी का दूसरा।

शब्द प्रतीक्षा कर सकते हैं

रिल्के के लिखे पत्रों में प्रेषित करने वाले का ‘धैर्य’ और पाने वाले की ‘प्रतीक्षा’ का शिल्प एकाकार हो गया है। दो भौगोलिक दूरियों पर रहते हुए भी पति-पत्नी के बीच ये पत्र-संवाद कला के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण के दुर्लभ दस्तावेज़ हैं, इसलिए प्रेम-पत्र के सामान्य अर्थों से पार चले जाते हैं।

पुकार, जो अनंत कामनाओं का अक्षत जंगल है

कविता शब्द-संभवा है। कविता शब्दों के ज़रिए ही संभव होती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी ‘कविता क्या है’ में लिखा है कि कविता शब्दों का व्यापार है। इसलिए शब्द कवि के सबसे महत्त्वपूर्ण औज़ार होते हैं।

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