इलाहाबाद मेरे लिए यूटोपिया में तब्दील होता जा रहा है

इलाहाबाद मेरे लिए यूटोपिया में तब्दील होता जा रहा है। वह गड्ढों-दुचकों भरा ढचर-ढूँ शहर जहाँ ढंग की कोई जीविका तक नहीं जुटा पाए हम; आज मुझे अपने स्पर्श, रूप, रस, गंध और स्वाद में सराबोर कर रहा है।

अ-भाव का भाव—‘अर्थात्’

पुरानी और परिचित चीज़ों में एक आश्वस्ति होती है। नई में त्रास और रोमांच—ठीक पहले प्रेम की तरह। हम आश्वस्ति और सुरक्षा चुनते हैं; वैचारिक, आर्थिक, यौनिक सुरक्षा… जीवन का रोमांच नहीं। हम अपनी तमाम धारणाओं पर इतने निश्चित और आदतों के ऐसे पवित्रपंथी हैं, कि एक ही ढर्रे की ऊबी-सी ज़िंदगी को सत्कर्म बना लिया है।

उनकी ऊँचाई, मेरी जिज्ञासाओं और शंकाओं से ऊपर है

कविताएँ इधर लगभग नहीं ही लिखीं। अनुभूति-क्षणों के आकलन और अभिव्यक्ति की प्रक्रिया शायद कुछ और राहों की ओर मुड़ पड़ी हो, शायद अधिक व्यापक और प्रभविष्णु धरातलों को खोज रही हो। खोज की सफलता या सार्थकता का आश्वासन अभी से कैसे—और क्यों—दिया जाए?

किट्टू की कहानी

मुझे लगा था कि मुझे बग़ावत करनी होगी, जिसके लिए मैंने ख़ुद को तैयार भी कर लिया था। मैंने अपने दिमाग़ में कई आगामी बहसें जीत ली थीं। पर यह सब कुछ बस हो गया। क्या तुम्हारे साथ ऐसा हुआ है? जब तुम सोचो कि तुम्हें झुकना ही नहीं है, पर अचानक कोई लड़ाई ही न लड़नी पड़े।

याद करने की कोशिश करता हूँ तो याद आता है

चाहे जितने भी दिन हो, एक दिन सब ख़त्म हो जाते हैं। ख़त्म होने के सिवा उनके पास कोई और चारा भी तो नहीं होता। यह समय कभी रुकेगा? हो सकता है, कोई कहीं कल्पना करके थोड़ी देर के लिए ऐसा कर पाए। उस कल्पना के बाहर ऐसा होता हुआ नहीं लगता। सब इसी धरती के घूमने के बाद सुलझ जाता है। कहीं कोई प्रश्न, शंका कुछ भी आड़े नहीं आता। यह निरुत्तर होने और सब प्रश्नों के उत्तर मिलने जैसा वाक्य बन गया है।

अक्टूबर हर पेड़ का सपना है

वह पतझड़ का मौसम था। सारी पत्तियों ने उस पेड़ का साथ छोड़ दिया था। मुझे लगा मेरा मन उस पेड़ पर लगी कोई ताज़ा हरे रंग की पत्ती है, जिसके साथ का सपना पेड़ हर अक्टूबर में देखता है।

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