याद करने की कोशिश करता हूँ तो याद आता है

चाहे जितने भी दिन हो, एक दिन सब ख़त्म हो जाते हैं। ख़त्म होने के सिवा उनके पास कोई और चारा भी तो नहीं होता। यह समय कभी रुकेगा? हो सकता है, कोई कहीं कल्पना करके थोड़ी देर के लिए ऐसा कर पाए। उस कल्पना के बाहर ऐसा होता हुआ नहीं लगता। सब इसी धरती के घूमने के बाद सुलझ जाता है। कहीं कोई प्रश्न, शंका कुछ भी आड़े नहीं आता। यह निरुत्तर होने और सब प्रश्नों के उत्तर मिलने जैसा वाक्य बन गया है।

कबीर अपनी उपमा आप हैं

कबीर की पिछली जयंती पर कबीरचौरा मठ ने हमेशा की तरह बनारस में एक धड़कता हुआ आयोजन किया था, जिसमें और चीज़ों के अलावा एक सत्र में कुछ अच्छी बातचीत भी हुई। यहाँ प्रस्तुत नोट्स उसी सत्र में लिए गए हैं।

गढ़ंत एक सुंदर शब्द है!

पहले मैं जिस आशय के अनुरचना-से कार्य को ‘पढ़ते-पढ़ते’ के किसी खाँचे में रखना चाहता था, उसे ‘पढ़ते-गढ़ते’ के खाँचे में रखा। यह मैंने ज्ञानेंद्रपति से लिया।

बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाए-2

टी. एस. एलिएट की एक कविता-पंक्ति है : ‘बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाए?’ इस पंक्ति को शीर्षक बनाकर समादृत कवि-आलोचक और कला-प्रशासक अशोक वाजपेयी साल 1967 में एक आलेख लिख चुके हैं। इस आलेख के केंद्र में अज्ञेय और सुमित्रानंदन पंत का तत्कालीन काव्य-व्यवहार था।

‘क़र्ज़ किस-किस नज़र के हम पर हैं’

सुधांशु फ़िरदौस से हरि कार्की की बातचीत

सुधांशु फ़िरदौस (जन्म : 1985) का वास्ता इस सदी में सामने आई हिंदी कविता की नई पीढ़ी से है। गत वर्ष उनकी कविताओं की पहली किताब ‘अधूरे स्वाँगों के दरमियान’ शीर्षक से प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक पर एक आलेख ‘हिन्दवी ब्लॉग’ पर प्रकाशित हो चुका है। इसके साथ ही सुधांशु फ़िरदौस इसक-2021 के कवि भी हैं।

इक्कीस के इक्कीस कवि

हिन्दवी ने इसक को अपनी मुख्य योजना में सम्मिलित किया है। यह हमारा वार्षिक आयोजन होने जा रहा है। इसकी शुरुआत इसक-2021 से हो रही है।

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