अपभ्रंश का दौर

हिंदी को हमेशा हिंदुस्तानियों से जोड़कर देखा गया है, जिसे बोलने वाले मुसलमान भी थे, हिंदू भी और पारसी भी। इस तरह देखें तो हिंदी का किसी दीन या मज़हब से कुछ लेना-देना नहीं था।

मूर्खता सरलता का सत्यरूप है

जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है प्रसन्नता। यह जिसने हासिल कर ली, उसका जीवन सार्थक हो गया।

क्या ज़िंदगी प्रेम का लंबा इंतज़ार है?

व्यक्तिगत समस्याएँ जहाँ तक सामाजिक हैं, सामाजिक समस्याओं के साथ ही हल हो सकती हैं। अतः व्यक्तिगत रूप से उन्हें हल करने के भ्रम का पर्दाफ़ाश किया जाना चाहिए ताकि व्यक्ति अपनी भूमिका स्पष्ट रूप से समझ सके और समाज का निर्णायक अंग बन सके।

कोरोना समय में हिंदी कविता

साल 2019 के आख़िरी महीने में दृश्य में आई कोरोना महामारी ने गत वर्ष सारे संसार को प्रभावित और विचलित किया। साहित्य का संसार भी इस आपदा से अछूता नहीं रहा। संसार की कई भाषाओं में इस दरमियान कोरोना-केंद्रित साहित्य रचा गया।

‘भाषा से प्रेम अब कम हुआ है’

अशोक वाजपेयी से अविनाश मिश्र की बातचीत

इस संसार में—साहित्य और कलाओं के संसार में—एक बहुत सक्रिय और संपन्न आयु जी चुके अशोक वाजपेयी के साक्षात्कारों की हिंदी में कोई कमी नहीं है। वे पुस्तकों के रूप में, संकलनों और पत्रिकाओं में हद से ज़्यादा फैले हुए हैं। बावजूद इसके उनसे बात करने की आकांक्षाएँ बराबर बनी हुई हैं—तमाम असहमतियों के रहते। इस प्रकार के व्यक्तित्व हिंदी के सांस्कृतिक इलाक़े में पहले भी कम ही थे, अब भी कम ही हैं और लगातार कम होते जा रहे हैं।

पहचान की ज़मीन पर

वीरू सोनकर के पास कविता में घूरकर देखने का ‘हुनर’ भले कम हो, साहस की कमी नहीं है। यह साहस ही इस कवि के लिए कविता में संभावनाएँ और दुर्घटनाएँ लेकर आता है। उसके भीतर का ग़ुस्सा संग्रह की तमाम कविताओं में मद्धम-मुखर दिखाई पड़ेगा।

ट्विटर फ़ीड

फ़ेसबुक फ़ीड