हिंदी में विश्व कविता का विश्व

गत सौ वर्षों की हिंदी कविता पर अगर एक सरसरी तब्सिरा किया जाए और यह जाँचने-जानने का यत्न किया जाए कि हमारी हिंदी दूसरी भाषाओं में उपस्थित सृजन के प्रति कितनी खुली हुई है, तब यह तथ्य एक राह की तरह प्रकट होता है कि हिंदी का संसार अपनी सीमाओं और संसाधनों के स्थायी विलाप के बावजूद एक खुला हुआ संसार है; जिसमें अपनी शक्ति भर अपने समय में कहीं पर भी किसी भी भाषा में हो रहे उल्लेखनीय सृजन को अपनी सीमाओं और संसाधनों में ले आने की सदिच्छा है।

प्रेम, दुर्घटना, छत और बीते दिन…

प्रेम जितना बराबर की चीज़ महसूस होता है, उतना है नहीं। हमें लगता है, हम बराबर चलेंगे। पर कभी बराबर चलते नहीं। हमारे प्रेम का आदर्श लैला-मजनूँ हुआ करते हैं। हममें से आधे मजनूँ हो जाना चाहते हैं। चाहते हैं कि किसी को इस हद तक इश्क़ करें कि क़ुर्बान हो जाएँ। पर उतनी न तो हिम्मत हममें हुआ करती है, न जुनून।

इस वर्ष के इक्कीस कवि

वर्ष 2021 में हमने ‘हिन्दवी’ पर ‘इसक’ के अंतर्गत ऐसे 21 कवियों की कविताएँ प्रस्तुत कीं, जिन्होंने गए इक्कीस वर्षों में हिंदी कविता संसार में अपनी अस्मिता और उपस्थिति को पाया और पुख़्ता किया। इसक—यानी ‘इक्कीसवीं सदी की कविता’ का संक्षिप्त रूप—की परिकल्पना को प्रकट और स्पष्ट करते हुए गत वर्ष हमने कहा था कि इसक हमारी मुख्य योजनाओं में सम्मिलित है और यह हमारा वार्षिक आयोजन होने जा रहा है। इस प्रसंग में ही अब प्रस्तुत है—’इसक-2022′

कहानी यहाँ से शुरू होती है

एक बादशाह था उसने बचपन से ही दीनी तालीम हासिल की। उसे फ़ुज़ूल मज़हबी रस्मो-रिवाज से चिढ़ थी। एक दिन उसने तमाम मज़ारों को तोड़ने का इरादा किया। बादशाह के आलिम दरबारियों ने क़ुरानो-हदीस के हवाले दे-देकर साबित किया कि ये शहीदों की मज़ारें हैं और शहीद चूँकि ज़िंदा होते हैं, उन्हें अल्लाह ता’ला से रिज़्क़ पहुँचता है, इसलिए मज़ारों का तोड़ना गुनाहे-अज़ीम में शामिल होगा।

अथ ‘स्ट्रेचर’ कथा

यह सच है कि मानवीय संबंधों की दुनिया इतनी विस्तृत है कि उस महासमुद्र में जब भी कोई ग़ोता लगाएगा उसे हर बार कुछ नया प्राप्त होने की संभावना क़ायम रहती है। बावजूद इसके एक लेखक के लिए इन्हें विश्लेषित या व्यक्त करते वक़्त यह इतना सरल नहीं हो पाता।

प्रसिद्धि की विडंबना

प्रसिद्धि के साथ एक मज़े की बात यह है कि जब तक प्रत्यय की तरह इसके साथ विडंबना नहीं जुड़ती, तब तक इसके छिपे हुए अर्थ हमारे सामने पूरी तरह उजागर नहीं होते। लेकिन इससे भी ज़्यादा मज़े की बात शायद यही हो सकती कि ज़्यादातर मामलों में विडंबना शोहरत का पीछा करने में ज़्यादा देर भी नहीं लगाती।

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