‘भाषा हमेशा नई होती रहती है’

अलका सरावगी से हरि कार्की की बातचीत

अलका सरावगी हिंदी की अत्यंत प्रतिष्ठित उपन्यासकार हैं। वह साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित हैं। यह पुरस्कार उन्हें उनके पहले ही उपन्यास ‘कलि-कथा : वाया बाइपास’ के लिए साल 2001 में मिला। तब से अब तक हिंदी संसार उनके नए उपन्यासों का बेसब्री से इंतिज़ार करता है।

साहित्य और आधुनिकता

कुँवर नारायण के उद्धरण

‘झूठ से सच्चाई और गहरी हो जाती है’

गजानन माधव मुक्तिबोध के उद्धरण

‘लेकिन’, ‘शायद’, ‘अगर’ नहीं…

कोई जिया नहीं पकी हुई फसलों की मृत्यु…

‘लेखक होने का अर्थ जानना है’

शैलेश मटियानी (14 अक्टूबर 1931–24 अप्रैल 2001) हिंदी के अनूठे कथाकार हैं। उनका महत्त्व इसमें भी है कि वह सिर्फ़ कथा-कहानी-उपन्यास तक ही सीमित रहकर अपने लेखकीय कर्तव्यों की इति नहीं मानते रहे, बल्कि एक लेखक होने की ज़िम्मेदारियाँ समाज में क्या हैं, इसे भी समय-समय पर दर्ज करते रहे। उनका कथेतर गद्य इस प्रसंग में हिंदी का अप्रतिम कथेतर गद्य है। इस गद्य से ही 10 बातें यहाँ प्रस्तुत हैं :

चंद्रमा के अकेलेपन के साथ अँधेरे में

”कोई यह नहीं कहे कि मैं गांधी का अनुयायी हूँ। मैं जानता हूँ कि मैं अपना कितना अपूर्ण अनुयायी हूँ।”

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