अस्सी वाया भाँग रोड बनारस

कितना अजीब है किसी घटना को काग़ज़ पर उकेरना। वर्तमान में रहते हुए अतीत की गुफाओं में उतर कर किसी पल को क़ैद कर लेना। उसे अपने हिसाब से जीने पर मजबूर कर देना। मैं कितनी बार कोशिश करता हूँ कि जो घटना बार-बार मुझे प्रभावित कर रही है उसे किसी स्मृति की तरह ही रखा जाए। लेकिन कुछ घटनाएं इतनी हठी होती हैं कि ख़ुद को काग़ज़ पर उतार कर ही दम लेती हैं। ऐसी ही एक घटना बनारस की है। मैं जिन दिनों हिन्दू विश्वविद्यालय का छात्र था। उफ़ ! ये ‘था’ कितना दिल फ़रेब है।

क्या हम परिवार को देश की तरह देख सकते हैं

परिवार में भी कोई नया आईडिया एकदम से लागू नहीं किया जा सकता। यहां भी अगर डेमोक्रेसी लागू करनी है तो सबसे पहले व्यक्ति को खुद फुल डेमोक्रेट बनना होगा अर्थात ढेर सारा धैर्य खुद में पैदा करना होगा। बिना इस धैर्य के हम कहां तक सफल हो पाएंगे? फिर तो हम अपने परिवार की दरारों को ना तो देख पाएंगे और ना ही समझ पाएंगे। जरा सी समस्या में हम परिवार से भागना शुरू कर देंगे। लेकिन यह हमारा पीछा नहीं छोड़ता।

साहित्य के दरवाज़े के द्वारपाल की भूमिका में

भाषा को तमीज़ से बरतना कविता-कर्म की बुनियादी शर्त है। अनुचित शब्द चयन कवि और कविता दोनों के लिए प्राणहंता है। कविता में किसी शब्द का कोई बदल/पर्याय नहीं होता।

एक नैतिक उपदेश

भूख और भोजन कुछ इस प्रकार के विषय हैं कि इन पर नैतिक उपदेशों की कोई कमी नहीं है। लेकिन यह समय नैतिकता और उपदेश दोनों के लिए ही कठिन है। इसकी पड़ताल की जानी चाहिए कि बाल-बच्चेदारों और गृह-त्यागियों दोनों ने ही नैतिकता और उपदेश से सलीक़े का मामला रखना बंद क्यों कर दिया!

स्मृति-छाया के बीच करुणा का विस्तार

किसी फ़िल्म को देख अगर लिखने की तलब लगे तो मैं अमूमन उसे देखने के लगभग एक-दो दिन के भीतर ही उस पर लिख देती हूँ। जी हाँ! तलब!! पसंद वाले अधिकतर काम तलब से ही तो होते हैं। लेकिन ‘लेबर डे’ को देखने के इतने दिनों (लगभग 40-50 दिनों) के बाद भी उस पर लिखा नहीं और लिखने की इच्छा ने जब पीछा नहीं छोड़ा तो शायद इस फ़िल्म से पीछा छुड़ाने के लिए लिखना जरूरी लगा।

चलो भाग चलते हैं

ये सच है कि हम हमारे गढ़े हुए तमाम संबोधनों को, दो वर्ण वाले तुकांत शब्दों को; जी नहीं पाएँगे। घर से भाग नहीं पाएँगे। भागने की तमाम वजहें हैं, हम दोनों के पास। हालाँकि भाग जाने के लिए एक वजह ही काफ़ी है। मैं तुम्हें ये नहीं समझाऊँगा कि बंदिशों और विवशताओं में कितना अंतर होता है।

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