सफलता एक निरर्थक शब्द है दोस्त

शशिभूषण द्विवेदी के पत्र मनोज कुमार पांडेय के नाम

एक बहुत ही निजी, मासूम और पवित्र भाषा के लिए बधाई! काफ़ी दिनों बाद इतना निजी और अल्हड़ गद्य पढ़ा। सोचने लगा कि बहुत सारी समझदारी ने कहीं हमारी भाषा को ज़रूरत से ज़्यादा सार्वजनिक तो नहीं कर दिया… पता नहीं!

उनके संदेश ने लोगों का नज़रिया एकदम बदल दिया

किसी महापुरुष के लिए तात्कालिक चापलूसी और लोगों द्वारा सस्ते उपहास दोनों का ही बहुत कम महत्त्व होता है और मैं जानता हूँ कि महात्माजी में यह महानता विद्यमान है।

जहाँ लड़की होना ही काफ़ी है

मुझे बचपन से ही करौली की धर्मशालाओं और अपने शहर की महिला कॉलेजों में कोई ज़्यादा फ़र्क़ समझ में नहीं आया। मुझे लगता रहा कि धर्मशालाओं की तरह ये कॉलेज भी धर्मार्थ ही खुलवा दिए गए थे, जिनसे कोई भी उम्मीद रखना गुनाह-ए-अज़ीम-सा था

उसी के पास जाओ जिसके कुत्ते हैं

मुझे पता भी नहीं चला कि कब ये कुत्ते मेरे पीछे लग गए। जब पता चला तो मैं पसीने-पसीने हो गया। मैंने कहीं पढ़ा था कि अगर कुत्ते पीछे पड़ ही जाएँ तो एकदम से भागना ख़तरनाक होता है। आप कुत्तों से तेज़ कभी नहीं दौड़ पाएँगे। कुत्ते आपको नोच डालेंगे।

प्रकृति का चरित्र और कोरोना-कारावास

कोरोना काल में लॉकडाउन के चलते इंसान के संसार के गति रुक-सी गई है; लेकिन प्रकृति अब भी कितनी सहज, सरल और सुंदर ढंग से गतिमान थी। प्रकृति का चरित्र कितना संस्कृत और सुचारु है! किसी को भी ख़लल डाले बिना, हानि पहुँचाए बिना ज़रूरत भर का लेना और लौटाना।

भूले-भटके दिन : कुछ रूमानी टुकड़े

छोड़कर चले जाने वालों की भी उतनी ही बातें याद रहती हैं, जो प्यारी थीं। रोना वही सब सोचकर तो आता है। जाने के झगड़े लंबी स्मृतियों में नहीं टिकते… कॉफ़ी में कितनी चीनी चाहिए यह सूचना रुकी रहती है… मन के क्लाउड स्टोरेज से डिलीट ही नहीं होती।

ट्विटर फ़ीड

फ़ेसबुक फ़ीड