अपभ्रंश का दौर

हिंदी को हमेशा हिंदुस्तानियों से जोड़कर देखा गया है, जिसे बोलने वाले मुसलमान भी थे, हिंदू भी और पारसी भी। इस तरह देखें तो हिंदी का किसी दीन या मज़हब से कुछ लेना-देना नहीं था।

उत्साह में व्यवस्था की परवाह नहीं होती

जब कोई लेखक लिखता है कि ‘वह गली को पड़ोसी नहीं कह सकता’ तब स्पष्ट लगता है कि वह कविता का मुहावरा चुराकर बोल रहा है। जासूस आलोचक के लिए यहाँ काफ़ी मसाला है, वह कहानी के ऐसे मुहावरों की जासूसी करता हुआ असली अपराधी की खोज कर सकता है।

वायरल से कविता का तापमान नापने वालों के लिए

यह पुस्तक विधिवत् लिखी गई पुस्तक नहीं है। यह पिछले छह दशकों से अशोक वाजपेयी के द्वारा कविता के बारे में समय-समय पर जो सोचा-गुना-लिखा गया, उसका पीयूष दईया द्वारा सुरुचि और सावधानी से किया गया संचयन है।

मेरी कोई स्त्री नहीं

सियोत से लौट आने के बाद दो दिन से खेत पर ही पड़ा हूँ। यूँ पड़ा रहना मेरे स्वभाव के विपरीत रीति है। गतिशीलता, भटकन (मन और तन दोनों की) और उत्पात में ही मेरी आभा है और मुझे सुभीता है। मैं बहुत देर तक कहीं पड़ा नहीं रह सकता और बहुत देर तक एक जगह खड़ा भी नहीं रह सकता। लेकिन छड़ा रहने का गुण (अवगुण) मैंने ख़ुद विकसित किया है और जड़ा तत्त्व मुझमें स्वभाव-गत है।

निराशा जब आती है

भागने से थकान होती है। पेड़ नहीं भागते। अपनी जगह पर खड़े रहते हैं। वे न हत्या करने जाते हैं और न अपने हत्यारों से भाग पाते हैं। मैं किसी पेड़ को नहीं जानता। तय है कि कोई पेड़ भी मुझे नहीं जानता। वे निहत्थे खड़े हैं।

आया कहाँ से ये लफ़्ज…

यह एक बहुत बड़ा भ्रम है कि हिंदी संस्कृत से निकली और उर्दू का जन्म फ़ारसी भाषा से हुआ। सच तो यह है कि ये दोनों ही ज़बानें बोलचाल की मक़ामी ज़ुबान से निकलीं और विकसित होती चली गईं। हिंदी वहाँ से शुरू हुई जहाँ से संस्कृत ख़त्म होती है।

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