सफलता एक निरर्थक शब्द है दोस्त

शशिभूषण द्विवेदी के पत्र मनोज कुमार पांडेय के नाम

एक बहुत ही निजी, मासूम और पवित्र भाषा के लिए बधाई! काफ़ी दिनों बाद इतना निजी और अल्हड़ गद्य पढ़ा। सोचने लगा कि बहुत सारी समझदारी ने कहीं हमारी भाषा को ज़रूरत से ज़्यादा सार्वजनिक तो नहीं कर दिया… पता नहीं!

विश्वनाथ शर्मा ‘विमलेश’ से सुरेंद्र शर्मा तक

उनका पूरा नाम विश्वनाथ शर्मा ‘विमलेश’ था। ‘विमलेश राजस्थानी’ भी उन्हें कहा जाता था और कवियों के बीच वह विमलेशजी के नाम से मशहूर थे। विमलेशजी की चार लाइनों और उनके पढ़ने की नक़ल करने वाले सुरेंद्र शर्मा को जानने वाले यह नहीं जानते कि छठवें और सातवें दशक के कवि-सम्मेलनों के विमलेशजी सितारा कवि थे।

हमने चाहा था एक देश

समाज में उत्पन्न त्रुटियों का बड़ा ही वैज्ञानिक विकास हुआ है और इसे समझ लेने पर ही हम अपनी ओर से अपने मानव बंधुओं की मानसिकता को समझने में कामयाब हो सकते हैं, क्योंकि हमारी बुर्जुआ व्यवस्था हमें इस आर्थिक तंगी से निकाल नहीं सकती; इसीलिए इसे कोई हक़ नहीं है कि अपनी राजनैतिक व्यवस्था क़ायम रखे।

रामवृक्ष बेनीपुरी के साथ एक सेलिब्रेशन

रामवृक्ष बेनीपुरी का जीवन और साहित्य एक ऐसे सतरंगी इंद्रधनुष की तरह है जिसमें मानव और मानवेतर संवेदनाओं का गाढ़ापन है, रूढ़ियों और जीर्ण परंपराओं से विद्रोह का तीखा रंग है, धार्मिक और सांप्रदायिक दुर्भावनाओं का प्रत्याख्यान है और समाजवाद और मानववाद का अद्भुत सहमेल है।

दिन के सारे काम रात में गठरी की तरह दिखते हैं

चीज़ें रहस्यमय हो जाएँ तो पूजनीय होने में उन्हें वक़्त नहीं लगता। पूरा शहर एक अबूझ दृश्यजाल में बदल रहा था—रहस्यमय दृश्यजाल जो रिल्के की कविताओं में और थॉमस मान के उपन्यास में मिलता है।

निर्वासितों का जनपद

हिंदी कविता में बहुत से राजकुमार आते हैं। थोड़ी देर स्तुति, संस्तुति, सम्मान के आलोकवृत्त में चमकते हैं। भ्रमवश इस चौंध को अपना आत्मप्रकाश समझ लेते हैं। परंतु हिंदी कविता के पाठक बहुत बेवफ़ा हैं। कुछ दिनों तक यह सब देखते हैं, और कविता न मिलने पर छोड़ जाते हैं।

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