अपभ्रंश का दौर

हिंदी को हमेशा हिंदुस्तानियों से जोड़कर देखा गया है, जिसे बोलने वाले मुसलमान भी थे, हिंदू भी और पारसी भी। इस तरह देखें तो हिंदी का किसी दीन या मज़हब से कुछ लेना-देना नहीं था।

शराबी क़ौम पर कुछ नोट्स

शराबियों को एक ‘अस्मितामूलक’ इकाई/क़ौम (आइडेंटिटी) के रूप में देखना चाहिए कि नहीं? सुनने में यह अतिरंजित लग सकता है, लेकिन क्रूर सच्चाइयाँ अक्सर ही अतिरंजित लगती हैं।

नामवर सिंह की कहानी-आलोचना के अंतर्विरोध और नई कहानी

नई कहानी के दौर में पहली बार कहानी-आलोचना को एक गंभीर विषय के रूप में समझा गया। यह नई कहानी का ही दौर था, जब विभिन्न काव्य-आंदोलनों की तरह कहानी की रचना और पाठ की प्रक्रिया पर गंभीर ‘वाद-विवाद और संवाद’ हुआ। नई कहानी के दौर के बाद कहानी-आलोचना एक बार फिर से हाशिए पर चली गई। कमोबेश यह स्थिति आज भी विद्यमान है।

हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें?

‘हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें?’ यह प्रश्न कोई भी कर सकता है, बशर्ते वह हिंदी भाषा और उसके साहित्य में दिलचस्पी रखता हो; लेकिन प्राय: यह प्रश्न किशोरों और नवयुवकों की तरफ़ से ही आता है। यहाँ इस प्रश्न का उत्तर कुछ क़दर देने की कोशिश की गई है कि जब भी कोई पूछे : ‘हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें?’ आप कह सकें : ‘हिंदी साहित्य यहाँ से शुरू करें’ :

क्या एक गल्प है यह

थिएटर देखते समय अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए तो सबका ध्यान थिएटर में चल रहे दृश्य से हटकर मृत व्यक्ति की ओर आ जाएगा, संभवतः थिएटर थोड़ी देर के लिए रुक या निरस्त भी हो जाए।

उन्हें अपनी प्राथमिकता मत बनाओ जो तुम्हें महज़ विकल्प की तरह रखते हैं

लोग भूल जाएँगे कि तुमने क्या कहा था, लोग भूल जाएँगे कि तुमने क्या किया था, लेकिन लोग कभी नहीं भूलेंगे कि तुमने उन्हें कैसा महसूस कराया था।

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