वायरल से कविता का तापमान नापने वालों के लिए

यह पुस्तक विधिवत् लिखी गई पुस्तक नहीं है। यह पिछले छह दशकों से अशोक वाजपेयी के द्वारा कविता के बारे में समय-समय पर जो सोचा-गुना-लिखा गया, उसका पीयूष दईया द्वारा सुरुचि और सावधानी से किया गया संचयन है।

मेरी कोई स्त्री नहीं

सियोत से लौट आने के बाद दो दिन से खेत पर ही पड़ा हूँ। यूँ पड़ा रहना मेरे स्वभाव के विपरीत रीति है। गतिशीलता, भटकन (मन और तन दोनों की) और उत्पात में ही मेरी आभा है और मुझे सुभीता है। मैं बहुत देर तक कहीं पड़ा नहीं रह सकता और बहुत देर तक एक जगह खड़ा भी नहीं रह सकता। लेकिन छड़ा रहने का गुण (अवगुण) मैंने ख़ुद विकसित किया है और जड़ा तत्त्व मुझमें स्वभाव-गत है।

निराशा जब आती है

भागने से थकान होती है। पेड़ नहीं भागते। अपनी जगह पर खड़े रहते हैं। वे न हत्या करने जाते हैं और न अपने हत्यारों से भाग पाते हैं। मैं किसी पेड़ को नहीं जानता। तय है कि कोई पेड़ भी मुझे नहीं जानता। वे निहत्थे खड़े हैं।

हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें?

‘हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें?’ यह प्रश्न कोई भी कर सकता है, बशर्ते वह हिंदी भाषा और उसके साहित्य में दिलचस्पी रखता हो; लेकिन प्राय: यह प्रश्न किशोरों और नवयुवकों की तरफ़ से ही आता है। यहाँ इस प्रश्न का उत्तर कुछ क़दर देने की कोशिश की गई है कि जब भी कोई पूछे : ‘हिंदी साहित्य कहाँ से शुरू करें?’ आप कह सकें : ‘हिंदी साहित्य यहाँ से शुरू करें’ :

क्या एक गल्प है यह

थिएटर देखते समय अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए तो सबका ध्यान थिएटर में चल रहे दृश्य से हटकर मृत व्यक्ति की ओर आ जाएगा, संभवतः थिएटर थोड़ी देर के लिए रुक या निरस्त भी हो जाए।

क्या आपने कोई ऐसा इंसान देखा है?

कोरोना के क़हर के कारण कुछ अरसे से फ़ेसबुक पर वैसी पोस्टें देखने को नहीं मिल रहीं जो कुछ महीनों पहले रोज़ ही मिल जाती थीं। लगातार एक ही गुहार कि मेरे नाम से अगर कोई व्यक्ति पैसे माँगे तो उसे न दें, वह कोई फ़ेक अकाउंट होगा! जब भी ऐसे पोस्ट देखता, मन कचोट कर रह जाता… पता नहीं कौन होगा?

‘तकलीफ़ में गाने से ही सिद्धि मिलती है’

उत्तर प्रदेश में एक जगह है बनारस, जिसके इंचार्ज हैं—भगवान शंकर। यहाँ बनारस में भूत भावन भगवान भोलेनाथ ने अपना एक एग्जीक्यूटिव या कहें एक एजेंट छोड़ रखा है, नाम है—पंडित छन्नूलाल मिश्र।

लहू में आग और खाल में राग

सुबह-सवेरे मेरी आँख खुली तो सामने ग़ज़ब दृश्य था। बकरियों के बीच ज़मीन पर रामा लेटा पड़ा सो रहा था और बकरियाँ मिमियाते हुए उसका मुँह चाट रही थीं। रात को हम शराब पीकर नशे में ढेर हो गए थे। रात को कुछ खाया न था, इसलिए सुबह-सुबह बहुत ज़ोरों की भूख लगी थी। परंतु चूल्हे पर चढ़ाया गया खारी-भात का पतीला ग़ायब था।

इस दौर में हँस पाना एक वरदान है

जब कोरोना दुनिया में तबाही मचा रहा था। तब मन में आता था, भारत में ऐसा हुआ तो क्या होगा? हमारे आस-पास ऐसा हुआ तो क्या होगा? कैसे सँभलेंगे हम? कैसे फिर से खड़े होंगे? इतना सब कैसे बर्दाश्त करेंगे? लेकिन अब लगता है, वास्तव में आदमी किसी भी परिस्थिति का आदी हो सकता है।

बीमार मन स्मृतियों से भरा होता है

गए दिन जैसे गुज़रे हैं उन्हें भयानक कहूँ या उस भयावहता का साक्षात्कार, जिसका एक अंश मुझ-से मुझ-तक होकर गुज़रा है। चोर घात लगाए बैठा था और हम शिकार होने को अभिशप्त थे। जैसे धीरे-धीरे हम उसकी ज़द में समा रहे थे, असंख्य डर हमारे सामने रील की तरह आते जा रहे थे। ज़िंदगी को जैसे किसी ने रिवाइंड बटन पर लगा दिया हो, एक-एक कर दृश्य या तो स्थिर हो रहे थे या पीछे की ओर बढ़ रहे थे।

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