अक्टूबर हर पेड़ का सपना है

वह पतझड़ का मौसम था। सारी पत्तियों ने उस पेड़ का साथ छोड़ दिया था। मुझे लगा मेरा मन उस पेड़ पर लगी कोई ताज़ा हरे रंग की पत्ती है, जिसके साथ का सपना पेड़ हर अक्टूबर में देखता है।

यह जो ख़ाली जगह है

आज का दिन देर से शुरू हुआ। बेकार-सा दिन रहा। बोगस भी कह सकते हैं। आज काढ़ा सुबह नाश्ते से पहले नहीं पिया। मन थोड़ा आज अलग ही स्तर पर था। पेट सही नहीं लग रहा है। उसी के चलते दोनों ने दुपहर का भोजन भी नहीं किया। अंदर से ही इच्छा नहीं हुई। साढ़े बारह बजे दवाई खाई और साढ़े तीन बजे लेट गया। भाई पहले ही सोने के लिए तत्पर था। वह सो रहा था। काढ़ा सिर्फ़ एक बार पिया। शाम को लगभग छह बजे।

मैंने सूरजमुखी होना चुना है

मैं जब अपनी उम्र के 29वें साल की दहलीज़ पर थी, तब मैंने अपने आपसे वादा किया था कि मैं अपने 30वें साल में वह नहीं रहूँगी जो मैं नहीं हूँ। अब प्रश्न यह है कि मैं हूँ ही कौन? मुझसे पहले बहुत सारे विद्वान इसका उत्तर खोज कर क़लम घसीट चुके हैं और उनकी गर्दा उड़ा देने वाली बातों पर अब किसी लाइब्रेरी में धूल जमी हुई है।

साथ एक बड़ी चीज़ है

ये बातें अगर अपने बचपन के साथियों या माता-पिता से कहूँगा, तब वे इन पंक्तियों को सिर्फ़ पंक्तियों की तरह पढ़ेंगे या सुनेंगे नहीं। उनके अपने अनुभव और संवेदनाएँ उनके साथ जुड़ती जाएँगी। हो सकता है, जिसका आपकी दृष्टि में कोई मूल्य न हो पर जिसने वह वक़्त जिया है, जो उसका साक्षी रहा है, जिसके अनुभव में वे दिन आए हैं, उसके लिए यह बात बहुत भावुक कर जाने वाली गली की तरह खुलता हुआ रास्ता हो सकती है।

वह क्यों मेरा सरनेम जान लेना चाहता है

घड़ी की सुइयाँ रुक गई हैं। वक़्त अब भी बीत रहा है। हम यहाँ बैठे हैं। वक़्त के साथ-साथ हम भी बीत रहे हैं। हम रोज़ सुबह उठते हैं और रात को सो जाते हैं। वक़्त से आधा घंटा देर से खाना खाते हैं। रात देर तक फ़ोन से चिपके रहते हैं। इस पूरी दिनचर्या में एक वक़्त ऐसा नहीं जाता, जब इस घड़ी के बारे में न सोच रहे हों। लेकिन पाँच मिनट निकालकर इस घड़ी में सेल डाल सकने की इच्छा को उगने नहीं दे रहे हैं।

बनारस : आत्मा में कील की तरह धँसा है

बनारस के छायाकार-पत्रकार जावेद अली की तस्वीरें देख रहा हूँ। गंगा जी बढ़ियाई हुई हैं और मन बनारस में बाढ़ से जूझ रहे लोगों की ओर है, एक बेचैनी है। मन अजीब शै है। दिल्ली में हूँ और मन बनारस में है। यह कभी भी, कहीं भी हो सकता है और अगर कहीं न हों तो अन्यमनस्क होकर जीना दूभर कर सकता है।

ज़िंदगी के दिन देकर ज़िंदा रहने का मोह

मैं सरल से सरल भाषा में अपनी बात कहना-लिखना चाहता हूँ। क्लिष्ट भाषा का प्रयोग करके मुझे अपना पांडित्य सिद्ध नहीं करना और न ही अपने आपको विद्वान ठहराना है। सामान्य से भी सामान्य आदमी उसे पढ़-समझ सके, उसे वह अपनी ही भाषा लगे और उस भाषा से उसे डर, संकोच न हो यही मेरा प्रयास रहता है।

मन एक डिस्ग्राफ़िया ग्रस्त बच्चे की हैंडराइटिंग है

चीज़ों को बुरी तरह टालने की बीमारी पनप गई है। एक पल को कुछ सोचती हूँ, अगले ही पल एक अदृश्य रबर से उसे जल्दबाज़ी से मिटाते हुए बीच में ही छोड़कर दूसरी कोई बात सोचने लगती हूँ। इन दिनों काम है कि लकड़ियों के गट्ठर की तरह सिर पर चढ़ता जा रहा है, एक-पर-एक, इतना काम इकट्ठा हो गया है, जिन्हें निपटाने का रत्ती भर भी मन नहीं होता।

अव्यवस्था और अराजकता

हर व्यक्ति अपने से कमज़ोर व्यक्ति पर अपना रोब, घमंड, ताक़त दिखाकर अपने शक्तिशाली होने के भ्रम-अहं को संतुष्ट करता है। अपने से कमज़ोर के मुक़ाबले अपनी श्रेष्ठता साबित करना, सशक्तता दिखाना न मात्र मानवीय चरित्र है, अपितु प्राणी मात्र का यही चरित्र है।

हिंदी साहित्य के इतिहास के बारे में

आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी के अप्रतिम आलोचक, निबंधकार, साहित्येतिहासकार, कोशकार, अनुवादक, कथाकार और कवि हैं। शुक्ल जी ने हिंदी साहित्य को जिस तरह प्रस्तुत किया, उस तरह आज तक शायद ही कोई दूसरा कर पाया।

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